रविवार, 5 अप्रैल 2026

बचा हुआ हिस्सा।

शाम को कुछ लिख रहा था ,अधूरा ही रह गया। शाम भी अधूरी रह गई और बात भी। यूँ तो बहुत सी अधूरी शाम के बचे हुए टुकड़े इकट्ठे कर लिए हैं। यह रंग बिरंगे टेढ़े मेढ़े टुकड़े, शामों के ,एक साथ मिलकर एक खूबसूरत कोलाज बना देते है जो नीम अंधेरों में जुगनू सा दमकते रहते है।

"कभी कभी बचा हुआ हिस्सा जो अपने हिस्से नही आता, तमाम किस्से कह जाता है।"

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