मंगलवार, 2 मई 2017

"खामोश निगाहें...."


आंखों ने तेरी
फिर बेचैन किया
कभी तो इतने सवाल
और कभी प्यार ही प्यार किया
खामोश निगाहें
और लरजते होंठ
जैसे बन्द किताब कोई
फड़फड़ाती हो कोने से
यह काजल की लकीरें या
नाँव में लिपटी रस्सी कोई
खींच उसे क्यूँ
तैरा न लूँ दिल मे अपने
"आना करीब तुम
कभी इतना काश
बन्द पलकों के बीच तेरी
एक पलक मेरी भी हो"
आंखों को मूँद ही रखना
जब कभी सामने आऊं तेरे
कहीं इल्जाम न लग जाये इनपे
डुबो कर जान लेने का ।

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

" एक सिंदूरी सी शाम......."


एक सिंदूरी सी शाम थी,
कुछ उजली सी यादें थीं,
सामने समंदर था किनारा था,
रेत थी भर नज़र नज़ारा था,
लहरें उमड़ती पास उसके आती,
दौड़ती पकड़ती वह उन्हें पांव से,
पर लहरें ठहरी कब कहाँ,
उन्हें तो जाना होता वापस न,
किनारों से कर किनारा,
फिर समंदर में ही शायद,
प्यार भी उसका लहरों सा,
आवेग इतना पर ठहरा कभी न,
आती लहरों पर जाती लड़की
या शायद एक नौका क्षितिज पर।

सोमवार, 10 अप्रैल 2017

"क्या लिखा मेरे लिए........"


सवाल उसका,
क्या लिखा मेरे लिए,
अश्क अश्क स्याही किया
सिर्फ उसके लिए,
सफों पर उसका,
ज़िक्र जब भी किया,
लफ़्ज़ों ने लफ़्ज़ों से,
इश्क कर लिया,
भूल न पाऊँ अब,
कुछ वो ऐसा कर गया,
सीने में मेरे,
दिल अपना धर गया,
सब्र से पी रहा था,
ज़हर जिंदगी का,
अमृत सा कहर,
वह निगाहों से कर गया।

सोमवार, 3 अप्रैल 2017

" कितनी शामें बीत गई यूं......."


सो लो न आज कांधे पर,
अरसा हुआ सहारा लिए,
कुछ सांसे तुम्हारी हो,
कुछ बीच मे हमारी हो,
थाम अंगुलियां यूं हथेलियों में,
कह जाओ सब वो ख्वाब अपने,
कितनी शामें बीत गई यूं,
बेचैनी में तब्दील हुए।

गुरुवार, 23 मार्च 2017

" प्यार की प्रकृति ........."


सूने आसमान पे चाँद,
उजले माथे पे बिंदिया,
चाँद पर तैरते बादल,
आँखों से रिसता काजल,
बुलबुल की आवाज़,
जल तरंग सी साज़,
रेशम रेशम सी हवा,
या अँगुलियों की थिरकन,
प्रकृति सा प्यार है ये
या प्यार की प्रकृति
आसमां ताकते ताकते
प्यार जमीं पर हो गया।