फूलों की माला पिरोते समय धागे के एक सिरे पर गाँठ सी बाँध लेते है फिर दूसरे सिरे से चुन चुन कर फूल पिरो देते हैं । सामने रखे रंग बिरंगे छोटे बड़े फूल पिरोये जाने के बाद एक सुन्दर सी माला बन सज उठते है ।
परंतु अगर दूसरे सिरे की गांठ अगर असावधानी वश खुल जाये तो सारे पिरोये हुए फूल बिखर जाते हैं ।
"बातें करना तुमसे , वो भी लफ़्ज़ों को एक माला में पिरोने जैसा ही तो है पर लफ़्ज़ों की शुरुआत में चाहत की गाँठ तो लगा लिया करो , इसके बगैर सारे लफ्ज़ , जिन्हें न जाने कहाँ कहाँ से चुन चुन कर लाता हूँ , बिखर से जाते हैं ।"
"न बिखरे हुए फूल अच्छे लगते है और न ही लफ्ज़ ।"
होता है , फूलों का बिखेरा जाना और लफ़्ज़ों का बुदबुदाया जाना भी ,मगर मज़ार पर ।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें