मंगलवार, 10 मई 2022

नज़्म का पहरा

 लफ्ज़ लफ्ज़ तेरा बेचैन करता रहा रात भर,

ख़त में लिख दे इन्हें या नज़्म का पहरा कर दे।


तकाज़ा दिल का था फिर इल्जाम जुबां पे क्यों,

मौसम बंजर बहुत इन आँखों को अब झरना कर दे।


दीदारे जुनू न रहा कोई बात नही अब 'अमित',

पलकें मचलती है बस इत्ते इल्म का सौदा कर ले।


दस्तक दें जब कभी सांसें मेरी दिल पे तेरे

लबों से चूम लेना नाम मेरा इत्ता सा वादा कर ले।

एक लड़की पहाड़ों में।

 वजह क्या जो उदास करती है,

ये लड़की खुद के पास रहती है, 


आंखे बोलती है मगर लब चुप हैं,

कुछ तो है जो भीतर घात करती है।


खिलखिलाता फूल अब गुमसुम क्यो,

भवरां बन काँटों का साथ धरती है।

रविवार, 8 मई 2022

शहद सी तुम

दूरियां तो बहुत है दरमियां

पर मन तो दूर नही न।


कुछ तुम कहो कुछ हम कहे,

बातें तो कभी खत्म न हो न।


चांद वहां आसमान यहां भी,

पहलू में सिमट कभी आओ न।


सांसे लो तुम पलकें गिरें यहां,

ख्वाब में रोज़ यूं ही आओ न।


शहद सी तुम मिष्टी सी बातें

खुल कर कभी खिलखलाओ न।

रविवार, 17 अप्रैल 2022

हाउस कीपिंग के कुछ टिप्स


१.घर की धूल धक्कड़ की सफाई,झाड़ू पोछा को हमेशा हाउस कीपिंग बोलिये। पिज़्ज़ा टाइप फीलिंग आती भले ही आप चिल्ला खा रहे हों।

२.झाड़ू लगाते समय साथ मे हमेशा डस्ट पैन और डस्ट बिन रखिये। छोटे छोटे टुकड़े में झाड़ू लगाइए और तुरन्त कूड़ा उठाकर डस्ट बिन भरते चलिए। ऐसा करने से ढेरों कूड़ा एक साथ बुहारना नही पड़ेगा। सफाई ज्यादा अच्छी होगी और जल्दी होगी। एक कमरे का कूड़ा दूसरे कमरे में दखल नही दे पाएगा।

३.डस्टिंग हमेशा झाड़ू से पहले करिये जिससे डस्टिंग करने में कोई आइटम शो पीस टाइप टूट टाट कर गिर जाए तो झाड़ू बुहारने में उठ जाए।

४. पोछा वाईपर में ही कपड़ा फंसा कर लगाए। खड़े खड़े पोछा लगाना सरल होता है। बैठ कर पोछा लगाने में मोबिलिटी कम होती है।

५. पोछा लगाने में समय उतना ही खर्च कीजिये जितना कामवाली समय लगाती है नही तो सुनने को मिल सकता कि इत्ती जल्दी कैसे हो गया,कोई कमरा छूट गया क्या। 

६. पोछा लगाते समय कमरा बन्द रखिये और थोड़ी देर जमीन पर पसर कर आराम कर लीजिए। पोछा लगाने का मन न हो तो खाली फिनायल या लाइज़ोल छिड़क कर पोछ दीजिये। "खुशबू अच्छे अच्छे राज़ दबा देती है।"

७.झाड़ू पोछे के दौरान बीच बीच मे कमर पर हाथ जरूर रखिये थकान दिखाने के उद्देश्य से। पूछने पर दर्द का अभिनय जरूर कीजिये।

८. इस काम मे जोश कभी न दिखाइए न ही कभी तारीफ सुन कर मुदित होइये।

९.बॉस का फोन आये तो बोलिये , होल्ड करिये सर,अभी हाथ मे झाड़ू बाल्टी होल्ड किये है।

१०.झाड़ू पोछे का काम फिजिकल व्यायाम समझ कर करिये। साथ मे म्यूजिक चला लीजिये तो ज़िन्दगी आसान हो जाएगी।


विशेष : बर्तन मांजने का प्रस्ताव या इच्छा जाहिर की जाए उस पक्ष से तो कभी स्वीकार न करें। यह काम सबसे मुश्किल है। इस काम के लिए उनकी तारीफ करते रहिए, कोशिश कीजिये कि बर्तन कम से कम जूठे करें आप, सुखी रहेंगे।


जनहित में जारी।

सोमवार, 8 नवंबर 2021

फ़ैज़ाबाद जंक्शन

 फैज़ाबाद जंक्शन 

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हमारा जन्म लखनऊ में हुआ मगर लगभग जन्म के बाद से ही सारा बचपन फैज़ाबाद जिले में कक्षा 12 तक रेलवे कॉलोनी में ही बीता।

रेलवे कॉलोनी प्रायः रेलवे स्टेशन के पास ही होती है। फैज़ाबाद की रेलवे कॉलोनी दो हिस्से में बनी हुई थी एक स्टेशन के सामने के हिस्से में और दूसरी स्टेशन के पीछे, जिसे लोको कॉलोनी कहते थे।

हम लोग लोको कॉलोनी में रहते थे। शहर जाने के लिए लोको कॉलोनी से निकल कर एक पुल पार कर जाना होता था। यह पुल रेलवे पटरियों के ऊपर से होकर दोनो कॉलोनी को जोड़ता था। पुल पर गुजरते समय नीचे तमाम डिब्बे, इंजन , गाड़ियां खड़े मिलते या शंटिंग करते रहते थे।

पुल का दूसरा छोर जहां खत्म होता था,  वही बोर्ड लगा था फैज़ाबाद जंक्शन का। इसी नाम पट को देखते देखते याद हो गया था कि फ़ और ज़ के नीचे नुक्ता लगता है। इसी के पास एक पीले रंग का बहुत बड़ा सा एल शेप का पानी भरने का घूमने वाला मोटा सा पाइप लगा था जिससे इंजन में पानी भरा जाता था। 

कोई ट्रेन आती और रुकती तो इंजन का धुआं सारे पुल को घेर कर अंधेरा कर देता था। हम लोग अक्सर तेज़ कदमो से उसी धुंए को चीरते हुए आगे बढ़ते जाते थे।

कभी कभी प्योर स्टीम निकल कर ऊपर उठती थी एकदम सफेद ,उससे होकर गुजरने पर जाड़ों में गरम गरम अच्छा भी लगता था।

चूंकि पापा रेलवे में थे तो सफर ट्रेन से झमाझम होता था। कुछ बातें हम लोग अपने आप ही समझ लेते थे , जैसे कि चलती हुई ट्रेन में अगर डिब्बे के नीचे से पटरियां निकलने लगे तो समझो कोई स्टेशन आने वाला है। जंक्शन मतलब कोई बड़ा स्टेशन होता था।

जी आई सी में पढ़ने के दौरान घर से स्कूल पटरियों के किनारे किनारे से जाना होता था। उस समय पटरियों पर दौड़ने में कम्पटीशन होता था। एक बार मालगाड़ी के डिब्बे में चढ़ते किसी ने देख लिया तो घर पर शिकायत हो गई थी फिर दो तीन दिन तक क्या क्या सूजा रहा बताना उचित नही।

स्टीम इंजन , गार्ड का डिब्बा , वैक्यूम ब्रेक, वैक्यूम वैन इन सब का भरपूर अभ्यास और विश्लेषण उसी जमाने मे कर लिया था। सिग्नल कैसे तार से खींचने से ही अप और डाउन हो जाता था बखूबी समझते थे। 

रेलवे स्टेशन पर ए एच व्हीलर से कॉमिक्स फ्री में लाकर पढ़ना एकदम आसान था गोया घर की ही दुकान हो।

अखबार में आज फैज़ाबाद जंक्शन लिखा देखकर एक अजीब सी फीलिंग हो गई आज। 

आज से इसका नाम बदल कर अयोध्या कैंट कर दिया गया। जंक्शन क्यों हटा दिया पता नही। जबकि जंक्शन अमूमन वहां लिखते है जहां दो दिशाओं के अतिरिक्त भी किसी अन्य दिशा में ट्रेन का आवागमन होता है।

फैज़ाबाद इतनी जल्दी जेहन से कैसे मिटेगा पता नही।

शनिवार, 23 अक्तूबर 2021

सोचता हूँ अक्सर।

 सरकारी कर्मचारी ,अधिकारी को हर दस्तखत करने से पहले यह सोचना चाहिए कि जिस विभाग में वह नौकरी कर रहा है, उसका मूल उद्देश्य और लक्ष्य क्या है,  उसके उस किये जाने वाले दस्तखत से व्यक्तिविशेष अथवा विभाग के उद्देश्य पर क्या असर अथवा फर्क होगा।

बिजली विभाग उपभोक्ताओं की सेवा के लिए है। उस दस्तखत से अगर उपभोक्ता हित में कोई फर्क नही पड़ रहा अथवा लाभ नही हो रहा है तब वो दस्तखत व्यर्थ और स्याही का अपव्यय ही है।

परोक्ष अथवा अपरोक्ष रूप से हर निर्णय अथवा निर्णय की पहल से विभाग का उद्देश्य ही सिद्ध होना चाहिए तभी विभाग का मानसिक विकास सम्भव है।

सरकारी नौकरी एक अमूल्य अवसर की प्राप्ति होती है, जिसमे होते हुए एक छोटा से छोटा कर्मचारी बहुत बड़े निर्णय अथवा छवि बनाने में अपना योगदान दे सकता है।

इन कार्मिकों के परिवारों का भी दायित्व है कि अगर कार्मिक समय से आफिस न जाता हो या समय से पहले ऑफिस से घर आ जाता हो तो उसे टोका जाना चाहिए। 

होता जबकि इसके विपरीत है , परिवार के लोग बड़े उत्साह से उसकी तारीफ करते है कि ये तो आराम से दफ्तर जाते और जल्दी आ जाते है , बड़े अफसर है कोई पूछता नही।

देश के विकास और प्रगति में उस महिला का भी योगदान है जो अपने पति को आफिस के लिए अनुशासित करती है और दूसरों को देख कोई अनुचित अपेक्षा नही करती है।

शनिवार, 16 अक्तूबर 2021

बैंक...

 अभी ऑफिस से लौटते समय अचानक बीच रास्ते 'फुल ट्रैफिक' में कार बंद हो गई । तमाम कोशिशों के बावजूद 'स्टार्ट' नहीं हुई । पीछे लम्बा 'जाम' लग गया । 'प्रॉब्लम' बैटरी की लग रही थी । अब नीचे उतर कर मैं कार को धकेल कर किनारे करना चाह रहा था । चूंकि बैटरी एकदम ज़ीरो हो गई थी ,कार का शीशा नीचे कर पाना असंभव हो गया ,नहीं तो शीशा नीचे कर दरवाजा बंद कर बाहर से ही एक हाथ से स्टीयरिंग पकड़ कर दूसरे हाथ से धकियाते हुए थोड़ा किनारे तक तो कर ही लेता । 

अब शीशा बंद , फिर स्टीयरिंग पकड़ने के लिए दरवाजा खुला रख कर एक हाथ से स्टीयरिंग और दूसरे से धक्का लगाने में बहुत समस्या हो रही थी । पीछे से ,अगल बगल से, सब पों पों किये शोर मचाते हुए ,मुझे घूरते हुए और कार के दरवाजे को लगभग छूते हुए निकल रहे थे । इस बीच मैंने कार सर्विस वाले का नंबर ढूँढा तो वह मोबाइल में मिला ही नहीं ,लेकिन तब तक ध्यान आया उसका स्टिकर पीछे लगा था शीशे पर । उसे फोन किया तो बोला ,मैं तुरंत आ रहा हूँ ,चिंता मत करिये । पर 'ट्रैफिक' के बीच में 'रोड' के मध्य से बाएं आना भी आसान नहीं है ,ऐसी स्थिति में । 

एक दो लोगों को मैंने मदद की प्रत्याशा में देखा भी ,पर सब जल्दी में निकले । इसी बीच ठीक मेरे पीछे एक कार आकर रुकी । उसमे से एक नवयुवती उतर कर मेरे पास आई और बोली ,"मैं अंदर बैठ कर स्टीयरिंग संभाल रही हूँ ,आप दरवाजा बंद कर पुश करिये ,मैं धीरे धीरे किनारे कर देती हूँ ,आप अकेले दरवाजा खुला रख कर कार को धकेल रहे हैं ,कोई रुक नहीं रहा है ,आपको चोट भी लग सकती है । "  मैंने उसकी बात मान ली और मेरी कार किनारे आ गई । 

उसको जाते हुए जब मैंने थैंक्स बोला तो उसने कहा ," i know you sir , you have been many times kind enough to help me out ,regarding electricity related issues,ok ,bye . पर मैं तो बिलकुल नहीं पहचान पाया था उसे ।  कार की बैटरी बदलवा कर अब मैं घर आ चुका हूँ।


"बैंक सिर्फ रुपये पैसे का नहीं होता  ,व्यवहार का भी होता है । "