चाय ऑफर करने के पीछे मकसद
कुछ समय साथ बैठने का होता है ,
चाय पिलाने का नहीं ।
"शब्द भीतर रहते हैं तो सालते रहते हैं, मुक्त होते हैं तो साहित्य बनते हैं"। मन की बाते लिखना पुराना स्वेटर उधेड़ना जैसा है,उधेड़ना तो अच्छा भी लगता है और आसान भी, पर उधेड़े हुए मन को दुबारा बुनना बहुत मुश्किल शायद...।
"नियति व्यापकता लिए हुए है। नियति संसार की होती है ,इसे ही प्रकृति की चाल कहते हैं।"
"प्रारब्ध आपके हिस्से की नियति है।"
"भाग्य आप अपने कर्म से बनाते है। कर्मफल को रेट्रोस्पेक्ट में देखते है तो भाग्य कहलाता है।"
बीती रात एक समूची नींद नहीं थी,अक्सर ऐसा होता है अब।
छोटे छोटे से टुकड़ों में अलग अलग बनती बिगड़ती रहती है।हर एक छोटी सी नींद के टुकड़े में बड़े बड़े ख्वाब उगते रहते हैं।
तुम्हे बोनसाई से बहुत प्यार है न। बरगद ,पीपल जैसे वृक्ष छोटे छोटे से गमलो में।
ख्वाबों के भी बोनसाई बना लिए है अब मैंने , छोटी छोटी सी नींद के गमलों में।
यह ख्वाब पास से छू कर देखना ,पसंद आएंगे तुम्हे।
नींद न पूरी हो तो आंखे इश्तिहार हो जाती हैं।
नज़्म भी एहसासों का इश्तिहार ही तो है ।
"यानी आंखों को नज़्म कहना गुनाह नही।"
सुबहें सारी खूबसूरत होती हैं, इसमें कोई शुबह नही , क्योंकि बहुत सारी नज़्में एक साथ लिख दी जाती हैं काजल की लकीरों से।
सोचता हूँ ज़िन्दगी में ऐसा कुछ नही किया जिस पर फख्र किया जा सके। पूरे जीवन मे एक बानगी तो ऐसी हो जिसके सहारे इस जीवन रूपी गिफ्ट के बदले ईश्वर को रिटर्न गिफ्ट दी जा सके।
पतंग उड़ती देख सोचता हूँ पतंग का अविष्कार करने वाला भी कितना विद्वान रहा होगा।
वो बिरले ही होते है जिन्हें ऐसे कुछ नया करने की कुदरती नेमत मिलती है।
पूरे देश मे किसी भी क्षेत्र में जो पी एच डी लोगों को दी जा रही है उसके विषय मे एक श्वेत पत्र जारी किया जाना चाहिए कि उन लोगों के कार्य से लोगों के जीवन मे क्या गुणात्मक परिवर्तन हुआ है या भविष्य में होगा।
"शून्य का अविष्कार हमने किया है ,इसे कितने युगों तक भुनाते रहेंगे। बनाने वाले तो पब जी ,टिक टॉक और उनो जैसे गेम बनाकर अमर हो गए।"
आईआईटी से भी डिग्री मिलने में यह बाध्यता होनी चाहिए कि विद्यार्थी ने उन चार या पांच सालों में कोई नई सोच,कांसेप्ट या थ्योरी संकल्पित भी की अथवा नही।
एमबीए और सीए का ध्येय बस एक रहता है कि रुपये में पांच चवन्नी कैसे बनाई जाए। जितने भी बिजनेस मॉडल है सबमे उपभोक्ता का और कार्मिकों का शोषण ही है। जहां यह बेहतर है वो इसलिए कि वहां लाभ का मार्जिन अप्रत्याशित रूप से बहुत अधिक है।
प्रत्येक उच्च शिक्षित व्यक्ति की यह सोच होनी चाहिए कि ऐसा क्या करें कि जीवन सरल हो जाये, चाहे वो कृषि का क्षेत्र हो, मनोरंजन,खेल का क्षेत्र हो या चिकित्सा सुविधा का ही क्षेत्र हो या जीवन का कोई भी क्षेत्र हो।
दरअसल समाज की प्रचलित सोच ही नए युवकों की सोच को प्रभावित करती है। प्रचलन ही यही है कि डिग्री लो नौकरी करो मशीनी ज़िन्दगी जियो ,कुछ नया करने की न सोच है न जरूरत है।
जीवन व्यर्थ न हो जाये कुछ तो करना होगा।
इन क्षेत्रों में कुछ नया किये जाने की आवश्यकता है :
१. कृषि के क्षेत्र में। किसी भी आपदा या विपदा में खड़ी फसल कैसे सुरक्षित रहे ,इस पर कोई काम नही किया गया।
२.रेन हार्वेस्टिंग ,यह केवल सेमिनार और एन जी ओ तक ही सीमित है।
३.टाउन प्लानिंग , क्या छोटे और क्या बड़े शहरों कस्बो का बारिश में बुरा हाल होता है। जल निकासी का कोई कॉन्सेप्ट ही नही।
४.आउटर रिंग रोड कब इनर रिंग बन जाती है पता ही नही चलता। प्लानिंग बहुत लंबे समय के हिसाब से की जानी चाहिए।
५.सड़क दुर्घटनाये,रेल दुर्घटनाये तकनीकी रूप से कैसे कम की जाएं कोई ब्लू प्रिंट नही।
६.,गांव शहर की तरफ रुख न करें इस पर कोई ठोस प्लान नही।
७.RPL रिकग्निशन ऑफ प्रायर लर्निंग एक अच्छी पहल है सरकार की ,परन्तु लाभ नही मिला जिन्हें मिलना चाहिए था।
८.पंचर बनाना, साईकल रिपेयर, बाइक रिपेयर,प्लम्बर,इलेक्ट्रीशियन,हेयर ड्रेसर जैसे कामो के लिए मॉड्यूल विकसित किया जाता। जिसे गांव गांव तक विस्तारित करते और सम्मान भी मिलता।
शोषण कैसे होता है इनका, अर्बन क्लैप वालों से समझिये।
९.स्कूली शिक्षा कम हो व्यवहारिक ज्यादा हो और रोजगार परक हो ,बहुत सुधार की आवश्यकता है।
१०.गांव के स्तर पर नर्सों की भर्ती और उन्हें प्रेरित कर स्वास्थ्य के क्षेत्र में सम्मलित किया जाना ,यह गेम चेंजर हो सकता समाज के लिए।
कुछ तो करें ,न करें तो सोचे ही कुछ नया। कब तक महाभारत और रामायण देख खुश होते रहेंगे। उस समय के ऋषियों मुनियों जैसी विद्या ही हासिल कर ली जाए दुबारा।
आग जलने के लिए तीन चीजों की आवश्यकता होती है, इसे फायर ट्रायंगल भी कहते है, ऑक्सीजन, जलने वाला पदार्थ और अग्नि। इसे बुझाना हो तो या तो आग के ऊपर ऐसी परत बना दी जाए जो ऑक्सीजन को खत्म कर दे जैसे फोम की लेयर, बालू, या पाउडर कोई, या जलने वाला पदार्थ ही खत्म हो जाये अथवा अग्नि को ही बुझा दें।
सबसे कारगर होता है ऑक्सीजन को ही विलुप्त कर देना। परन्तु बड़े स्तर पर लगी आग को बुझाना मुश्किल होता है।
उत्तरकाशी में पोस्टिंग के दौरान देखा था कि पहाड़ों के जंगल मे लगी आग महीनों तक जलती रहती है। रात को ऐसे लगता था जैसे पूरे पहाड़ पर गेंदे की माला बहुत सारी लिपटी हो ,धधकती हुई।
उस दौरान पता चला कि ऐसी आग को बुझा पाना सम्भव नही होता परन्तु आगे बढ़ने से रोका जाता था। उसके लिए आग वाले क्षेत्र से दूर उल्टी आग खुद लगाई जाती थी जो जलती हुई आग की तरफ बढ़ती थी।
इससे फैलती हुई आग और उल्टी आग के बीच जलने वाला पदार्थ जल कर समाप्त हो जाता था और आग का विस्तार एक निश्चित सीमा पर रुक जाता था।
आजकल प्रचंड गर्मी में खेतों में गेहूँ की कटाई का काम हो रहा है। खेतों में ही बिजली की लाइन गुजरती है और कहीं कहीं वहीं खेत के कोने में ट्रांसफॉर्मर भी लगा होता है। हवा तेज चलने पर तार लड़ते है या चिड़िया के टकराने से चिंगारी छोटी सी गिरती है और पल भर में गेहूँ के खेत मे विकराल आग लग जाती है। यही स्थिति ट्रांसफार्मर से निकली चिंगारी के कारण भी होता है।
इससे बचने का उपाय यह है कि कटाई शुरू करते समय सबसे पहले बिजली की लाइन के नीचे और टांसफार्मर के आसपास के हिस्से की कटाई कर लें जिससे चिंगारी गिरने से वहां जलने वाला पदार्थ हो ही न।
इसी प्रकार पड़ोसी के खेत से भी अपने खेत को कटाई कर उससे अलग कर ले जिससे यदि पड़ोस के खेत मे आग लगे तो भी अपना खेत बच सके।
आजकल हार्वेस्टिंग मशीन से भी कभी कभी चिंगारी निकलती है उससे भी बचाव किया जाना चाहिए।
खड़ी फसल का यूँ जल कर समाप्त हो जाना बहुत पीड़ा देता है।
चाँद गोल न होकर चौकोर या तिकोना होता तब शायद इतना ज्यादा खूबसूरत नही होता।
दरअसल गोल चीज़ का कोई सिरा नही होता तो किसी सिरे या छोर के अभाव में उसका बे अनुपात होना पता नही चलता। तिकोना अथवा चौकोर होने की स्थिति में उस आकृति का किसी एक रिफरेन्स पॉइंट के सापेक्ष सिमेट्रिकल न होना उसे बदसूरत बना देता है।
रेफरेन्स पॉइंट न हो तो सारी बातें / चीज़ें / आकृतियां अच्छी एवम सुंदर लगती हैं। बुराई तो सापेक्षवाद में दिखती है।
"निरपेक्ष दृष्टि से कुछ भी बुरा अथवा कुरूप नही होता।"
"सेमल की नई रुई आने वाली है । दो तकिए लेने हैं इसके ।"
-अच्छा ।
"फोम वाली सॉफ्ट तो है पर अच्छी नहीं । "
- हाँ ,पर वो रुई वाली है न ।
"वो थोड़ा क्रश मतलब पिच्च नहीं हो गई ।"
- हाँ , पर वो ठीक है अभी ।
"आपको रुई वाली कम्फर्टेबल लगती है या फोम की या फिर जो वो रखी है सेमल वाली ।"
- तुम्हारे बाँहों वाली ,सबसे कम्फ़र्टेबल ,फुसफुसाते हुए ।
(पर वो सुन न पाई धीमी सी आवाज़ , या शायद अनसुना कर दिया हमेशा की तरह )
'यह सुबह / शाम लिखते रहते हो और कोई काम नही है।'
तुम मुझे पढ़ना छोड़ दो न, मैं लिखना छोड़ दूंगा।
'फिर इन आँखों का क्या काम।'
उनका इल्ज़ाम लगाने का
अंदाज ही कुछ गज़ब का था,
मैंने खुद अपने ही ख़िलाफ
गवाही दे दी।
------------------------------------------------------------------------
अमित , तुम्हें कैंसर है।
Lung cancer 4th stage.
------- -----------------------
तारीख 5 जनवरी 2026
-------------------------
विभागीय इंस्टिट्यूट में क्लास लेने के दौरान थोड़ा सा महसूस हुआ कि breathlessness हो रही है पर सुबह जिम भी गये थे तो लगा थोड़ा exertion ज्यादा हो गया होगा। बात आई गई हो गई।
तारीख 14 जनवरी 2026
--------------------------
सेवा निवृति के पश्चात कंसल्टेंसी जॉइन किया था। बस उसी आफिस से लंच के लिए घर आते समय घर के पास ही cardilogist डॉ अतुल अग्रवाल साहब का हॉस्पिटल है। ऐसे ही अचानक मन हुआ आज बीपी चेक करा लें बहुत दिन हुआ ,मिलना भी नही हुआ। मेरे बहुत अच्छे परिचित हैं और बहुत ख़्याल रखते हैं।
भीड़ के मारे हम संकोच कर रहै थे पर उनके स्टाफ ने बता दिया तो उन्होंने फौरन बुलाया। हमने बताया सब ठीक है बहुत दिन हुए थोड़ा बीपी देखिए कुछ गड़बड़ तो नही।
वो बोले बीपी तो बाद में देखेंगे, पहले यह बताओ तुम हाँफ क्यो रहे। तुरंत उन्होंने पीठ पर आला लगाया और सीरियस हो गए। नाराज़ भी हुए पर मुझे समझ नही आया। उन्होंने तुरंत एक पैथोलॉजी में फोन कर मेरा PFT और चेस्ट xray करने को बोला।
PFT 52% और xray में आधा lung गायब। फिर वापस गये अग्रवाल साहब के पास। तुरंत उन्होंने अपने कलीग डॉ के lung hospital में भेजा हमें।
संजीवनी लंग हॉस्पिटल के डॉ गुप्ता ने चेक अप किया और बोले या तो तुम्हे TB है या cancer. ईश्वर से pray करो कि TB ही हो।
उन्होंने पीठ पंचर करते हुए इंजेक्शन से फ्लूइड निकालने की कोशिश की। कुछ नही निकला। अब वो लगभग sure थे फिर उन्होंने बहुत सारे टेस्ट अल्ट्रासाउंड, ct scan किया। पर स्पष्ट नही हो रहा था और हमारी फिजिकल कंडीशन भी बहुत ही ठीक थी।
अंत मे उन्होंने PET SCAN कराने को बोला। तारीख 19 जनवरी को यह इमेजिंग हुई। उसके बाद भी हम नार्मल रूटीन में रहे, आफिस जाते रहे।
तारीख 23 जनवरी 2026
------------------- -------
आफिस से ही बैठे बैठे हमने pet scan की रिपोर्ट व्हाट्सप्प पर मंगाई। वो code में होती है , non medico को समझ नही आती है।
हमने उसे chatgpt पर डाल दिया। एक सेकेंड में आ गई finding : 4th stage lung cancer.
दो मिनट के लिए हम जड़वत हो गए। फिर पानी पिया। कार की चाभी उठाई और घर आ गए।
अपने बड़े भाई जो सर्जन भी हैं और अब सेवानिवृत्त के पश्चात एक निजी मेडिकल संस्थान में अध्यापन का काम कर रहे, उन्हें बताया तो तुरंत घर आ गए।
आगे तो bronchoscopy यानी biopsy ही होना था अब। उन्होंने तुरंत बोला कि मुम्बई में टाटा कैंसर हॉस्पिटल में ही आगे ट्रीटमेंट कराना है। उनके कॉलेज सीनियर डॉ राजीव सरीन वहीं टाटा में oncology के हेड और डायरेक्टर भी हैं। उनसे उनकी बात हुई, 27 जनवरी का फिक्स हुआ।
बड़ा बेटा मुंबई में ही है तो फौरन सब मैनेज होना शुरू हुआ।25 जनवरी को ही हम मुंबई आ गए।
तारीख 27 जनवरी 2026
--------------------------
मन बहुत खराब हो चुका था इन बीते 13 दिनों में। टाटा की भीड़ देख कर खास कर बीमार बच्चों को देखकर बहुत तकलीफ हुई।
टाटा में चेक अप हुआ पर rush के कारण biopsy की तारीख 4 फरवरी मिली। जो dr sareen को लगा कि इसमे तो फिर ट्रीटमेंट शुरू में देर हो सकती है।
उन्होंने बेटे को बोला कि हिंदुजा अस्पताल में dr vijay patil है उनसे मिल लो, पहले वो भी उन्ही के साथ 12 साल टाटा में ही थे।
तारीख 29 जनवरी 2026
--------------------------
डॉ पाटिल ने बहुत स्पष्ट समझाया कि क्या है और क्या लाइफ थ्रेट है। उन्हें लखनऊ की pet scan रिपोर्ट में कुछ traces ब्रेन में भी मिले। उन्होंने ब्रेन MRI कराई।
तुरंत अगले दिन ही biopsy हुई, दवा शुरू करने की जल्दी के कारण blood biopsy भी कराई और उन्होंने हमारी target therapy 8 फरवरी से शुरू कर दी यानी एक टेबलेट रोज बस।
उनका अगला सुझाव कि अगर इसके साथ कीमोथेरेपी भी की जाए तो रिजल्ट बेहतर होगा मगर उसके लिए पेशेंट का अंदर से तैयार होना बहुत जरूरी है।
हम डरे तो थे ही। chemo के लिए हिम्मत नही जुटा पा रहे थे पर अंत मे हाँ कर दिया।
हमारी पहली कीमो 18 फरवरी,
दूसरी कीमो 11 मार्च,
तीसरी अभी 1 अप्रैल को हो गई।
चौथी कीमो 22 अप्रैल को होगी।
अब उसके बाद फिर pet scan होगा उससे आगे का ट्रीटमेंट तय होगा।
खासबात- हम बिल्कुल अच्छे से हैं। progressing well, vitals ठीक हैं, चिंता की कोई बात नही है अब।
यह पोस्ट लिखना इस लिए जरूरी लगा कि अब तक सबसे फ़ोन पर और इनबॉक्स में झूठ बोल बोल कर थक गया था। अधिकतर लोग शक कर रहे थे कि जिम की पिक नही आ रही, मुम्बई में इतने दिन क्यों, नए जॉब का क्या हुआ etc.
Life_is_so_unpredictable , क्या क्या नही सोच लिया इस बीच मगर यह समझ मे आया कि अंदर की मजबूती ही फाइट करने का सहारा बनती है बाकी दुनिया फिर बेमानी लगती है।
आगे अपना हाल देते रहेंगे। अब तो ठीक होना ही है ऐसा लगता तो है। बाकी दोस्तों और चाहने वालों की दुआएं बेकार नही जाने देंगे।
विशेष :इन सब के चक्कर मे बहुतों के पारिवारिक कार्यक्रमों, विभागीय क्लब के फंक्शन, बहुत अजीज़ लोगों की फेयरवेल पार्टीयों में, उनके बच्चों के शादी ब्याह में सम्मिलित नही हो सके और कोई न कोई झूठा बहाना ही बनाया था उन सबसे। अनुरोध है क्षमा करेंगे।
मन्द ठंडी बयार है ,सोंधी खुशबू है। ढेरों गौरैया भी अपनी बीती रात के किस्से आपस मे चहचहा रही हैं। बादलों के कजरारे से टुकड़े बड़ी तेजी से बहे चले जा रहै हैं जैसे सोई हुई खूबसूरत आंखों से काजल का धुआं बह रहा हो उन्ही के गालों पे।
बरसने का मन है आज शायद बादलों का और दास्तानों का भी।
"तुम कहीं आसपास तो नही।"
शाम को कुछ लिख रहा था ,अधूरा ही रह गया। शाम भी अधूरी रह गई और बात भी। यूँ तो बहुत सी अधूरी शाम के बचे हुए टुकड़े इकट्ठे कर लिए हैं। यह रंग बिरंगे टेढ़े मेढ़े टुकड़े, शामों के ,एक साथ मिलकर एक खूबसूरत कोलाज बना देते है जो नीम अंधेरों में जुगनू सा दमकते रहते है।
"कभी कभी बचा हुआ हिस्सा जो अपने हिस्से नही आता, तमाम किस्से कह जाता है।"
आज एक पौधा देखा ,उसमे फूल कुछ ऊपर उठ कर खिलता है। उसमें कांटे भी है पर फूल शायद खुद उठ कर कुछ इस तरह खिलता है कि उसे छूने वाले को कांटे चुभ न सके।
"व्यक्ति को भी ऊपर उठ कर खिलना चाहिए जिससे अगर उसकी संगत में कुछ कांटे हो भी तो किसी और को आघात न पहुंचायें।"
पेड़ों के गलों में हाथ डाल चहलकदमी करने का जी करता है।
हवाओं के रुख से बाल संवारने को जी करता है।
चिड़ियों से चोंच मिलाने का जी करता है।
तितलियों को पलकों पे धरने का जी करता है।
शंख के कान में फुसफुसाने का जी करता है।
चांद की रोशनी में नदी का कोना खींच ओढ़ लेने का जी करता है।
"अंगुलियों का अंगुलियों से बात करने का जी करता है।"
रात कितनी चुपके से आती है। कभी कभी तो मुझसे पहले से आकर कोने में बैठी मिलती है। वक्त का हिसाब रखना शायद रात को नही आता। किसी की दो पल में कट जाती है और किसी की एक रात ज़िन्दगी भर नही बीत पाती।
अगर चन्द्रमा के पटल पर दो सुइयां भी होती जो वक्त बताती रहती तो फिर रात को वक्त बिताने के लिए खुले आसमान में एक घड़ी का सहारा मिल जाता।
"घड़ी पास हो तो वक्त अपना सा लगता है।"
सवेरा रोज़ कितनी चुपके से आता है , फिर भी नींद खुल जाती है ।
तुम्हारी बातें भी तो ऐसे ही मुझ तक पहुँच जाती है चुपके से जबकि तुम कुछ बोलते ही नहीं ।
देखो फिर चिड़िया चहचहा रही हैं , यक़ीनन तुम आँखे खोल बरबस एक बार मुस्कुराये हो अभी ।
यह लालिमा सुबह की है या फिर एक बार ओढ़ ली है तुमने चादर लाज की ।
साथ चलते चलते अक्सर किसी मोड़ पर ही लोग साथ छोड़ते हैं। मोड़ पर पीछे मुड़ कर देखने पर वह दिखता जो नही है। सीधे रास्तों पर अलग हुए तो बहुत दूर तलक तक वो दिखता रहता है और फिर मुंह मोड़ना आसान नही होता है शायद।
राहें बदलनी हो, बस मोड़ आने दो,
मुड़ कर न देखो, उन्हें बस दूर जाने दो।
#मोड़ज़िन्दगीके
गुस्सा स्वयं को अनुशासित करता है।
प्यार अनुशासन में रियायत की गुहार करता है।
अनुशासन प्यार को कच्ची मौत देता है।
मैं अनुशासन तोड़ना चाहता हूँ।
पुल इतना सहज हो कि
सड़क सा लगने लगे तब नदी हाशिये पर चली जाती है।
"मोहब्बत जब इतनी सादगी से हो कि
विसाले यार की तलब न हो तब दुनिया हाशिये पर चली जाती है।"