"शब्द भीतर रहते हैं तो सालते रहते हैं, मुक्त होते हैं तो साहित्य बनते हैं"। मन की बाते लिखना पुराना स्वेटर उधेड़ना जैसा है,उधेड़ना तो अच्छा भी लगता है और आसान भी, पर उधेड़े हुए मन को दुबारा बुनना बहुत मुश्किल शायद...।
पुल इतना सहज हो कि
सड़क सा लगने लगे तब नदी हाशिये पर चली जाती है।
"मोहब्बत जब इतनी सादगी से हो कि
विसाले यार की तलब न हो तब दुनिया हाशिये पर चली जाती है।"
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