शनिवार, 4 अप्रैल 2020

तुम्हारा चाँद हमारा चाँद

चाँद वही, बादल भी वही,हरे रंग सारे वही,तितलियाँ,कोयल की कूक, दूब की नरमी वही।

एक दूसरे से मिलने पर आँखों के इशारे वही, मुस्कुराते होंठ भी वही।

हवा सुकून देती वैसे ही,पसीने की बूंद का लुढ़कना भी वही।

देशों के बीच दूरी कुछ नही ,धरती की सतह पर महज फासला है कुछ आड़ी बेड़ी रेखाओं का।

"फासले फर्क नही करते, फर्क ही फासले कर देते हैं शायद।"


शुक्रवार, 27 मार्च 2020

"लॉक डाउन....."

लॉक डाउन
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लॉक डाउन होंठों पे क्यों,
लबों पे हँसी आने दो,
लफ़्ज़ों को आपस मे,
 घुल जाने दो।

लॉक डाउन निगाहों में क्यों,
नज़रों में शोखी आने दो,
नज़र से नज़र मिलाने दो,
काजल को बादल में घुल जाने दो।

लॉक डाउन बातों में क्यों,
कुछ सुनो कुछ सुनाने दो,
कानों में मिश्री घुल जाने दो,
बातों को दिल तक जाने दो।

लॉक डाउन रिश्तों में क्यों,
जी को जी भर रो लेने दो,
रिश्तों को आंसुओं से धुल जाने दो,
रिश्ते ही जीवन है इन्हें जी जाने दो।


बुधवार, 18 मार्च 2020

"काश......"

लफ्ज़ मेरे वो,
कुछ खास न थे,
वो ठिठके जब,
ठहर तुम ही गये होते।

अश्क थामे रहा ,
लबों पे ,तबस्सुम से,
निगाहें मिला लेते गर तुम,
दो चार ढल तो गये होते।


रविवार, 15 मार्च 2020

" मचान लबों का ...."



पन्नों में दबे गुलाब जब तब महक उठे,
सीने की धौकनी से उसे जब भी साँसे मिली।

एक शायर कसमसा रहा था अरसे से किताब में,
तेरे लबों का मचान पा वो आसमान छू गया।

"बारिश लबों पे ....."



मुस्कुराये जरा क्या वो जब,
लबों पे उनके बारिश हो गई।
बारिश का एक कतरा ठहरा जब,
लब उनके फिर इंद्रधनुषी हो गये।
लबों के हाशिये पे ठहरे भीगे लफ्ज़ ,
एक अनकही कहानी पूरी कह गये।

"वायरस...."


कोविड 19

ध्यान रहे ,कहीं यहां वायरस न हो। इस बात का एहतियात बरता जा रहा सब जगह। अब वायरस दिखता तो है नही , परन्तु यह मान कर कि वो कहीं भी हो सकता है , उसके होने से बचने के उपाय किये जा रहे।

ईश्वर भी कहीं दिखते नही। अगर हम बस इतना सा मान लें कि  कहीं हमारे आसपास ईश्वर न हो और सब देख रहे हों तो शायद हम गलत काम भूल से भी न करें।

#एक #विचार।

शनिवार, 30 नवंबर 2019

.....धुंधलाता गाँव



धुंधलाता गांव
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थोड़ा सा गांव ,शहर क्या गया,
कीमती हो फिर वो अनमोल हो गया।

पगडंडी सी राहों पे रुका था कभी,
सारे शहर का वो रास्ता आम हो गया।

शहर उलझा सा ,उसके पांवो में जब,
जैसे लिपटा हो सेवार, तलाब में अब।

शहर के छोर पर चमके, जब जुगनू कोई
तलाशता हो गांव जैसे, अपनी रोशनी कोई।

©अमित श्रीवास्तव