"शब्द भीतर रहते हैं तो सालते रहते हैं, मुक्त होते हैं तो साहित्य बनते हैं"। मन की बाते लिखना पुराना स्वेटर उधेड़ना जैसा है,उधेड़ना तो अच्छा भी लगता है और आसान भी, पर उधेड़े हुए मन को दुबारा बुनना बहुत मुश्किल शायद...।
"अभी तुम्हारा खिलना शेष है,
अभी तुम्हारा खिलखिलाना शेष है,
अभी तुम्हारा महकना शेष है,
सूरज हवा और मिट्टी से प्राण लेते रहो,
अभी तुम्हारा बिखरना शेष है।"
जो शेष है वही विशेष है।
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