शनिवार, 11 दिसंबर 2010

"इन्द्र धनुष"

आज देखा उसकी कोहराई आंखों में,
बनता है एक इन्द्र धनुष,
जब वह हंस देती है,
आंखों में आंसू भरे भरे,
कैसी समानता है,
आसमान का इन्द्रधनुष भी,
बनता बारिश के बाद धूप में,
और उसकी आंखों में भी,
आंसुऒं के बाद पर,
मुस्कुराहट की धूप के साथ,
पर यह दोनों ही  इन्द्रधनुष,
क्यों बिखर जाते हैं,
कुछ ही  पलों के बाद,
काश! ऐसा होता,
दोनों ही इन्द्रधनुष ना बिखरते,
समय के साथ,
और यूं ही धूप खिली रहती,
उसके होठों पे।

9 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर रंगों से सजी अभिव्यक्ति..... बेहतरीन

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  2. आप सभी को इस स्नेह के लिये स्नेहिल आभार ।

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  3. three good.
    कोहराई आंखों में इन्द्रधनुष! गजब है भैये। जैसे किसी उजाड़ गांव में मुख्यमंत्री के दौरे पर झट से चमाचम सड़क बन जाती है वैसे ही कोहराई आंखों में इन्द्रधनुष उगा दिया। ये होता है झकास काम! :)

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  4. amit ji mai to pehle hi fan hu aapki rachnaao ki ..shabd nahi hai is rachna ki tareef ke liye basically i m a fan of ur innovative thoughts aur uske baad uska presentation ..behad khoobsurat :-)

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