बुधवार, 1 दिसंबर 2010

"आंसू"

यूं तो जाता नही कोई,
जाता भी है पर रुलाता नही कोई,
होठों पे तेरे इतनी हंसी थी कैसे,
दूर जाने से  इतनी खुशी हो जैसे,
माना कि दरिया के दो छोर थे हम,
ना मिलें ना सही पर,
जीवन के बहाव को,
दे सकते थे गति साथ साथ,
दूर से ही सही,
पर तुमपे तो अभी "पर" हैं,
उड़ो और ऊंचा उड़ो,
मेरे "पर" तो बोझिल हैं,
मेरे ही आंसुओं से,
जो जब कभी भी निकले चुपके से,
तुम्हारे ही  लिये निकले,
पर तुम्हारे "पर" हमेशा,
सुखाते रहे मेरी नम आंखों को,
और अन्ततः हारे,मेरे ही आंसू ।

9 टिप्‍पणियां:

  1. ्बहुत सुन्दर्……………भावपूर्ण रचना

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  2. तुम्हारे ही लिये निकले,
    पर तुम्हारे "पर" हमेशा,
    सुखाते रहे मेरी नम आंखों को,
    और अन्ततः हारे,मेरे ही आंसू ।

    gazab ki abhivyakti

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  3. आपकी रचना बहुत अच्छी और भावपूर्ण लगी .. आपकी रचना आज दिनाक ३ दिसंबर को चर्चामंच पर रखी गयी है ... http://charchamanch.blogspot.com

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  4. पर तुम्हारे "पर" हमेशा,
    सुखाते रहे मेरी नम आंखों को,
    और अन्ततः हारे,मेरे ही आंसू ।

    बहुत मर्मस्पर्शी प्रस्तुति..आभार

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  5. आदरणीया अना जी,सोनल जी,वन्दना जी,संगीता स्वरूप जी,अनुपमा जी एवं आदरणीय एम वर्मा साहब एवं श्रद्धेय कैलाश सी शर्मा साहब:आप लोगों को ह्रदय से धन्यवाद ।
    डा.नूतन-नीति जी, अपनी चर्चा परिधि में आपने मुझे शामिल किया-शुक्रिया ।

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