कुछ सवेरे , कुछ शाम ,कुछ रातें संजोने लायक होती हैं । इन्हें यूं ही नहीं खर्च कर देना चाहिए । इनके कुछ टुकडों के सहारे पूरी ज़िन्दगी बिताई जा सकती है । कभी कभी रात भी रात भर इसलिए जागती है कि कहीं ऐसा न हो कि सवेरा हो जाये और रात सोती ही रह जाये । रात के ख्वाब में सुबह की ख्वाहिश कुछ ऐसी ही थी शायद । सवेरे का एक टुकड़ा ऐसा ही है आज और चिड़ियों की चहचहाहट भी मानो यही कह रही ।
"बस यूँ ही " .......अमित
"शब्द भीतर रहते हैं तो सालते रहते हैं, मुक्त होते हैं तो साहित्य बनते हैं"। मन की बाते लिखना पुराना स्वेटर उधेड़ना जैसा है,उधेड़ना तो अच्छा भी लगता है और आसान भी, पर उधेड़े हुए मन को दुबारा बुनना बहुत मुश्किल शायद...।
गुरुवार, 26 मार्च 2026
बिंदी
बगैर आईना देखे तुम
जब दो अंगुलियां नाक पे टिका
माथे के एकदम बीचों बीच बिंदी लगाती हो
तो तुम्हारे इस श्रृंगार कौशल के आगे मुझे अपना
त्रिकोणमिति और ज्यामिति का ज्ञान व्यर्थ लगता है ।
ज़िंदगी
ज़िन्दगी महसूस करना हो जब कभी तो तितली के खुलते बन्द होते पंख देखना, बुलबुल की आवाज़ आंखे मूंद कर सुनना, नदी किनारे मछलियों को आटे की गोली देकर उनके खुलते बन्द होते मुंह को निहारना, छोटे अबोध बच्चे की मासूम मुस्कुराहट को देखना, रिक्शे वाले को कभी तय किराए से कुछ रुपये ज्यादा देकर उसकी आँखों की चमक देखना और कभी आईने में अपनी आंखों को एकटक अपलक देखना, ज़िन्दगी ही ज़िन्दगी दिखाई पड़ेगी। ☺☺
#ज़िन्दगी
सोमवार, 1 दिसंबर 2025
पोका योके (poka-yoke )
पोका योके (poka-yoke )
जापानी शब्द है यह। मैन्युफैक्चरिंग डिज़ाइन और आपरेशन में यह तकनीक प्रयोग की जाती है।
इसका उद्देश्य यह होता है कि गलती से भी गलती न हो।
उदाहरण के तौर पर मोबाइल में सिम का कोना और सिम ट्रे का कोना थोड़ा सा तिरछा कटा हुआ होता है। जिससे कभी कोई गलती से भी सिम लगाने में गलती नही करेगा।
USB पोर्ट की डिज़ाइन भी ऐसी होती कि गलत सिरा कनेक्ट न हो जाये।
असेम्बली लाइन में कोई कम्पोनेन्ट मिस हो रहा हो तो असेंबली लाइन स्वतः रुक जाती है।
रेलवे फाटक पहले बन्द करते हैं फिर उस फाटक बंद करने वाली मशीन से चाभी निकाल कर तब सिग्नल डाउन कर पाते हैं। बिना फाटक बंद किये वो चाभी बाहर निकलती ही नही है।
बच्चों के खिलौनों में यह बहुधा प्रयोग होता जिन खिलौनों में अलग अलग पार्ट्स को जोड़ कर कुछ बनाना होता है।
फाउंड्री में डोवेल पिन भी यही काम करती है।
ऐसे तमाम उदाहरण है पोका योके के।
मंगलवार, 14 जनवरी 2025
खिचड़ी।
यूँ तो खाने के 56 प्रकार के व्यंजन होते हैं ,जिन्हें बनाने के लिए विभिन्न प्रकार की सामग्रियों की आवश्यकता होती है। परंतु ये व्यंजन सभी वर्ग के लोगों को सहजता से उपलब्ध भी नही होते।
दाल और चावल तो मूल भोज्य पदार्थ है जिसे समाज का प्रत्येक वर्ग उपभोग करता है।
शायद धर्म मे ऐसी व्यवस्था की गई है जिनके पालन से समाज के सभी वर्ग के लोग आपस मे एक जुड़ाव महसूस कर सके।
खिचड़ी एक अत्यंत साधारण भोजन है जिसे कम से कम इस एक दिन तो सभी लोग खाते है, रुचि से न सही धर्म से ही सही।
एक जैसा भोजन कही न कहीं समाज के वर्गों के अंतर को समाप्त करने का संदेश तो अवश्य देता है।
(स्कूल में बच्चे एक दूसरे का टिफिन देख कर समाज के इस अंतर को खूब समझते हैं और जब कभी उनका कोई अमीर दोस्त उसके जैसा लाया ही टिफिन ले आता है तो उस दिन उसे वह टिफिन बहुत भाता है और वह दोस्त भी। स्कूल में यूनिफॉर्म की भांति ही सबका टिफिन भी एक सा लाने का नियम और पाबंदी होनी चाहिए।)
खिचड़ी की शुभकामनाएं। 😊
मंगलवार, 17 दिसंबर 2024
ऊन के गोले
बेटा इधर आना जरा, आवाज़ दी बगल वाली चाची ने। स्कूल जाने के लिये घर से निकला ही था, बस्ता कंधे पर टांगे हुये। यह बात होगी जब हम छठी या सातवीं कक्षा में होंगे।
अपने पास बुलाकर चाची जी ने हमारे नये बने स्वेटर में नीचे से हाथ डाला और दो मिनट तक बुनाई की डिज़ाइन देखती रही फिर किसी से बोली , एकदम नई डिज़ाइन है, इनकी मम्मी बहुत अच्छा स्वेटर बुनती है। यह डिज़ाइन अभी 'सरिता' में निकली थी वही वाली है। ( तब सरिता , मुक्ता , मनोरमा और गृहशोभा में जाड़ों में बुनाई विशेषांक आते थे।)
उन दिनों यह अक्सर होता था कि मोहल्ले में कोई भी चाची बच्चों को अपने पास बुलाकर खड़े खड़े वहीं पहने हुए स्वेटर का पूरा अनुसंधान कर डालती थी।
दरअसल एक यह चलन भी था कि कोई जल्दी किसी को बुनाई बताता भी नही था , लेकिन लोग डिज़ाइन को अलट पलट देख कर डिकोड कर ही लेते थे।
एक बार तो मोहल्ले में ही सामने खेल रहे थे , किसी चाची ने बुलाया और दोनो हाथ हमारे फैला कर उसमे ऊन का लच्छा फंसा दिया और खुद उसका गोला बनाने लगीं। ऐसी सेवाएं 5 या 10 मिनट वाली पूरे मोहल्ले में कोई भी हम बच्चों से ले सकता था।
पहले फेरी वाले ऊन बेचने आते थे। खूब सारे रंग बिरंगे और मोहल्ले में सारी महिलाएं खरीदती थीं। फिर बाद में फॉलो अप भी होता था कि वो गुलाबी वाला स्वेटर बन गया तुम्हारा, हाँ लगभग बन गया बस अब गला घटा रहे या आस्तीन जोड़ना है बस ,यह जवाब होता था।
हाथ के बुने स्वेटर ही पहनते थे हम लोग बचपन मे। नये स्वेटर के लालच में बहुत देर रात तक पढ़ते थे क्योंकि मम्मी बोलती थी ,जब तक पढ़ते रहोगे हम बुनाई करते रहेंगे। हमे याद है दो दो दिन में एक पूरा स्वेटर बुन जाता था हम लोगों के लिए।
हमे शौक था कि स्वेटर पर हमारा नाम भी लिखा हो बुनाई से ही, उन दिनों यह बड़ी बात थी और कौशल भी। मम्मी ने बनाया था फिर।
बेल ( सीने पर चौड़ी पट्टी सी )की डिज़ाइन वाला स्वेटर बहुत पॉपुलर हुआ था। ऊन के गोले ounce में आते थे, यह वजन की माप थी। सबसे सॉफ्ट ऊन कैशमिलान नाम से आता था। लोग ऊन को गाल से लगाकर उसकी सॉफ्टनेस चेक करते थे।
मोहल्ले में सलाइयाँ बुनने वाली बहुत उधार मांगी जाती थी, इस घर से उस घर। बॉर्डर बुना जाता था 12 या 14 नम्बर की सलाई से और बाकी स्वेटर कम नम्बर की सलाई से।
हाथ के बुने दस्तानों की बात ही कुछ और थी।
अब तो जमाना प्लग एंड प्ले वाला हो चुका है, क्लिक एंड यूज़, कुछ भी, बस मोबाइल में डेटा हो और अंटी में पैसा हो।
शुक्रवार, 13 दिसंबर 2024
मुख़्तसर सी बात
मुख्तसर सी बात थी
मगर इसी बात में तो बात है
भीड़ भरी ज़िन्दगी में
चंद लम्हों की मुलाकात थी
उन लम्हों में बसी साँसे तेरी
हर एक साँस थी धड़कन मेरी
सकुचाती थी हथेलियाँ मेरी
उनमें धड़कती रहीअंगुलियाँ तेरी
वक्त गुज़रा फिर
जिंदगी की शाम हुई
मुड़ कर न देखा
उन लम्हों ने दुबारा।
😊
