गुरुवार, 7 मई 2026

बातें शहद सी।

केचप की बॉटल हो या शहद का जार हो उससे सॉस या शहद उड़ेलने के बाद उसके मुँह के कगार पर जो सॉस या शहद लगी रह जाती है उसे प्रायः अंगुली से लपेट कर उसे चूमते हुये उस पर लगी सॉस या शहद हम चट कर जाते हैं।

आज उनके मुँह से शहद सी बातें निकल रही थीं। मन तो किया कि हथेली से ढक्कन बन्द कर दें और.......😊

मंगलवार, 5 मई 2026

पूँछ।

ऐसा बताया जाता है कि पहले मनुष्यों के पूँछ होती थी , निष्प्रयोज्य होने के कारण धीरे धीरे लुप्त हो गई।

यह बात ध्यान में आते ही मुझे आभास हुआ कि मेरे भी पूँछ है और वो मुझे कहीं चुभ रही है। टटोल कर देखा तो एसी का रिमोट सोफे और मेरे बीच टोल प्लाजा के बैरियर की तरह अड़ा पड़ा था।

कल्पना और आगे बढ़ी और उस लोक में मुझे ले गई जिसे हम पूँछ लोक कह सकते हैं।

ड्राइंग रूम में गेस्ट बैठे है बच्चे बार बार उधर से ही निकल रहे हैं। मैं बच्चों को बता रहा हूँ, देखो ध्यान से दौड़ो ,कहीं अंकल की पूँछ पर पैर न पड़ जाए और देखो आंटी की नई नई शैम्पू की हुई पूँछ है उठा कर उसके नीचे से निकलो।

स्कूल जाते समय मम्मी लोग स्कूली रिक्शे वाले को डांट रही होती , कितनी बार कहा रिक्शा चलाते समय अपनी पूंछ से बच्चों को डिस्टर्ब न किया करो ,उन्हें गुदगुदी लगती है।

ड्रेस खरीदते समय दुकानदार बताता , साहब पैंट के साथ यह पूँछ कवर एकदम फ्री है और कंट्रास्ट में बहुत अच्छा लगेगा।

सोते समय मियां बीबी में लड़ाई होती , अपनी पूँछ इधर मत रखो अपने ऊपर ही रखो, नही तो अभी उमेठ दूंगी।

मोहल्ले के बच्चे लड़ते लड़ते अपनी पूँछ आपस मे उलझा लेते फिर उनके पापा मम्मी लड़ते लड़ते उसे सुलझाते।

लोग एक दूसरे को पीछे से ही पूँछ के आकार प्रकार से पहचान लेते।

शादी के समय वर वधू की पूँछ को आपस मे गांठ बांध कर फेरे लगवाते।

पूँछ का शैम्पू तेल परफ्यूम अलग से मिलता।

लेटेस्ट : पूँछ पर लोग टैटू भी बनवा लेते तरह तरह के।

काश कि पूँछ फिर से उग आये।



बुधवार, 29 अप्रैल 2026

चाय

चाय ऑफर करने के पीछे मकसद 

कुछ समय साथ बैठने का होता है , 

चाय पिलाने का नहीं ।

सोमवार, 20 अप्रैल 2026

नियति / प्रारब्ध / भाग्य

"नियति व्यापकता लिए हुए है। नियति संसार की होती है ,इसे ही  प्रकृति की चाल कहते हैं।"

"प्रारब्ध आपके हिस्से की नियति है।"

"भाग्य आप अपने कर्म से बनाते है। कर्मफल को रेट्रोस्पेक्ट में देखते है तो भाग्य कहलाता है।"

शनिवार, 18 अप्रैल 2026

बोन्साई

बीती रात एक समूची नींद नहीं थी,अक्सर ऐसा होता है अब।

छोटे छोटे से टुकड़ों में अलग अलग बनती बिगड़ती रहती है।हर एक छोटी सी नींद के टुकड़े में बड़े बड़े ख्वाब उगते रहते हैं।

तुम्हे बोनसाई से बहुत प्यार है न। बरगद ,पीपल जैसे वृक्ष छोटे छोटे से गमलो में।

ख्वाबों के भी बोनसाई बना लिए है अब मैंने , छोटी छोटी सी नींद के गमलों में।

यह ख्वाब पास से छू कर देखना ,पसंद आएंगे तुम्हे।

गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

आंखें/नज़्म

नींद न पूरी हो तो आंखे इश्तिहार हो जाती हैं।

नज़्म भी एहसासों का इश्तिहार ही तो है ।

"यानी आंखों को नज़्म कहना गुनाह नही।"

सुबहें सारी खूबसूरत होती हैं, इसमें कोई शुबह नही , क्योंकि बहुत सारी नज़्में एक साथ लिख दी जाती हैं काजल की लकीरों से।

मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

कुछ तो नया करें।

सोचता हूँ ज़िन्दगी में ऐसा कुछ नही किया जिस पर फख्र किया जा सके। पूरे जीवन मे एक बानगी तो ऐसी हो जिसके सहारे इस जीवन रूपी गिफ्ट के बदले ईश्वर को रिटर्न गिफ्ट दी जा सके।

पतंग उड़ती देख सोचता हूँ पतंग का अविष्कार करने वाला भी कितना विद्वान रहा होगा। 

वो बिरले ही होते है जिन्हें ऐसे कुछ नया करने की कुदरती नेमत मिलती है।

पूरे देश मे किसी भी क्षेत्र में जो पी एच डी लोगों को दी जा रही है उसके विषय मे एक श्वेत पत्र जारी किया जाना चाहिए कि उन लोगों के कार्य से लोगों के जीवन मे क्या गुणात्मक परिवर्तन हुआ है या भविष्य में होगा।

"शून्य का अविष्कार हमने किया है ,इसे कितने युगों तक भुनाते रहेंगे। बनाने वाले तो पब जी ,टिक टॉक और उनो जैसे गेम बनाकर अमर हो गए।"

आईआईटी से  भी डिग्री मिलने में यह बाध्यता होनी चाहिए कि विद्यार्थी ने उन चार या पांच सालों में कोई नई सोच,कांसेप्ट या थ्योरी संकल्पित भी की अथवा नही। 

एमबीए और सीए का ध्येय बस एक रहता है कि रुपये में पांच चवन्नी कैसे बनाई जाए। जितने भी बिजनेस मॉडल है सबमे उपभोक्ता का और कार्मिकों का शोषण ही है। जहां यह बेहतर है वो इसलिए कि वहां लाभ का मार्जिन अप्रत्याशित रूप से बहुत अधिक है।

प्रत्येक उच्च शिक्षित व्यक्ति की यह सोच  होनी चाहिए कि ऐसा क्या करें कि जीवन सरल हो जाये, चाहे वो कृषि का क्षेत्र हो, मनोरंजन,खेल का क्षेत्र हो या चिकित्सा सुविधा का ही क्षेत्र हो या जीवन का कोई भी क्षेत्र हो।

दरअसल समाज की प्रचलित सोच ही नए युवकों की सोच को प्रभावित करती है। प्रचलन ही यही है कि डिग्री लो नौकरी करो मशीनी ज़िन्दगी जियो ,कुछ नया करने की न सोच है न जरूरत है।

जीवन व्यर्थ न हो जाये कुछ तो करना होगा।

इन क्षेत्रों में कुछ नया किये जाने की आवश्यकता है :

१. कृषि के क्षेत्र में। किसी भी आपदा या विपदा में खड़ी फसल कैसे सुरक्षित रहे ,इस पर कोई काम नही किया गया।

२.रेन हार्वेस्टिंग ,यह केवल सेमिनार और एन जी ओ तक ही सीमित है।

३.टाउन प्लानिंग , क्या छोटे और क्या बड़े शहरों कस्बो का बारिश में बुरा हाल होता है। जल निकासी का कोई कॉन्सेप्ट ही नही।

४.आउटर रिंग रोड कब इनर रिंग बन जाती है पता ही नही चलता। प्लानिंग बहुत लंबे समय के हिसाब से की जानी चाहिए।

५.सड़क दुर्घटनाये,रेल दुर्घटनाये तकनीकी रूप से कैसे कम की जाएं कोई ब्लू प्रिंट नही।

६.,गांव शहर की तरफ रुख न करें इस पर कोई ठोस प्लान नही।

७.RPL रिकग्निशन ऑफ प्रायर लर्निंग एक अच्छी पहल है सरकार की ,परन्तु लाभ नही मिला जिन्हें मिलना चाहिए था।

८.पंचर बनाना, साईकल रिपेयर, बाइक रिपेयर,प्लम्बर,इलेक्ट्रीशियन,हेयर ड्रेसर जैसे कामो के लिए मॉड्यूल विकसित किया जाता। जिसे गांव गांव तक विस्तारित  करते और सम्मान भी मिलता।

शोषण कैसे होता है इनका, अर्बन क्लैप वालों से समझिये।

९.स्कूली शिक्षा कम हो व्यवहारिक ज्यादा हो और रोजगार परक हो ,बहुत सुधार की आवश्यकता है।

१०.गांव के स्तर पर नर्सों की भर्ती और उन्हें प्रेरित कर स्वास्थ्य के क्षेत्र में सम्मलित किया जाना ,यह गेम चेंजर हो सकता समाज के लिए।

कुछ तो करें ,न करें तो सोचे ही कुछ नया। कब तक महाभारत और रामायण देख खुश होते रहेंगे। उस समय के ऋषियों मुनियों जैसी विद्या ही हासिल कर ली जाए दुबारा।