"बस यूँ ही " .......अमित
"शब्द भीतर रहते हैं तो सालते रहते हैं, मुक्त होते हैं तो साहित्य बनते हैं"। मन की बाते लिखना पुराना स्वेटर उधेड़ना जैसा है,उधेड़ना तो अच्छा भी लगता है और आसान भी, पर उधेड़े हुए मन को दुबारा बुनना बहुत मुश्किल शायद...।
शनिवार, 1 अगस्त 2026
एक ख़त प्यारा सा।
गुरुवार, 23 जुलाई 2026
मोहब्बत।
शुक्रवार, 17 जुलाई 2026
लकीरें वक्त की।
काजल बनाम रात।
बेतरतीब।
शनिवार, 4 जुलाई 2026
आँखें
गुरुवार, 2 जुलाई 2026
बारिश संग भुट्टा।
बारिश में ड्राइव करते हुए भुट्टा खाना मेरी पसंद की लिस्ट में सबसे ऊपर है। एक हाथ से ड्राइव और दूसरे हाथ मे भुट्टा घुमाते घुमाते खाते हुए गाना सुनने का एक अजीब सा मिजाज होता है।
निगाह तो सामने सड़क पर होती है और गोल घुमाते हुए भुट्टे के दाने दांतों के नीचे आते रहते है। कभी कच्चा सा दाना कच से अपना दूध छोड़ देता है तो कभी एकदम जला हुआ दाना कर्र कर्र करता हुआ कोयला सा जीभ पर ठहर उठता है।
यह रोटेटिंग भुट्टा हाथ मे एकदम ज़िन्दगी की तरह ही तो होता है, कभी चटपटा कभी ,कचकचा और कभी जला हुआ फिर भी स्वाद देता हुआ और सबसे खास बात यह कि जब और खाने का मन करता है तभी एकदम से खत्म हो जाता है।
यही ज़िन्दगी है।
