शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

"मालगाड़ी का गार्ड"

                ट्रेन के सफ़र के दौरान जब भी कोई मालगाड़ी देखता हूं,तब उसके आखिरी डिब्बे पर बरबस निगाह पड़ जाती है।इतनी लम्बी गाड़ी के आखिरी डिब्बे में एक एकदम निपट अकेला आदमी बैठा दिखता है, चुपचाप ।सोचता हूं कैसे सफ़र कटता होगा अकेले और सफ़र भी ऐसा कि पता नही,कहां घंटों खड़ा रहना है और कब तक  वह भी  प्रायः ऐसे स्टेशनों पर, जहां ना कोई जनजीवन ना कोई दुकान।
                मालगाड़ी के इस डिब्बे में पता नहीं क्यों, रेलवे ने रोशनी का इंतज़ाम भी नही कर रखा है।कैसा भी मौसम हो,कड़कती सर्दी या घोर बारिश,बस अंधेरे में उस में अकेले कटती ज़िन्दगी।बगल से उसके एक से एक रंग-बिरंगी गाड़ियां यथा शताब्दी,दुरंतो,राजधानी धड़ाधड़ गुजरती हुई, जैसे मुंह चिढ़ाती तेज़ जिन्दगी भाग रही हो और मालगाड़ी धीरे धीरे रेंगती हुई,जैसे कैंसर का मरीज रेंगते हुए अपनी मौत का इन्तज़ार कर रहा हो। आजकल तो मोबाइल और वाकी टाकी का ज़माना आ गया ,आज से १०/१५ वर्ष पहले तो गार्ड साहब घर से जाने के बाद, कब लौटेंगे, उन्हें खुद भी पता नही होता था।
                  सच मानिये,कभी मालगाड़ी के गार्ड की ज़िन्दगी को कल्पना कर के देखें,मन अवश्य विचलित होगा।मैं तो जब भी कोई मालगाड़ी देखता हूं तो मेरा सर श्रद्धा से उस गाड़ी के गार्ड के प्रति झुक जाता है।हो सकता है एक कारण यह भी हो कि मेरे पिता जी रेलवे में मालगाड़ी के ही गार्ड थे, और मैं अब महसूस करता हूं कि उनका जीवन उस अवधि का कितना कष्टमय रहा होगा, पर उन्होंने  हम लोगों को कभी भनक भी ना लगने दी ।
            

5 टिप्‍पणियां:

  1. सच देखा तो हमने भी था यह लेकिन आपके इस पोस्ट से इस दर्द का एहसास हो रहा है. सच और ये मालगाड़िया तो कभी कभी कितने दिन नितांत सन्नाटे में रुकी रहे कुछ पाता ही नहीं होता....
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    नये दसक का नया भारत (भाग- १) : कैसे दूर हो बेरोजगारी ?

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  2. मन को छू गया आपका आलेख ...!!
    शुभकामनायें ...

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  3. मालगाड़ी के गार्ड की जिन्दगी निश्चय ही कठोर है। :-(

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