मंगलवार, 4 जनवरी 2011

"पोटली लम्हों की"

कतर रहा था,
समय को इक रोज़,
कतरे कतरे पर,
नाम तुम्हारा लिखा मिला,

वो लम्हें ,
जो बीते साथ तेरे,
सितारे से टंके हैं ,
इस जीवन में,

यूं ही गुज़र जाएगी ,
ज़िन्दगी एक रोज़,
क्यों ना लगाते चले गांठ,
प्यार की आपस में,
                                   
 फ़िर एक पोटली सी हो,
 लम्हों की प्यार भरी,  
 बस इतनी ही पूंजी बहुत,
 जीवन खर्च के लिए ।

7 टिप्‍पणियां:

  1. क्यों ना लगाते चले गांठ,
    प्यार की आपस में,
    समय के कतरों की....

    बेहतरीन प्रस्तुति ।

    .

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  2. फ़िर एक पोटली सी हो,
    लम्हों की प्यार भरी,
    बस इतनी ही पूंजी बहुत,
    जीवन के खर्च के लिए ।

    बस इसके बाद और क्या चाहिये………सुन्दर प्रस्तुति।

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  3. निशब्द कर दिया आपने , बहुत ही उम्दा रचना लगी ।

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  4. सच में...प्यार भरे कुछ लम्हे काफी होते हैं जीवन जीने के लिए .सुन्दर रचना .

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