बुधवार, 10 जून 2026

शून्य की गूंज।

 शून्य के भीतर भी ,

होते हैं बहुत सारे शून्य ,

जब जब तुम चुप हुए ,

शून्य अटकते गए ,

एक के भीतर एक ,

फिर एक और एक,

कितनी भी बातें ,

कोई और कर ले ,

शून्य में गूँज ,

फिर कभी नहीं ,

पहला शून्य गर तुम ,

रख देते अलग ,


बस दो बोल ,

बोल तो देते ,

शून्य के पीछे शून्य ,

बहुत सारे शून्य,

दौड़े चले आते,

सब एक कतार में,

करने लगते अठखेलियां

वही सारे शून्य ,

बन कभी निगाहें और ,

कभी तबस्सुम तुम्हारी ।


- ©अमित

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