शनिवार, 4 जुलाई 2026

आँखें


वो : आंखों में जो लाल डोरे से होते हैं न, दरअसल वो क्यू आर कोड होते हैं। उनमें देखते ही सारी बात दिल की जुबान पर आ जाती है।
हम : अच्छा, और।

वो : पलकें क्यू आर कोड बदलती रहती हैं और दिल की तुरपन खुलती जाती हैं।
हम : हम्म

"बातें जो हुई होतीं अगर हमने की होतीं।"

गुरुवार, 2 जुलाई 2026

बारिश संग भुट्टा।



बारिश में ड्राइव करते हुए भुट्टा खाना मेरी पसंद की लिस्ट में सबसे ऊपर है। एक हाथ से ड्राइव और दूसरे हाथ मे भुट्टा घुमाते घुमाते खाते हुए गाना सुनने का एक अजीब सा मिजाज होता है। 

निगाह तो सामने सड़क पर होती है और गोल घुमाते हुए भुट्टे के दाने दांतों के नीचे आते रहते है। कभी कच्चा सा दाना कच से अपना दूध छोड़ देता है तो कभी एकदम जला हुआ दाना कर्र कर्र करता हुआ कोयला सा जीभ पर ठहर उठता है।

यह रोटेटिंग भुट्टा हाथ मे एकदम ज़िन्दगी की तरह ही तो होता है, कभी चटपटा कभी ,कचकचा और कभी जला हुआ फिर भी स्वाद देता हुआ और सबसे खास बात यह कि जब  और खाने का मन करता है तभी एकदम से खत्म हो जाता है।

यही ज़िन्दगी है।

मंज़िलें।

 #मंजिल #मकान #की #या #ज़िन्दगी #की


मकान ऊँचा था ,

इंसान इतराया,

वक्त भी बौना लगा।

वक्त रीता ,

रीता रेत भी ,

आसमान मुस्कुराया।

वक्त फिसल गया,

हाथ छूट गया,

इंसान बौना रह गया।

सीमेंट रेत सरिया,

खुद कभी मजबूत कहाँ,

वक्त ही निभाता इन्हें।

"वक्त गर मजबूत ,

झोपड़ी को भी हासिल हुनर ,

पनाह का महलों को।"


©अमित

मंगलवार, 30 जून 2026

ज़िंदगी

ज़िन्दगी को अपनी ओर खींचते खींचते हाथ कब सद्दी से मांझे पर आ गया ,पता ही नही चला और अंगुलियां लहूलुहान हो गईं।

"कुछ लम्हे मांझे सरीखे होते हैं , जो कत्ल भी करने का माद्दा रखते हैं।"

शुक्रवार, 26 जून 2026

बातें दिल की।

फूलों की माला पिरोते समय धागे के एक सिरे पर गाँठ सी बाँध लेते है फिर दूसरे सिरे से चुन चुन कर फूल पिरो देते हैं । सामने रखे रंग बिरंगे छोटे बड़े फूल पिरोये जाने के बाद एक सुन्दर सी माला बन सज उठते है । 
परंतु अगर दूसरे सिरे की गांठ अगर असावधानी वश खुल जाये तो सारे पिरोये हुए फूल बिखर जाते हैं ।

"बातें करना तुमसे , वो भी लफ़्ज़ों को एक माला में पिरोने जैसा ही तो है पर लफ़्ज़ों की शुरुआत में चाहत की गाँठ तो लगा लिया करो , इसके बगैर सारे लफ्ज़ , जिन्हें न जाने कहाँ कहाँ से चुन चुन कर लाता हूँ , बिखर से जाते हैं ।"

"न बिखरे हुए फूल अच्छे लगते है और न ही लफ्ज़ ।"

होता है , फूलों का बिखेरा जाना और लफ़्ज़ों का बुदबुदाया जाना भी ,मगर मज़ार पर ।

बुधवार, 24 जून 2026

कली।




 "अभी तुम्हारा खिलना शेष है,

अभी तुम्हारा खिलखिलाना शेष है,

अभी तुम्हारा महकना शेष है,


सूरज हवा और मिट्टी से प्राण लेते रहो,

अभी तुम्हारा बिखरना शेष है।"

जो शेष है वही विशेष है।


काश।

धूप

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पत्तियों से होकर आती धूप खुश्क सी खुशबू लिए होती है।

पत्ती

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सूखी पत्तियों पर पांव रखते हुए चलने में एहसास होता है कि जीवन के बाद भी पत्तियां पांव की हिफाज़त कंकड़ पत्थर से कर जाती हैं।

फूल

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फूल तो खुशबू बिखेर कर समर्पण करना सिखाते हैं।


"इन तीनों में से कोई एक सा भी हो जाऊँ किसी एक के लिये भी तो जीवन सिद्ध हो जाये।"