ऐसा बताया जाता है कि पहले मनुष्यों के पूँछ होती थी , निष्प्रयोज्य होने के कारण धीरे धीरे लुप्त हो गई।
यह बात ध्यान में आते ही मुझे आभास हुआ कि मेरे भी पूँछ है और वो मुझे कहीं चुभ रही है। टटोल कर देखा तो एसी का रिमोट सोफे और मेरे बीच टोल प्लाजा के बैरियर की तरह अड़ा पड़ा था।
कल्पना और आगे बढ़ी और उस लोक में मुझे ले गई जिसे हम पूँछ लोक कह सकते हैं।
ड्राइंग रूम में गेस्ट बैठे है बच्चे बार बार उधर से ही निकल रहे हैं। मैं बच्चों को बता रहा हूँ, देखो ध्यान से दौड़ो ,कहीं अंकल की पूँछ पर पैर न पड़ जाए और देखो आंटी की नई नई शैम्पू की हुई पूँछ है उठा कर उसके नीचे से निकलो।
स्कूल जाते समय मम्मी लोग स्कूली रिक्शे वाले को डांट रही होती , कितनी बार कहा रिक्शा चलाते समय अपनी पूंछ से बच्चों को डिस्टर्ब न किया करो ,उन्हें गुदगुदी लगती है।
ड्रेस खरीदते समय दुकानदार बताता , साहब पैंट के साथ यह पूँछ कवर एकदम फ्री है और कंट्रास्ट में बहुत अच्छा लगेगा।
सोते समय मियां बीबी में लड़ाई होती , अपनी पूँछ इधर मत रखो अपने ऊपर ही रखो, नही तो अभी उमेठ दूंगी।
मोहल्ले के बच्चे लड़ते लड़ते अपनी पूँछ आपस मे उलझा लेते फिर उनके पापा मम्मी लड़ते लड़ते उसे सुलझाते।
लोग एक दूसरे को पीछे से ही पूँछ के आकार प्रकार से पहचान लेते।
शादी के समय वर वधू की पूँछ को आपस मे गांठ बांध कर फेरे लगवाते।
पूँछ का शैम्पू तेल परफ्यूम अलग से मिलता।
लेटेस्ट : पूँछ पर लोग टैटू भी बनवा लेते तरह तरह के।
काश कि पूँछ फिर से उग आये।
