रेलगाड़ी घुमावों पर बहुत लुभाती है। सीधी चलती रहने पर सभी डिब्बों को एक दूसरे के आगे पीछे होने का भ्रम होता है पर घुमावों पर गोल हो कर मुड़ते समय इंजन भी सबसे पिछले डिब्बे को देख पाता है और पुलकित होता है।
गद्य और कविता में बस इतना ही अंतर होता है। गद्य में भाव आगे पीछे कतार में होते हैं जबकि कविता में लोच होने के कारण अंतिम पंक्ति भी पहली पंक्ति से जुड़ाव रखती है।
कविता हृदय से उपजती है और गद्य मस्तिष्क से। इसीलिये कविताएं लिखते समय बस शब्द रिस जाते हैं और हृदय हल्का हो उठता है।
"घुमाव पर ज़िन्दगी"
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कसूर तो बहुत किये,
ज़िन्दगी में मगर,
सज़ा वहाँ मिली,
जहाँ बेकसूर थे,
जलाए चराग हमने,
अंधेरों में अक्सर,
मुस्कुराए वो मगर तब,
जब हम बेनूर थे।
