कोई भी विषय कठिन नही होता है। अगर शिक्षक को अपना विषय एकदम स्पष्ट है तब वह बच्चों को कठिन से कठिन विषय को सरल रूपांतर कर समझा सकता है।
पीरियाडिक टेबल को केमिस्ट्री से न जोड़ कर उसे एक मैथमेटिकल मॉडल की तरह बताया जाना चाहिए कि उसका विन्यास या अरेंजमेंट इस तरह से किया गया है कि सभी तत्वों को उनकी मात्र स्थिति से ही उनके गुणधर्म को जाना जा सकता है।
यह तो एक बहुत अच्छे तरीके से प्रेडिक्शन मॉडल भी होता है। दुर्भाग्य यह है कि परीक्षा में ऐसे प्रश्न पूछे जाते तो रटने पर जोर देते है। अब सब तत्वों के एटॉमिक मास और नंबर कौन याद कर सकता है। किस कॉलम और ग्रुप के क्या गुण हैं यह पता रहना चाहिए।
मनुष्य को बारह राशियों में बांट कर उनका भविष्य हम जानने की बात करते है, पीरियाडिक टेबल तो तथ्य आधारित सिद्धांत पर बनाई गई है।
पीरियाडिक टेबल किसी क्लिष्ट व्यवस्था को एक सरल व्यवस्था में arrange किया गया है।
बच्चों को अपने दोस्तों की आदतों व्यवहार के आधार पर इस तरह की टेबल बनाने का प्रोजेक्ट दिया जा सकता है। किसी भी विषय को अपने आसपास की बातों से simulate कर पढ़ाये जाने का कांसेप्ट devlope किया जाना चाहिए।
रिलेटिविटी जैसे कठिन विषय को भी छोटे से बच्चे को सरल उदाहरण से समझाया जा सकता है।
किसी विषय / पाठ को पढ़ाने के बाद शिक्षक को चाहिए कि वह बच्चों से प्रश्नपत्र तैयार करने को कहें और फिर स्वयं उनका उत्तर दें।
पाठ्यक्रम बदलने से पहले विवेचना होनी चाहिए कि विषय अप्रासंगिक है, कठिन है या शिक्षण व्यवस्था में दोष है।

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