रविवार, 23 जनवरी 2011

"जाले यादों के"

रहता हूं,
खोया खोया सा,
यूँ ही उनकी,
यादों के जालों में |

जालों पर,
लटकती रहती हैं,
बूंदें चमकती ,
उनकी शहद सी,
मुस्कान की |

बूंदें आपस में मिलें ,
तो लगती दौड़ने सी
और बदल जाती,
मुस्कान उनकी,
खिलखिलाती हँसी  में |

फूल से खिल उठते हैं,
सब ओर ,
महक उठती है,
मेरी सांसे भी |

अब तो लत सी,
हो गई है,
इस खेल की | 

पहले बूंदें बनाना,
फ़िर उन्हें,
मिलाना,

और बदलते देखना,
उनकी,
मुस्कान को,
खिलखिलाती हँसी में।




12 टिप्‍पणियां:

  1. अब तो लत सी,
    हो गई है,
    इस खेल की|
    पहले बूंदें बनाना,
    फ़िर उन्हें,
    मिलाना,
    और बदलते देखना,
    उनकी,
    मुस्कान को,
    खिलखिलाती हंसी में।
    ...
    yah aadat hi zindagi kee shakl banati hai ek jauhri kee tarah

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  2. दुआ है ये जाले यूँ ही मुस्कानों के मोती पिरोते रहे ....
    और आप उन्हें हँसी में बदलते रहे .....

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  3. जालों पर,
    लटकती रहती हैं,
    बूंदें चमकती हुई,
    उनकी शहद सी,
    मुस्कान की|

    वाह , बहुत खूबसूरत रचना ...

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  4. खोया हुआ सा,
    यूँ ही उनकी,
    यादों के जालों में|
    जालों पर,
    लटकती रहती हैं,
    बूंदें चमकती हुई,
    उनकी शहद सी,
    मुस्कान की|

    बेहद खूबसूरत...

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