शनिवार, 4 अप्रैल 2026

सवेरा।

सवेरा रोज़ कितनी चुपके से आता है , फिर भी नींद खुल जाती है । 

तुम्हारी बातें भी तो ऐसे ही मुझ तक पहुँच जाती है चुपके से जबकि तुम कुछ बोलते ही नहीं । 

देखो फिर चिड़िया चहचहा रही हैं , यक़ीनन तुम आँखे खोल बरबस एक बार मुस्कुराये हो अभी ।

यह लालिमा सुबह की है या फिर एक बार ओढ़ ली है तुमने चादर लाज की ।

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