नींद न पूरी हो तो आंखे इश्तिहार हो जाती हैं।
नज़्म भी एहसासों का इश्तिहार ही तो है ।
"यानी आंखों को नज़्म कहना गुनाह नही।"
सुबहें सारी खूबसूरत होती हैं, इसमें कोई शुबह नही , क्योंकि बहुत सारी नज़्में एक साथ लिख दी जाती हैं काजल की लकीरों से।
"शब्द भीतर रहते हैं तो सालते रहते हैं, मुक्त होते हैं तो साहित्य बनते हैं"। मन की बाते लिखना पुराना स्वेटर उधेड़ना जैसा है,उधेड़ना तो अच्छा भी लगता है और आसान भी, पर उधेड़े हुए मन को दुबारा बुनना बहुत मुश्किल शायद...।
नींद न पूरी हो तो आंखे इश्तिहार हो जाती हैं।
नज़्म भी एहसासों का इश्तिहार ही तो है ।
"यानी आंखों को नज़्म कहना गुनाह नही।"
सुबहें सारी खूबसूरत होती हैं, इसमें कोई शुबह नही , क्योंकि बहुत सारी नज़्में एक साथ लिख दी जाती हैं काजल की लकीरों से।
सोचता हूँ ज़िन्दगी में ऐसा कुछ नही किया जिस पर फख्र किया जा सके। पूरे जीवन मे एक बानगी तो ऐसी हो जिसके सहारे इस जीवन रूपी गिफ्ट के बदले ईश्वर को रिटर्न गिफ्ट दी जा सके।
पतंग उड़ती देख सोचता हूँ पतंग का अविष्कार करने वाला भी कितना विद्वान रहा होगा।
वो बिरले ही होते है जिन्हें ऐसे कुछ नया करने की कुदरती नेमत मिलती है।
पूरे देश मे किसी भी क्षेत्र में जो पी एच डी लोगों को दी जा रही है उसके विषय मे एक श्वेत पत्र जारी किया जाना चाहिए कि उन लोगों के कार्य से लोगों के जीवन मे क्या गुणात्मक परिवर्तन हुआ है या भविष्य में होगा।
"शून्य का अविष्कार हमने किया है ,इसे कितने युगों तक भुनाते रहेंगे। बनाने वाले तो पब जी ,टिक टॉक और उनो जैसे गेम बनाकर अमर हो गए।"
आईआईटी से भी डिग्री मिलने में यह बाध्यता होनी चाहिए कि विद्यार्थी ने उन चार या पांच सालों में कोई नई सोच,कांसेप्ट या थ्योरी संकल्पित भी की अथवा नही।
एमबीए और सीए का ध्येय बस एक रहता है कि रुपये में पांच चवन्नी कैसे बनाई जाए। जितने भी बिजनेस मॉडल है सबमे उपभोक्ता का और कार्मिकों का शोषण ही है। जहां यह बेहतर है वो इसलिए कि वहां लाभ का मार्जिन अप्रत्याशित रूप से बहुत अधिक है।
प्रत्येक उच्च शिक्षित व्यक्ति की यह सोच होनी चाहिए कि ऐसा क्या करें कि जीवन सरल हो जाये, चाहे वो कृषि का क्षेत्र हो, मनोरंजन,खेल का क्षेत्र हो या चिकित्सा सुविधा का ही क्षेत्र हो या जीवन का कोई भी क्षेत्र हो।
दरअसल समाज की प्रचलित सोच ही नए युवकों की सोच को प्रभावित करती है। प्रचलन ही यही है कि डिग्री लो नौकरी करो मशीनी ज़िन्दगी जियो ,कुछ नया करने की न सोच है न जरूरत है।
जीवन व्यर्थ न हो जाये कुछ तो करना होगा।
इन क्षेत्रों में कुछ नया किये जाने की आवश्यकता है :
१. कृषि के क्षेत्र में। किसी भी आपदा या विपदा में खड़ी फसल कैसे सुरक्षित रहे ,इस पर कोई काम नही किया गया।
२.रेन हार्वेस्टिंग ,यह केवल सेमिनार और एन जी ओ तक ही सीमित है।
३.टाउन प्लानिंग , क्या छोटे और क्या बड़े शहरों कस्बो का बारिश में बुरा हाल होता है। जल निकासी का कोई कॉन्सेप्ट ही नही।
४.आउटर रिंग रोड कब इनर रिंग बन जाती है पता ही नही चलता। प्लानिंग बहुत लंबे समय के हिसाब से की जानी चाहिए।
५.सड़क दुर्घटनाये,रेल दुर्घटनाये तकनीकी रूप से कैसे कम की जाएं कोई ब्लू प्रिंट नही।
६.,गांव शहर की तरफ रुख न करें इस पर कोई ठोस प्लान नही।
७.RPL रिकग्निशन ऑफ प्रायर लर्निंग एक अच्छी पहल है सरकार की ,परन्तु लाभ नही मिला जिन्हें मिलना चाहिए था।
८.पंचर बनाना, साईकल रिपेयर, बाइक रिपेयर,प्लम्बर,इलेक्ट्रीशियन,हेयर ड्रेसर जैसे कामो के लिए मॉड्यूल विकसित किया जाता। जिसे गांव गांव तक विस्तारित करते और सम्मान भी मिलता।
शोषण कैसे होता है इनका, अर्बन क्लैप वालों से समझिये।
९.स्कूली शिक्षा कम हो व्यवहारिक ज्यादा हो और रोजगार परक हो ,बहुत सुधार की आवश्यकता है।
१०.गांव के स्तर पर नर्सों की भर्ती और उन्हें प्रेरित कर स्वास्थ्य के क्षेत्र में सम्मलित किया जाना ,यह गेम चेंजर हो सकता समाज के लिए।
कुछ तो करें ,न करें तो सोचे ही कुछ नया। कब तक महाभारत और रामायण देख खुश होते रहेंगे। उस समय के ऋषियों मुनियों जैसी विद्या ही हासिल कर ली जाए दुबारा।
आग जलने के लिए तीन चीजों की आवश्यकता होती है, इसे फायर ट्रायंगल भी कहते है, ऑक्सीजन, जलने वाला पदार्थ और अग्नि। इसे बुझाना हो तो या तो आग के ऊपर ऐसी परत बना दी जाए जो ऑक्सीजन को खत्म कर दे जैसे फोम की लेयर, बालू, या पाउडर कोई, या जलने वाला पदार्थ ही खत्म हो जाये अथवा अग्नि को ही बुझा दें।
सबसे कारगर होता है ऑक्सीजन को ही विलुप्त कर देना। परन्तु बड़े स्तर पर लगी आग को बुझाना मुश्किल होता है।
उत्तरकाशी में पोस्टिंग के दौरान देखा था कि पहाड़ों के जंगल मे लगी आग महीनों तक जलती रहती है। रात को ऐसे लगता था जैसे पूरे पहाड़ पर गेंदे की माला बहुत सारी लिपटी हो ,धधकती हुई।
उस दौरान पता चला कि ऐसी आग को बुझा पाना सम्भव नही होता परन्तु आगे बढ़ने से रोका जाता था। उसके लिए आग वाले क्षेत्र से दूर उल्टी आग खुद लगाई जाती थी जो जलती हुई आग की तरफ बढ़ती थी।
इससे फैलती हुई आग और उल्टी आग के बीच जलने वाला पदार्थ जल कर समाप्त हो जाता था और आग का विस्तार एक निश्चित सीमा पर रुक जाता था।
आजकल प्रचंड गर्मी में खेतों में गेहूँ की कटाई का काम हो रहा है। खेतों में ही बिजली की लाइन गुजरती है और कहीं कहीं वहीं खेत के कोने में ट्रांसफॉर्मर भी लगा होता है। हवा तेज चलने पर तार लड़ते है या चिड़िया के टकराने से चिंगारी छोटी सी गिरती है और पल भर में गेहूँ के खेत मे विकराल आग लग जाती है। यही स्थिति ट्रांसफार्मर से निकली चिंगारी के कारण भी होता है।
इससे बचने का उपाय यह है कि कटाई शुरू करते समय सबसे पहले बिजली की लाइन के नीचे और टांसफार्मर के आसपास के हिस्से की कटाई कर लें जिससे चिंगारी गिरने से वहां जलने वाला पदार्थ हो ही न।
इसी प्रकार पड़ोसी के खेत से भी अपने खेत को कटाई कर उससे अलग कर ले जिससे यदि पड़ोस के खेत मे आग लगे तो भी अपना खेत बच सके।
आजकल हार्वेस्टिंग मशीन से भी कभी कभी चिंगारी निकलती है उससे भी बचाव किया जाना चाहिए।
खड़ी फसल का यूँ जल कर समाप्त हो जाना बहुत पीड़ा देता है।
चाँद गोल न होकर चौकोर या तिकोना होता तब शायद इतना ज्यादा खूबसूरत नही होता।
दरअसल गोल चीज़ का कोई सिरा नही होता तो किसी सिरे या छोर के अभाव में उसका बे अनुपात होना पता नही चलता। तिकोना अथवा चौकोर होने की स्थिति में उस आकृति का किसी एक रिफरेन्स पॉइंट के सापेक्ष सिमेट्रिकल न होना उसे बदसूरत बना देता है।
रेफरेन्स पॉइंट न हो तो सारी बातें / चीज़ें / आकृतियां अच्छी एवम सुंदर लगती हैं। बुराई तो सापेक्षवाद में दिखती है।
"निरपेक्ष दृष्टि से कुछ भी बुरा अथवा कुरूप नही होता।"
"सेमल की नई रुई आने वाली है । दो तकिए लेने हैं इसके ।"
-अच्छा ।
"फोम वाली सॉफ्ट तो है पर अच्छी नहीं । "
- हाँ ,पर वो रुई वाली है न ।
"वो थोड़ा क्रश मतलब पिच्च नहीं हो गई ।"
- हाँ , पर वो ठीक है अभी ।
"आपको रुई वाली कम्फर्टेबल लगती है या फोम की या फिर जो वो रखी है सेमल वाली ।"
- तुम्हारे बाँहों वाली ,सबसे कम्फ़र्टेबल ,फुसफुसाते हुए ।
(पर वो सुन न पाई धीमी सी आवाज़ , या शायद अनसुना कर दिया हमेशा की तरह )
'यह सुबह / शाम लिखते रहते हो और कोई काम नही है।'
तुम मुझे पढ़ना छोड़ दो न, मैं लिखना छोड़ दूंगा।
'फिर इन आँखों का क्या काम।'
उनका इल्ज़ाम लगाने का
अंदाज ही कुछ गज़ब का था,
मैंने खुद अपने ही ख़िलाफ
गवाही दे दी।
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