सवेरा रोज़ कितनी चुपके से आता है , फिर भी नींद खुल जाती है ।
तुम्हारी बातें भी तो ऐसे ही मुझ तक पहुँच जाती है चुपके से जबकि तुम कुछ बोलते ही नहीं ।
देखो फिर चिड़िया चहचहा रही हैं , यक़ीनन तुम आँखे खोल बरबस एक बार मुस्कुराये हो अभी ।
यह लालिमा सुबह की है या फिर एक बार ओढ़ ली है तुमने चादर लाज की ।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें