शून्य के भीतर भी ,
होते हैं बहुत सारे शून्य ,
जब जब तुम चुप हुए ,
शून्य अटकते गए ,
एक के भीतर एक ,
फिर एक और एक,
कितनी भी बातें ,
कोई और कर ले ,
शून्य में गूँज ,
फिर कभी नहीं ,
पहला शून्य गर तुम ,
रख देते अलग ,
बस दो बोल ,
बोल तो देते ,
शून्य के पीछे शून्य ,
बहुत सारे शून्य,
दौड़े चले आते,
सब एक कतार में,
करने लगते अठखेलियां
वही सारे शून्य ,
बन कभी निगाहें और ,
कभी तबस्सुम तुम्हारी ।
- ©अमित

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