शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

लकीरें वक्त की।

तुम्हारा वक्त कुछ अलग सा चलता और हमारा कुछ अलग सा ही रहता। बेचैन तुम भी और सुकून हमे भी नही। 

हाथ मिलाने से लकीरें क्यों नही मिल जाती आपस मे। 

पर दो तरह के वक्त आपस मे घुलते नही शायद। वक्त के भी  बहुत से रंग होते हैं।

काजल बनाम रात।

'रात' अब उतनी गाढ़ी नही होती कि उस के आर पार न दिखाई दे।रात के उस पार उजाला सा रहता है जिसे इस पार से छूने की ख्वाहिश में नींद भी नही आती फिर।

आज रात को भर लिया एक मर्तबान में, कांच के, और छोड़ दिया उसे,निथरने के लिए। थोड़ी ही देर में रात नीचे बैठ गई गाढ़ी होकर, थोड़ी सी ही जगह में। पूरे मर्तबान में ऊपर तक भरा हुआ था, बस धुँवा धुँवा सा ,हल्का हल्का, बहा हुआ काजल आंखों का।

रात काजल से बनती है या काजल रात से ,पता नही। हाँ,गाढ़ा अब कुछ नही होता और इसीलिए नींद भी फिसल सी जाती है ,आंखों से शायद।

बेतरतीब।

सबसे बेतरतीब बादल होते हैं और उतने ही साधारण भी। बादल का चित्र बनाना कितना आसान होता है ।

चिटकी जमीन हो या हो कच्ची दीवार,कहीं भी दो क्षण निगाह ठहर जाए तो बादल बना हुआ दिख जाता है। 

"बेतरतीबियों के भी पैटर्न होते है जिनमे बहुत तरतीब से रहस्य संचित होते है।"

"बेतरतीब तुम भी तो रहे हमेशा शायद इसीलिए।"

शनिवार, 4 जुलाई 2026

आँखें


वो : आंखों में जो लाल डोरे से होते हैं न, दरअसल वो क्यू आर कोड होते हैं। उनमें देखते ही सारी बात दिल की जुबान पर आ जाती है।
हम : अच्छा, और।

वो : पलकें क्यू आर कोड बदलती रहती हैं और दिल की तुरपन खुलती जाती हैं।
हम : हम्म

"बातें जो हुई होतीं अगर हमने की होतीं।"

गुरुवार, 2 जुलाई 2026

बारिश संग भुट्टा।



बारिश में ड्राइव करते हुए भुट्टा खाना मेरी पसंद की लिस्ट में सबसे ऊपर है। एक हाथ से ड्राइव और दूसरे हाथ मे भुट्टा घुमाते घुमाते खाते हुए गाना सुनने का एक अजीब सा मिजाज होता है। 

निगाह तो सामने सड़क पर होती है और गोल घुमाते हुए भुट्टे के दाने दांतों के नीचे आते रहते है। कभी कच्चा सा दाना कच से अपना दूध छोड़ देता है तो कभी एकदम जला हुआ दाना कर्र कर्र करता हुआ कोयला सा जीभ पर ठहर उठता है।

यह रोटेटिंग भुट्टा हाथ मे एकदम ज़िन्दगी की तरह ही तो होता है, कभी चटपटा कभी ,कचकचा और कभी जला हुआ फिर भी स्वाद देता हुआ और सबसे खास बात यह कि जब  और खाने का मन करता है तभी एकदम से खत्म हो जाता है।

यही ज़िन्दगी है।

मंज़िलें।

 #मंजिल #मकान #की #या #ज़िन्दगी #की


मकान ऊँचा था ,

इंसान इतराया,

वक्त भी बौना लगा।

वक्त रीता ,

रीता रेत भी ,

आसमान मुस्कुराया।

वक्त फिसल गया,

हाथ छूट गया,

इंसान बौना रह गया।

सीमेंट रेत सरिया,

खुद कभी मजबूत कहाँ,

वक्त ही निभाता इन्हें।

"वक्त गर मजबूत ,

झोपड़ी को भी हासिल हुनर ,

पनाह का महलों को।"


©अमित

मंगलवार, 30 जून 2026

ज़िंदगी

ज़िन्दगी को अपनी ओर खींचते खींचते हाथ कब सद्दी से मांझे पर आ गया ,पता ही नही चला और अंगुलियां लहूलुहान हो गईं।

"कुछ लम्हे मांझे सरीखे होते हैं , जो कत्ल भी करने का माद्दा रखते हैं।"