"शब्द भीतर रहते हैं तो सालते रहते हैं, मुक्त होते हैं तो साहित्य बनते हैं"। मन की बाते लिखना पुराना स्वेटर उधेड़ना जैसा है,उधेड़ना तो अच्छा भी लगता है और आसान भी, पर उधेड़े हुए मन को दुबारा बुनना बहुत मुश्किल शायद...।
'यह सुबह / शाम लिखते रहते हो और कोई काम नही है।'
तुम मुझे पढ़ना छोड़ दो न, मैं लिखना छोड़ दूंगा।
'फिर इन आँखों का क्या काम।'
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