बुधवार, 5 अगस्त 2026

चाँद पहलू में।

नींद खुल गई अचानक जब लगा कि किसी ने खिड़की थपथपाई हो आहिस्ते से। हल्के से दरार सी बनाते हुए पल्लों के बीच से झांका तो पीली पीली स्ट्रीट लाइट अंदर लुढ़कती हुई आ गिरी। लगा जैसे चाँद खिड़की से गुलेल पर रोशनी चढ़ा कर अंदर निशाना साध रहा हो।

पीली रोशनी में चाँद घुला घुला सा लगता है। अब पूरी खिड़की खोल दी मैंने और स्ट्रीट लाइट का पीला बल्ब निहार रहा हूँ ,लग रहा है जैसे चाँद उलझ गया हो बिजली के तारों में और कसमसा सा रहा है इन तारों के बीच।

मेरे आगोश में भी जब कभी चाँद कसमसाता है तो रोशनी कुछ यूँ ही पीली हो जाती है।

©अमित

शनिवार, 1 अगस्त 2026

एक ख़त प्यारा सा।

मैं ख़ुद तो सुबह की चाय नहीं पीती पर बाक़ी सबके लिए चाय बनाते वक्त आपकी चाय और अरारोट के बिस्किट याद आये जो आपने मुझे सजेस्ट किए थे।

आज भी मैं चाय बनाते वक्त एक गीत गुनगुना रही थी उस गीत में नायिका अपने नायक को कहती है कि शायद अब इस जन्म में मुलाक़ात हो न हो। 

तभी चाय पर उबाल आ गया। मैं उबाल को गैस धीमा करके  नीचे धकेलना चाहती थी मगर ठीक उस वक्त मुझे आपकी इतनी गहरी याद आई कि मैंने पेन को बर्नर से उतार दिया। 

चाय का उफान उतर चुका था मगर मेरे मन में बरबस एक उफान उठ खड़ा हुआ. चाय छानते हुए मैंने सोचा आपकी तन और मन की स्थिति कैसी होगी या अभी भी उदास होंगे या बीमारी से लड़कर खुद की साँसों का अनुशासन साध लिया होगा.

आज आपका बर्थडे था तो उगते सूर्य के साथ ही मैंने आपको बड़ी शिद्दत से याद किया। यादों की एक सबसे खराब बात यह होती है कि ये अपनी सुविधा से आती हैं भले ही हम उसके लिए तैयार हो या न हो। यादें आकर हमें हद दर्जे तक अस्त-व्यस्त करने की जुर्रत रखतीं हैं।

आज चाय के बहाने आपकी याद आई पर मुझे लगता है याद के लिए किसी बहाने की जरूरत नही होती है।

सुबह ही सोचा कि आपसे सही समय लेकर आपको फोन करूँगी मगर दिन चढ़ते-चढ़ते जिम्मेदारियों को पूरा करते करते यह विचार भी निस्तेज होकर मन से बह गया। 

मैं देर तक सोचती रही कि याद आने और बात करने में कोई सह-सम्बन्ध हो है नही इसलिए किसी की याद आने पर उसे क्या फोन करना, हो सकता है मैं आपको उस  दिन फोन करूं जिस दिन मुझे आपकी बिल्कुल याद न आई हो. 

फोन शायद एक जरूरत से,शिष्टाचार से जुड़ी क्रिया है और यादें किसी जरूरत की मोहताज़ नही हैं।

रात होते होते आपकी याद मुझे खुद से बेदखल न कर दें इसलिए मैंने तय किया है कि आज देर शाम अपनी फेवरेट कॉफ़ी की  जगह चाय ही पिऊँगी और ईश्वर से प्रार्थना करूँगी कभी आपसे चाय पर चर्चा या कॉफ़ी पर कन्वर्सेशन ज़रूर हो ❤️

गुरुवार, 23 जुलाई 2026

मोहब्बत।

ख़ुदा खुद को हम भी न समझ बैठें,
इतनी जल्दी भी मोहब्बत तुम कुबूल न कर लेना।

ये माना कि तपिश है कुछ उधर भी,
दस्तूर मोहब्बत के भी आसां कहाँ होते।

©अमित

शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

लकीरें वक्त की।

तुम्हारा वक्त कुछ अलग सा चलता और हमारा कुछ अलग सा ही रहता। बेचैन तुम भी और सुकून हमे भी नही। 

हाथ मिलाने से लकीरें क्यों नही मिल जाती आपस मे। 

पर दो तरह के वक्त आपस मे घुलते नही शायद। वक्त के भी  बहुत से रंग होते हैं।

काजल बनाम रात।

'रात' अब उतनी गाढ़ी नही होती कि उस के आर पार न दिखाई दे।रात के उस पार उजाला सा रहता है जिसे इस पार से छूने की ख्वाहिश में नींद भी नही आती फिर।

आज रात को भर लिया एक मर्तबान में, कांच के, और छोड़ दिया उसे,निथरने के लिए। थोड़ी ही देर में रात नीचे बैठ गई गाढ़ी होकर, थोड़ी सी ही जगह में। पूरे मर्तबान में ऊपर तक भरा हुआ था, बस धुँवा धुँवा सा ,हल्का हल्का, बहा हुआ काजल आंखों का।

रात काजल से बनती है या काजल रात से ,पता नही। हाँ,गाढ़ा अब कुछ नही होता और इसीलिए नींद भी फिसल सी जाती है ,आंखों से शायद।

बेतरतीब।

सबसे बेतरतीब बादल होते हैं और उतने ही साधारण भी। बादल का चित्र बनाना कितना आसान होता है ।

चिटकी जमीन हो या हो कच्ची दीवार,कहीं भी दो क्षण निगाह ठहर जाए तो बादल बना हुआ दिख जाता है। 

"बेतरतीबियों के भी पैटर्न होते है जिनमे बहुत तरतीब से रहस्य संचित होते है।"

"बेतरतीब तुम भी तो रहे हमेशा शायद इसीलिए।"

शनिवार, 4 जुलाई 2026

आँखें


वो : आंखों में जो लाल डोरे से होते हैं न, दरअसल वो क्यू आर कोड होते हैं। उनमें देखते ही सारी बात दिल की जुबान पर आ जाती है।
हम : अच्छा, और।

वो : पलकें क्यू आर कोड बदलती रहती हैं और दिल की तुरपन खुलती जाती हैं।
हम : हम्म

"बातें जो हुई होतीं अगर हमने की होतीं।"