मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

" एक सिंदूरी सी शाम......."


एक सिंदूरी सी शाम थी,
कुछ उजली सी यादें थीं,
सामने समंदर था किनारा था,
रेत थी भर नज़र नज़ारा था,
लहरें उमड़ती पास उसके आती,
दौड़ती पकड़ती वह उन्हें पांव से,
पर लहरें ठहरी कब कहाँ,
उन्हें तो जाना होता वापस न,
किनारों से कर किनारा,
फिर समंदर में ही शायद,
प्यार भी उसका लहरों सा,
आवेग इतना पर ठहरा कभी न,
आती लहरों पर जाती लड़की
या शायद एक नौका क्षितिज पर।

सोमवार, 10 अप्रैल 2017

"क्या लिखा मेरे लिए........"


सवाल उसका,
क्या लिखा मेरे लिए,
अश्क अश्क स्याही किया
सिर्फ उसके लिए,
सफों पर उसका,
ज़िक्र जब भी किया,
लफ़्ज़ों ने लफ़्ज़ों से,
इश्क कर लिया,
भूल न पाऊँ अब,
कुछ वो ऐसा कर गया,
सीने में मेरे,
दिल अपना धर गया,
सब्र से पी रहा था,
ज़हर जिंदगी का,
अमृत सा कहर,
वह निगाहों से कर गया।

सोमवार, 3 अप्रैल 2017

" कितनी शामें बीत गई यूं......."


सो लो न आज कांधे पर,
अरसा हुआ सहारा लिए,
कुछ सांसे तुम्हारी हो,
कुछ बीच मे हमारी हो,
थाम अंगुलियां यूं हथेलियों में,
कह जाओ सब वो ख्वाब अपने,
कितनी शामें बीत गई यूं,
बेचैनी में तब्दील हुए।

गुरुवार, 23 मार्च 2017

" प्यार की प्रकृति ........."


सूने आसमान पे चाँद,
उजले माथे पे बिंदिया,
चाँद पर तैरते बादल,
आँखों से रिसता काजल,
बुलबुल की आवाज़,
जल तरंग सी साज़,
रेशम रेशम सी हवा,
या अँगुलियों की थिरकन,
प्रकृति सा प्यार है ये
या प्यार की प्रकृति
आसमां ताकते ताकते
प्यार जमीं पर हो गया।

सोमवार, 29 अगस्त 2016

"योर नोज़ इज़ वेरी टेस्टी........"

उस उदास लड़के की अंगुलियाँ अपने हाथों में लिए यूं एक एक कर मोड़ तोड़ कर वह लड़की देख टटोल रही थी मानो वहां कहीं एक प्रेशर पॉइंट हो और उसे दबाते ही उस लड़के की उदासी गायब हो जायेगी।
हुआ भी कुछ ऐसा ही। लड़के ने कहा,तुम्हारे हाथ में जादू है क्या, छूती तुम अंगुलियों को हो और गुदगुदी होंठो पर होती है ,फिर बरबस मुस्कुराने को जी चाहता है।
लड़की संयत होते हुए बोली,चलो तुम्हारे जी ने कुछ चाहा तो। इतना गंभीर निर्विकार कैसे रहते हो तुम। पता है तुम्हे मैं प्यार नहीं करती क्योंकि प्यार करने में भी एक फ्रेम होता है,फ्रेम समझते हो न दायरा। मैं तुम्हे किसी फ्रेम में नहीं बांधना चाहती। मैं तुमको जीती हूँ, तुम्हारे लिए जीती हूँ और तुमसे ही जी पाती हूँ।
लड़का एकटक उसको देखता रहा। अँगुलियों में अंगुलियाँ फंसाये फंसाये बोला, तुम्हारी अंग्रेजी मुझे समझ में कम आती है पर तुम पास होती हो तो तुम जो भी कहती हो न अंग्रेजी में, सबका तर्जुमा तुम्हारी आँखों में साफ़ नज़र आता है। हाँ जब आँखे मूँद कर कुछ कहती हो तब मुश्किल होती है।
लड़की ने उसकी हथेली में अपनी हथेली से एक भंवर सा बनाया गोया उसी भंवर में उसके संग डूबने का मन हो और फिर आँखों में ही आँखे डाल कर बोली, तुम भी कभी कुछ कहो न । चुप रह कर सब समझते तो हो पर तुम्हे सुनने का मन मेरा भी करता है न और इतना कह कर लड़की ने आँखे मींच कर उसे भींच लिया।
लड़का थोड़ी देर उसे यूं ही देखता रहा या शायद पढता रहा फिर उसने उस खूबसूरत सी लड़की की गोरी सी नाक को चूम लिया और धीरे से बोला, "योर नोज़ इज़ वेरी टेस्टी।" (उसकी संगत में इत्ती ही अंग्रेजी सीख सका था वह)
बरसों हो गए इस बात को और अब भी अक्सर आईने में अपनी नाक चूम कर लड़की उस लड़के को याद करती है और कहती है , शायद टेस्ट तुम्हारे होंठों में ही था मेरी नाक में नहीं।

शनिवार, 11 जून 2016

" शून्य के भीतर शून्य ........."


शून्य के भीतर भी ,
होते हैं बहुत सारे शून्य ,
जब जब तुम चुप रहे ,
शून्य धंसते गए ,
एक के भीतर एक ,
फिर एक और एक,
कितनी भी बातें ,
कोई और कर ले ,
शून्य में गूँज ,
फिर कभी नहीं ,
पहला शून्य गर तुम ,
खींच लो अलग ,
बस दो बोल ,
बोल तो दो ,
शून्य के पीछे शून्य ,
बहुत सारे शून्य,
दौड़े चले आएंगे,
सब एक कतार में,
करने लगेंगे अठखेलियां
वही सारे शून्य ,
बन कभी निगाहे और ,
कभी तबस्सुम तुम्हारी ।

रविवार, 10 अप्रैल 2016

" कैसा इत्तिफ़ाक़ है यह ........"


'पता है क्या हुआ , लगभग चीखते हुए अंदाज़ में मधूलिका बोली उधर से फोन पर ।' मुझे लगा फिर शायद उसने चाभी कार में ही लगी छोड़ दी और कार दरवाज़ा बंद करते ही लॉक हो गई होगी या फिर चिपका ली होगी च्युइंग गम अपने बालों में , बबल बनाया होगा उसने और फिर बबल फूट कर जा चिपका होगा उसकी माथे से नीचे लटकती लटों में ।  उसकी शैतानियां नादानियां थमती नहीं हैं कभी और ऐसा कुछ होने पर सबसे पहले मुझसे ही शेयर करती है ।

पूछा मैंने -'क्या हो गया , इतना परेशान क्यों ,सांस तो ले लो ,जो भी प्रॉब्लम है सॉल्व हो जाएगी ।' 'अरे  प्रॉब्लम नहीं , वो जो कल बताया था न आपको कि मेरी रिंग नहीं मिल रही पिछले पांच सालों से , वह मिल गई आज । किसी को भी यह बात नहीं बताई थी डर और घबराहट के कारण कि सब कहेंगे कितनी लापरवाह हूँ मैं । यह बात राघव को भी नहीं बताई कभी । राघव ने बड़े प्यार से यह रिंग मुझे शादी के बाद पहली बार मिलने पर दी थी मुझे । उसके चार पांच दिन बाद से ही यह खो गई थी । यह तो अच्छा हुआ कभी किसी ने घर में या राघव ने भी नहीं पूछा इस रिंग के बारे में । पर मन ही मन मैं बहुत परेशान थी और एक बोझ सा था मेरे ऊपर सच न बताने का । '

अभी बस ५ या ६ महीने पहले ही मेरी मुलाकात मधूलिका से एक दोस्त के यहाँ शादी के दौरान ही हुई और तबसे कुछ ज्यादा ही आपस में हमारी बातें होने लगीं । बातूनी मधुलिका बात बात में सब कह जाती है मुझसे ।

दरअसल अभी कल ही चीज़ों को सम्भाल कर रखने पर हो रही बहस के दौरान उसने बताया था -'उससे आज तक कुछ भी खोया नहीं है , सिवाय एक रिंग के ।' बताने के बाद अचानक चुप होते हुए फिर बोली वह कि यह बात तो मैंने आज तक राघव को भी नहीं बताई । अब इस बात को पांच साल हो गए हैं , रिंग तो अब मिलने वाली है नहीं और उसकी डिज़ाइन भी ठीक से याद नहीं कि चुपचाप दूसरी बनवा लें । बस आज पता नहीं क्यों आपको बता दिया । बार बार एक ही रट कि किसी और को यह बात नहीं पता , बस आप ही जान गए आज । '

मैंने कहा था -'अरे मिल जायेगी ,कहीं रखी होगी ,परेशान न हो, मिलेगी जरूर । मैंने तो ऐसे ही उसका मन हल्का करने को बोल दिया था । पर यह क्या , कल ही बात हुई और आज वह पांच सालों से खोई हुई रिंग अचानक से कपड़ों की अलमारी से कपडे निकालते समय मधूलिका के पांव के पास आ गिरी । जिसको ढूँढ़ने में उसने कितने दिन कितनी रातें घर का कोना कोना छान मारा था , वह अपने आप लुढ़क कर नीचे पाँव में आ गिरी थी ।

इसी बात से मधूलिका हैरान हो मुझे फोन कर रही थी और यह भी बार बार कह रही थी कि आपसे पहले ही शेयर किया होता तो पहले ही मिल गई होती । मजे की बात यह कि चूंकि इस रिंग के खोने का किसी को पता नहीं तो मिलने का भी क्या बताना ।

बस बार बार एक ही रट मधूलिका ने लगा रखी थी कि मैं कितना लकी हूँ उसके लिए । मैंने हँसते हुए कहा कि मुझे अपनी खोई हुई चीज़ों का लॉकर बना लो , इस पर वह बोली ,'सीक्रेट्स के लॉकर तो आप हो ही मेरे । '

पता नहीं यह इत्तिफाक है या और कुछ ।