मंगलवार, 23 जून 2026

अग्नि दुर्घटना।

 चलती कार में लगी आग। दरवाजों का लॉक सिस्टम हुआ फेल। लोग भीतर ही दम घुटने से मृत पाए गए।

बिल्डिंग में लगी आग। अंदर के डोर सारे इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम से काम करते थे। कहीं फेस रिकग्निशन से और कहीं थंब इम्प्रैशन से डोर खुलते थे। आग लगने से बिजली बंद हो गई और सारे डोर बन्द ही रहे , खुल नही सके। दम घुटने से लोगों की मृत्यु हुई।

मूर्ख लोगों इस जमाने मे भी इतनी दूरदृष्टि न हो कि भाई अगर यह सिस्टम फेल हुआ तो लोग कैसे बाहर निकलेंगे।

इतना भी क्या ऑटोमेशन कि जान की कोई कीमत न रहे।

1.पहले Zen कार में पीछे के दोनों दरवाजे मैन्युअल होते थे। कम से कम एक दरवाजा वो भी ड्राइवर के साथ वाला मैन्युअल होना ही चाहिए।

2. बिल्डिंग के फायर ऑडिट में यह ensure किया जाना चाहिये कि पावर फेलियर की स्थिति में सारे ऑटोमेटिक सिस्टम कैसे behave करेंगे। एग्जिट करने वाले दरवाजे मैन्युअल होने चाहिए।

3. बैंक के दरवाजे कभी इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम से क्रियाशील नही रखे जाते। अब बैंक से इम्पोर्टेन्ट तो कोई और बिल्डिंग नही हो सकती।

4. फायर ड्रिल प्रत्येक माह अवश्य होना चाहिये।

5. कोचिंग सेंटर में हर क्लास के पहले दो मिनट का डिसास्टर मैनेजमेंट के लिए ऑडियो चलाना चाहिए जैसे फ्लाइट में अनिवार्यतः सेफ्टी measures बताए जाते हैं।

6. किसी भी परिसर में बड़ी बड़ी होर्डिंग्स, पोस्टर्स लगे होने चाहिए कि आग लगने की स्थिति में बाहर निकलने का क्या तरीका होगा।

7.पेरेंट्स किसी भी स्कूल, कोचिंग में यह सवाल जरूर पूछें कि किसी भी disaster को हैंडल करने के वहां क्या उपाय हैं।

8. Unsafe जगहों के बारे में माउथ पब्लिसिटी अवश्य करें।

9. पहला अंदेशा यही होता कि बिजली शॉर्ट सर्किट से लगी होगी और अब बिजली वाले जिम्मेदार हुए। जबकि बिजली वालों का काम बस मीटर तक बिजली देना होता उसके आगे से कोई मतलब नही। फिर भी कार्यवाई हो जाती उनके खिलाफ और बाद में सफाई देते रहते बेचारे।

10. फायर सेफ्टी और इलेक्ट्रिकल सेफ्टी (यह बिजली विभाग से अलग विभाग होता है ), यह दो विभाग सीधे तौर पर जिम्मेदार होते हैं। अगर बिल्डिंग के मानकों में कोई कमी है तब Developent authority या housing board जिम्मेदार होता है।

ऐसी घातक और दुःखद रिपीट न हों इसके लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए। एक दूसरे के ऊपर जिम्मेदारी खिसकाने से कोई समाधान नही निकल सकता।

सोमवार, 15 जून 2026

बेशरम।

बहुत पहले एक 'बेशरम' का पेड़ दिख जाता था सभी जगह, लोग अपनी क्यारियों की उससे फेंसिंग भी करते थे। उसमे सफ़ेद रंग का फूल आता था। 

यह पेड़ लचकदार टहनी का होता था और इसकी सन्टी बहुत मस्त बनती थी, सरकारी स्कूल के मास्टर लोगों की फेवरिट।

"शायद उस पेड़ का मानवीकरण हो गया अब।"

रविवार, 14 जून 2026

फुहार।

एकदम से क्या मौसम हो गया है। मंद मंद बारिश और धीमी तेज हवा, बारिश धीमी हो और हवा तेज़ तो फुहार बन जाती है। फुहार का अपना कोई बस नही होता, कभी इधर कभी उधर भिगो देती है सब कुछ।

तपती धूप में जलते पेड़ पौधे इस समय इतने खुश हैं और झूम रहे हैं भीगते हुए। पत्तियों का पत्तियों से आलिंगन देखते ही बन रहा है।

"फुहार बारिश की हो या हो प्यार की ,भिगो तो देती है भीतर तक ।"

बुधवार, 10 जून 2026

शून्य की गूंज।

 शून्य के भीतर भी ,

होते हैं बहुत सारे शून्य ,

जब जब तुम चुप हुए ,

शून्य अटकते गए ,

एक के भीतर एक ,

फिर एक और एक,

कितनी भी बातें ,

कोई और कर ले ,

शून्य में गूँज ,

फिर कभी नहीं ,

पहला शून्य गर तुम ,

रख देते अलग ,


बस दो बोल ,

बोल तो देते ,

शून्य के पीछे शून्य ,

बहुत सारे शून्य,

दौड़े चले आते,

सब एक कतार में,

करने लगते अठखेलियां

वही सारे शून्य ,

बन कभी निगाहें और ,

कभी तबस्सुम तुम्हारी ।


- ©अमित

मंगलवार, 9 जून 2026

हाबिस / अरिया

 जिन लोगों ने 'प्लांट' या किसी 'कॉन्स्ट्रक्शन' इकाई में 'इरेक्शन / कमीशनिंग' का कार्य कराया होगा या ऐसे किसी क्षेत्र से सम्बन्ध रखते होंगे उन्होंने भी देखा / सुना होगा कि जब कभी 'क्रेन' से या 'मैनुअली' भी कोई भारी वजन उठा कर कहीं फिट करना होता है ( जैसे मोटर , बियरिंग ,गर्डर इत्यादि) तो "हाबिस " और "अरिया " शब्द का प्रयोग 'लेबरों' द्वारा किया जाता है।

वजन ऊपर करने को "हाबिस" बोलते हैं और नीचे करने को "अरिया" ,अब यह दोनों शब्द मूलतः क्या हैं पता नहीं ,परन्तु पूरे देश में इन दोनों शब्दों का प्रयोग हर भाषा में किया जाता है ।

जो पता चला :


1. हाबिस = Hoist side / Effort sideक्या है: लकड़ी के बड़े लट्ठे या बांस को लीवर बनाकर, जिस सिरे पर मजदूर नीचे दबाव डालते हैं ताकि दूसरा सिरा ऊपर उठे।  

काम: वजन को ऊपर उठाना/Uplift करना  मजदूर बोलते हैं: "हाबिस मारो" = लीवर के इस सिरे पर वजन/आदमी डालकर दबाओ, ताकि माल ऊपर उठे।

Etymology: अंग्रेजी शब्द "Hoist" = ऊपर खींचना/उठाना। ब्रिटिश काल में क्रेन/चेन-पुली को "hoist" कहते थे। भारतीय मजदूरों ने सुनकर इसे "हाबिस" बना दिया। Hoist → हॉइस्ट → हाबिस। 

2. अरिया = Lower side / Load side 

क्या है: लीवर का वो सिरा जहां असली वजन/पत्थर/शटरिंग बंधी होती है। जब हाबिस को दबाते हैं तो अरिया ऊपर उठता है। माल उतारते समय अरिया को धीरे-धीरे नीचे किया जाता है।  काम: वजन को नीचे उतारना/Down करना  

मजदूर बोलते हैं: "अरिया संभालो" = जिस तरफ माल बंधा है उसे धीरे से नीचे लाओ।


Etymology: इसके 2 सोर्सेस हैं:

 1.  "Area" से: जिस "एरिया" में माल उतरता है, वो साइड "अरिया" कहलाने लगी। Area → अरिया।

 2.  "Lower" से: "Lower करो" → "लॉवर" → बोलचाल में "अरिया" बन गया। कई साइटों पर "अरिया करो" = "धीरे से नीचे करो" कहा जाता है।

साभार : महफूज़ अली।


In steel plants, we for long believed that these crane signals had Russian word roots . Instead these words for gestures have their roots in Middle East and as a corollary we can now say Urdu roots.

1.हाबिस : means hoist in Arabic .

2.आड़े / आड़ा is another variant from the same root from which aria is derived…and, aria in gesture command is obviously lowering the boom .

Many people thought these words to be of Russian origin because Russians working there also used these words for signalling commands .


साभार : सुषमा सक्सेना।

शुक्रवार, 5 जून 2026

इत्ती सी ख्वाहिश।

तुम कानों में झुमकों की जगह छोटी छोटी सी wind chime पहन लेना।

जब जब बजेगी समझना चुपके से कुछ कहा है हमने। फिर जवाब में खत लिख देना।

बस इत्ती सी ख्वाहिश है तुमसे।

☺️

बुधवार, 3 जून 2026

पीरियॉडिक टेबल।


कोई भी विषय कठिन नही होता है। अगर शिक्षक को अपना विषय एकदम स्पष्ट है तब वह बच्चों को कठिन से कठिन विषय को सरल रूपांतर कर समझा सकता है।

पीरियाडिक टेबल को केमिस्ट्री से न जोड़ कर उसे एक मैथमेटिकल मॉडल की तरह बताया जाना चाहिए कि उसका विन्यास या अरेंजमेंट इस तरह से किया गया है कि सभी तत्वों को उनकी मात्र स्थिति से ही उनके गुणधर्म को जाना जा सकता है।

यह तो एक बहुत अच्छे तरीके से प्रेडिक्शन मॉडल भी होता है। दुर्भाग्य यह है कि परीक्षा में ऐसे प्रश्न पूछे जाते तो रटने पर जोर देते है। अब सब तत्वों के एटॉमिक मास और नंबर कौन याद कर सकता है। किस कॉलम और ग्रुप के क्या गुण हैं यह पता रहना चाहिए।

मनुष्य को बारह राशियों में बांट कर उनका भविष्य हम जानने की बात करते है, पीरियाडिक टेबल तो तथ्य आधारित सिद्धांत पर बनाई गई है।

पीरियाडिक टेबल  किसी क्लिष्ट व्यवस्था को एक सरल व्यवस्था में arrange किया गया है।

बच्चों को अपने दोस्तों की आदतों व्यवहार के आधार पर इस तरह की टेबल बनाने का प्रोजेक्ट दिया जा सकता है। किसी भी विषय को अपने आसपास की बातों से simulate कर पढ़ाये जाने का कांसेप्ट devlope किया जाना चाहिए।

रिलेटिविटी जैसे कठिन विषय को भी छोटे से बच्चे को सरल उदाहरण से समझाया जा सकता है।

किसी विषय / पाठ को पढ़ाने के बाद शिक्षक को चाहिए कि वह बच्चों से प्रश्नपत्र तैयार करने को कहें और फिर स्वयं उनका उत्तर दें।

पाठ्यक्रम बदलने से पहले विवेचना होनी चाहिए कि विषय अप्रासंगिक है, कठिन है या शिक्षण व्यवस्था में दोष है।

मंगलवार, 2 जून 2026

गद्य और पद्य।

रेलगाड़ी घुमावों पर बहुत लुभाती है। सीधी चलती रहने पर सभी डिब्बों को एक दूसरे के आगे पीछे होने का भ्रम होता है पर घुमावों पर गोल हो कर मुड़ते समय इंजन भी सबसे पिछले डिब्बे को देख पाता है और पुलकित होता है।

गद्य और कविता में बस इतना ही अंतर होता है। गद्य में भाव आगे पीछे कतार में होते हैं जबकि कविता में लोच होने के कारण अंतिम पंक्ति भी पहली पंक्ति से जुड़ाव रखती है।

कविता हृदय से उपजती है और गद्य मस्तिष्क से। इसीलिये कविताएं लिखते समय बस शब्द रिस जाते हैं और हृदय हल्का हो उठता है।

"घुमाव पर ज़िन्दगी"

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कसूर तो बहुत किये,

ज़िन्दगी में मगर,

सज़ा वहाँ मिली,

जहाँ बेकसूर थे,

जलाए चराग हमने,

अंधेरों में अक्सर,

मुस्कुराए वो मगर तब,

जब हम बेनूर थे।

गुरुवार, 7 मई 2026

बातें शहद सी।

केचप की बॉटल हो या शहद का जार हो उससे सॉस या शहद उड़ेलने के बाद उसके मुँह के कगार पर जो सॉस या शहद लगी रह जाती है उसे प्रायः अंगुली से लपेट कर उसे चूमते हुये उस पर लगी सॉस या शहद हम चट कर जाते हैं।

आज उनके मुँह से शहद सी बातें निकल रही थीं। मन तो किया कि हथेली से ढक्कन बन्द कर दें और.......😊

मंगलवार, 5 मई 2026

पूँछ।

ऐसा बताया जाता है कि पहले मनुष्यों के पूँछ होती थी , निष्प्रयोज्य होने के कारण धीरे धीरे लुप्त हो गई।

यह बात ध्यान में आते ही मुझे आभास हुआ कि मेरे भी पूँछ है और वो मुझे कहीं चुभ रही है। टटोल कर देखा तो एसी का रिमोट सोफे और मेरे बीच टोल प्लाजा के बैरियर की तरह अड़ा पड़ा था।

कल्पना और आगे बढ़ी और उस लोक में मुझे ले गई जिसे हम पूँछ लोक कह सकते हैं।

ड्राइंग रूम में गेस्ट बैठे है बच्चे बार बार उधर से ही निकल रहे हैं। मैं बच्चों को बता रहा हूँ, देखो ध्यान से दौड़ो ,कहीं अंकल की पूँछ पर पैर न पड़ जाए और देखो आंटी की नई नई शैम्पू की हुई पूँछ है उठा कर उसके नीचे से निकलो।

स्कूल जाते समय मम्मी लोग स्कूली रिक्शे वाले को डांट रही होती , कितनी बार कहा रिक्शा चलाते समय अपनी पूंछ से बच्चों को डिस्टर्ब न किया करो ,उन्हें गुदगुदी लगती है।

ड्रेस खरीदते समय दुकानदार बताता , साहब पैंट के साथ यह पूँछ कवर एकदम फ्री है और कंट्रास्ट में बहुत अच्छा लगेगा।

सोते समय मियां बीबी में लड़ाई होती , अपनी पूँछ इधर मत रखो अपने ऊपर ही रखो, नही तो अभी उमेठ दूंगी।

मोहल्ले के बच्चे लड़ते लड़ते अपनी पूँछ आपस मे उलझा लेते फिर उनके पापा मम्मी लड़ते लड़ते उसे सुलझाते।

लोग एक दूसरे को पीछे से ही पूँछ के आकार प्रकार से पहचान लेते।

शादी के समय वर वधू की पूँछ को आपस मे गांठ बांध कर फेरे लगवाते।

पूँछ का शैम्पू तेल परफ्यूम अलग से मिलता।

लेटेस्ट : पूँछ पर लोग टैटू भी बनवा लेते तरह तरह के।

काश कि पूँछ फिर से उग आये।



बुधवार, 29 अप्रैल 2026

चाय

चाय ऑफर करने के पीछे मकसद 

कुछ समय साथ बैठने का होता है , 

चाय पिलाने का नहीं ।

सोमवार, 20 अप्रैल 2026

नियति / प्रारब्ध / भाग्य

"नियति व्यापकता लिए हुए है। नियति संसार की होती है ,इसे ही  प्रकृति की चाल कहते हैं।"

"प्रारब्ध आपके हिस्से की नियति है।"

"भाग्य आप अपने कर्म से बनाते है। कर्मफल को रेट्रोस्पेक्ट में देखते है तो भाग्य कहलाता है।"

शनिवार, 18 अप्रैल 2026

बोन्साई

बीती रात एक समूची नींद नहीं थी,अक्सर ऐसा होता है अब।

छोटे छोटे से टुकड़ों में अलग अलग बनती बिगड़ती रहती है।हर एक छोटी सी नींद के टुकड़े में बड़े बड़े ख्वाब उगते रहते हैं।

तुम्हे बोनसाई से बहुत प्यार है न। बरगद ,पीपल जैसे वृक्ष छोटे छोटे से गमलो में।

ख्वाबों के भी बोनसाई बना लिए है अब मैंने , छोटी छोटी सी नींद के गमलों में।

यह ख्वाब पास से छू कर देखना ,पसंद आएंगे तुम्हे।

गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

आंखें/नज़्म

नींद न पूरी हो तो आंखे इश्तिहार हो जाती हैं।

नज़्म भी एहसासों का इश्तिहार ही तो है ।

"यानी आंखों को नज़्म कहना गुनाह नही।"

सुबहें सारी खूबसूरत होती हैं, इसमें कोई शुबह नही , क्योंकि बहुत सारी नज़्में एक साथ लिख दी जाती हैं काजल की लकीरों से।

मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

कुछ तो नया करें।

सोचता हूँ ज़िन्दगी में ऐसा कुछ नही किया जिस पर फख्र किया जा सके। पूरे जीवन मे एक बानगी तो ऐसी हो जिसके सहारे इस जीवन रूपी गिफ्ट के बदले ईश्वर को रिटर्न गिफ्ट दी जा सके।

पतंग उड़ती देख सोचता हूँ पतंग का अविष्कार करने वाला भी कितना विद्वान रहा होगा। 

वो बिरले ही होते है जिन्हें ऐसे कुछ नया करने की कुदरती नेमत मिलती है।

पूरे देश मे किसी भी क्षेत्र में जो पी एच डी लोगों को दी जा रही है उसके विषय मे एक श्वेत पत्र जारी किया जाना चाहिए कि उन लोगों के कार्य से लोगों के जीवन मे क्या गुणात्मक परिवर्तन हुआ है या भविष्य में होगा।

"शून्य का अविष्कार हमने किया है ,इसे कितने युगों तक भुनाते रहेंगे। बनाने वाले तो पब जी ,टिक टॉक और उनो जैसे गेम बनाकर अमर हो गए।"

आईआईटी से  भी डिग्री मिलने में यह बाध्यता होनी चाहिए कि विद्यार्थी ने उन चार या पांच सालों में कोई नई सोच,कांसेप्ट या थ्योरी संकल्पित भी की अथवा नही। 

एमबीए और सीए का ध्येय बस एक रहता है कि रुपये में पांच चवन्नी कैसे बनाई जाए। जितने भी बिजनेस मॉडल है सबमे उपभोक्ता का और कार्मिकों का शोषण ही है। जहां यह बेहतर है वो इसलिए कि वहां लाभ का मार्जिन अप्रत्याशित रूप से बहुत अधिक है।

प्रत्येक उच्च शिक्षित व्यक्ति की यह सोच  होनी चाहिए कि ऐसा क्या करें कि जीवन सरल हो जाये, चाहे वो कृषि का क्षेत्र हो, मनोरंजन,खेल का क्षेत्र हो या चिकित्सा सुविधा का ही क्षेत्र हो या जीवन का कोई भी क्षेत्र हो।

दरअसल समाज की प्रचलित सोच ही नए युवकों की सोच को प्रभावित करती है। प्रचलन ही यही है कि डिग्री लो नौकरी करो मशीनी ज़िन्दगी जियो ,कुछ नया करने की न सोच है न जरूरत है।

जीवन व्यर्थ न हो जाये कुछ तो करना होगा।

इन क्षेत्रों में कुछ नया किये जाने की आवश्यकता है :

१. कृषि के क्षेत्र में। किसी भी आपदा या विपदा में खड़ी फसल कैसे सुरक्षित रहे ,इस पर कोई काम नही किया गया।

२.रेन हार्वेस्टिंग ,यह केवल सेमिनार और एन जी ओ तक ही सीमित है।

३.टाउन प्लानिंग , क्या छोटे और क्या बड़े शहरों कस्बो का बारिश में बुरा हाल होता है। जल निकासी का कोई कॉन्सेप्ट ही नही।

४.आउटर रिंग रोड कब इनर रिंग बन जाती है पता ही नही चलता। प्लानिंग बहुत लंबे समय के हिसाब से की जानी चाहिए।

५.सड़क दुर्घटनाये,रेल दुर्घटनाये तकनीकी रूप से कैसे कम की जाएं कोई ब्लू प्रिंट नही।

६.,गांव शहर की तरफ रुख न करें इस पर कोई ठोस प्लान नही।

७.RPL रिकग्निशन ऑफ प्रायर लर्निंग एक अच्छी पहल है सरकार की ,परन्तु लाभ नही मिला जिन्हें मिलना चाहिए था।

८.पंचर बनाना, साईकल रिपेयर, बाइक रिपेयर,प्लम्बर,इलेक्ट्रीशियन,हेयर ड्रेसर जैसे कामो के लिए मॉड्यूल विकसित किया जाता। जिसे गांव गांव तक विस्तारित  करते और सम्मान भी मिलता।

शोषण कैसे होता है इनका, अर्बन क्लैप वालों से समझिये।

९.स्कूली शिक्षा कम हो व्यवहारिक ज्यादा हो और रोजगार परक हो ,बहुत सुधार की आवश्यकता है।

१०.गांव के स्तर पर नर्सों की भर्ती और उन्हें प्रेरित कर स्वास्थ्य के क्षेत्र में सम्मलित किया जाना ,यह गेम चेंजर हो सकता समाज के लिए।

कुछ तो करें ,न करें तो सोचे ही कुछ नया। कब तक महाभारत और रामायण देख खुश होते रहेंगे। उस समय के ऋषियों मुनियों जैसी विद्या ही हासिल कर ली जाए दुबारा।

रविवार, 12 अप्रैल 2026

गेहूँ की कटाई

आग जलने के लिए तीन चीजों की आवश्यकता होती है, इसे फायर ट्रायंगल भी कहते है, ऑक्सीजन, जलने वाला पदार्थ और अग्नि। इसे बुझाना हो तो या तो आग के ऊपर ऐसी परत बना दी जाए जो ऑक्सीजन को खत्म कर दे जैसे फोम की लेयर, बालू, या पाउडर कोई, या जलने वाला पदार्थ ही खत्म हो जाये अथवा अग्नि को ही बुझा दें।

सबसे कारगर होता है ऑक्सीजन को ही विलुप्त कर देना। परन्तु बड़े स्तर पर लगी आग को बुझाना मुश्किल होता है।

उत्तरकाशी में पोस्टिंग के दौरान देखा था कि पहाड़ों के जंगल मे लगी आग महीनों तक जलती रहती है। रात को ऐसे लगता था जैसे पूरे पहाड़ पर गेंदे की माला बहुत सारी लिपटी हो ,धधकती हुई। 

उस दौरान पता चला कि ऐसी आग को बुझा पाना सम्भव नही होता परन्तु आगे बढ़ने से रोका जाता था। उसके लिए आग वाले क्षेत्र से दूर उल्टी आग खुद लगाई जाती थी जो जलती हुई आग की तरफ बढ़ती थी।

इससे फैलती हुई आग और उल्टी आग के बीच जलने वाला पदार्थ जल कर समाप्त हो जाता था और आग का विस्तार एक निश्चित सीमा पर रुक जाता था।

आजकल प्रचंड गर्मी में खेतों में गेहूँ की कटाई का काम हो रहा है। खेतों में ही बिजली की लाइन गुजरती है और कहीं कहीं वहीं खेत के कोने में ट्रांसफॉर्मर भी लगा होता है। हवा तेज चलने पर तार लड़ते है या चिड़िया के टकराने से चिंगारी छोटी सी गिरती है और पल भर में गेहूँ के खेत मे विकराल आग लग जाती है। यही स्थिति ट्रांसफार्मर से निकली चिंगारी के कारण भी होता है।

इससे बचने का उपाय यह है कि कटाई शुरू करते समय सबसे पहले बिजली की लाइन के नीचे और टांसफार्मर के आसपास के हिस्से की कटाई कर लें जिससे चिंगारी गिरने से वहां जलने वाला पदार्थ हो ही न।

इसी प्रकार पड़ोसी के खेत से भी अपने खेत को कटाई कर उससे अलग कर ले जिससे यदि पड़ोस के खेत मे आग लगे तो भी अपना खेत बच सके।

आजकल हार्वेस्टिंग मशीन से भी कभी कभी चिंगारी निकलती है उससे भी बचाव किया जाना चाहिए।

खड़ी फसल का यूँ जल कर समाप्त हो जाना बहुत पीड़ा देता है।



मंगलवार, 7 अप्रैल 2026

चौकोर चाँद

चाँद गोल न होकर चौकोर या तिकोना होता तब  शायद इतना ज्यादा खूबसूरत नही होता।

दरअसल गोल चीज़ का कोई सिरा नही होता तो किसी सिरे या छोर के अभाव में उसका बे अनुपात होना पता नही चलता। तिकोना अथवा चौकोर होने की स्थिति में  उस आकृति का किसी एक रिफरेन्स पॉइंट के सापेक्ष सिमेट्रिकल न होना उसे बदसूरत बना देता है।

रेफरेन्स पॉइंट न हो तो सारी बातें / चीज़ें / आकृतियां अच्छी एवम सुंदर  लगती हैं। बुराई तो सापेक्षवाद में दिखती है। 

"निरपेक्ष दृष्टि से कुछ भी बुरा अथवा कुरूप नही होता।"

सोमवार, 6 अप्रैल 2026

तकिया बांहों का।

 "सेमल की नई रुई आने वाली है । दो तकिए लेने हैं इसके ।"

-अच्छा । 

"फोम वाली सॉफ्ट तो है पर अच्छी नहीं । "

- हाँ ,पर वो रुई वाली है न । 

"वो थोड़ा क्रश मतलब पिच्च नहीं हो गई ।"

- हाँ , पर वो ठीक है अभी । 

"आपको रुई वाली कम्फर्टेबल लगती है या फोम की या फिर जो वो रखी है सेमल वाली ।"

- तुम्हारे बाँहों वाली ,सबसे कम्फ़र्टेबल ,फुसफुसाते हुए । 


(पर वो सुन न पाई धीमी सी आवाज़ , या शायद अनसुना कर दिया  हमेशा की तरह  )

लिखते क्यूँ हो।

'यह सुबह / शाम लिखते रहते हो और कोई काम नही है।'


तुम मुझे पढ़ना छोड़ दो न, मैं लिखना छोड़ दूंगा।


'फिर इन आँखों का क्या काम।' 


इल्ज़ाम

 उनका इल्ज़ाम लगाने का 

अंदाज ही कुछ गज़ब का था,


मैंने खुद अपने ही ख़िलाफ 

गवाही दे दी।

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अमित तुम्हें कैंसर है।

 अमित , तुम्हें कैंसर है।

Lung cancer 4th stage.

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तारीख 5 जनवरी 2026

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विभागीय इंस्टिट्यूट में क्लास लेने के दौरान थोड़ा सा महसूस हुआ कि breathlessness हो रही है पर सुबह जिम भी गये थे तो लगा थोड़ा exertion ज्यादा हो गया होगा। बात आई गई हो गई।

तारीख 14 जनवरी 2026

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सेवा निवृति के पश्चात कंसल्टेंसी जॉइन किया था। बस उसी आफिस से लंच के लिए घर आते समय घर के पास ही cardilogist डॉ अतुल अग्रवाल साहब का हॉस्पिटल है। ऐसे ही अचानक मन हुआ आज बीपी चेक करा लें बहुत दिन हुआ ,मिलना भी नही हुआ। मेरे बहुत अच्छे परिचित हैं और बहुत ख़्याल रखते हैं। 

भीड़ के मारे हम संकोच कर रहै थे पर उनके स्टाफ ने बता दिया तो उन्होंने फौरन बुलाया। हमने बताया सब ठीक है बहुत दिन हुए थोड़ा बीपी देखिए कुछ गड़बड़ तो नही।

वो बोले बीपी तो बाद में देखेंगे, पहले यह बताओ तुम हाँफ क्यो रहे। तुरंत उन्होंने पीठ पर आला लगाया और सीरियस हो गए। नाराज़ भी हुए पर मुझे समझ नही आया। उन्होंने तुरंत एक पैथोलॉजी में फोन कर मेरा PFT और चेस्ट xray करने को बोला। 

PFT 52% और xray में आधा lung गायब। फिर वापस गये अग्रवाल साहब के पास। तुरंत उन्होंने अपने कलीग डॉ के lung hospital में भेजा हमें।

संजीवनी लंग हॉस्पिटल के डॉ गुप्ता ने चेक अप किया और बोले या तो तुम्हे TB है या cancer. ईश्वर से pray करो कि TB ही हो।

उन्होंने पीठ पंचर करते हुए इंजेक्शन से फ्लूइड निकालने की कोशिश की। कुछ नही निकला। अब वो लगभग sure थे फिर उन्होंने बहुत सारे टेस्ट अल्ट्रासाउंड, ct scan किया। पर स्पष्ट नही हो रहा था और हमारी फिजिकल कंडीशन भी बहुत ही ठीक थी।

अंत मे उन्होंने PET SCAN कराने को बोला। तारीख 19 जनवरी को यह इमेजिंग हुई। उसके बाद भी हम नार्मल रूटीन में रहे, आफिस जाते रहे।

तारीख 23 जनवरी 2026

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आफिस से ही बैठे बैठे हमने pet scan की रिपोर्ट व्हाट्सप्प पर मंगाई। वो code में होती है , non medico को समझ नही आती है।

हमने उसे chatgpt पर डाल दिया। एक सेकेंड में आ गई finding : 4th stage lung cancer.

दो मिनट के लिए हम जड़वत हो गए। फिर पानी पिया। कार की चाभी उठाई और घर आ गए।

अपने बड़े भाई जो सर्जन भी हैं और अब सेवानिवृत्त के पश्चात एक निजी मेडिकल संस्थान में अध्यापन का काम कर रहे, उन्हें बताया तो तुरंत घर आ गए।

आगे तो bronchoscopy यानी biopsy ही होना था अब। उन्होंने तुरंत बोला कि मुम्बई में टाटा कैंसर हॉस्पिटल में ही आगे ट्रीटमेंट कराना है। उनके कॉलेज सीनियर डॉ राजीव सरीन वहीं टाटा में oncology के हेड और डायरेक्टर भी हैं। उनसे उनकी बात हुई, 27 जनवरी का फिक्स हुआ।

बड़ा बेटा मुंबई में ही है तो फौरन सब मैनेज होना शुरू हुआ।25 जनवरी को ही हम मुंबई आ गए।

तारीख 27 जनवरी 2026

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मन बहुत खराब हो चुका था इन बीते 13 दिनों में। टाटा की भीड़ देख कर खास कर बीमार बच्चों को देखकर बहुत तकलीफ हुई।

टाटा में चेक अप हुआ पर rush के कारण biopsy की तारीख 4 फरवरी मिली। जो dr sareen को लगा कि इसमे तो फिर ट्रीटमेंट शुरू में देर हो सकती है।

उन्होंने बेटे को बोला कि हिंदुजा अस्पताल में dr vijay patil है उनसे मिल लो, पहले वो भी उन्ही के साथ 12 साल टाटा में ही थे।

तारीख 29 जनवरी 2026

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डॉ पाटिल ने बहुत स्पष्ट समझाया कि क्या है और क्या लाइफ थ्रेट है। उन्हें लखनऊ की pet scan रिपोर्ट में कुछ traces ब्रेन में भी मिले। उन्होंने ब्रेन MRI कराई। 

तुरंत अगले दिन ही biopsy हुई, दवा शुरू करने की जल्दी के कारण blood biopsy भी कराई और उन्होंने हमारी target therapy 8 फरवरी से शुरू कर दी यानी एक टेबलेट रोज बस। 

उनका अगला सुझाव कि अगर इसके साथ कीमोथेरेपी भी की जाए तो रिजल्ट बेहतर होगा मगर उसके लिए पेशेंट का अंदर से तैयार होना बहुत जरूरी है।

हम डरे तो थे ही। chemo के लिए हिम्मत नही जुटा पा रहे थे पर अंत मे हाँ कर दिया।

हमारी पहली कीमो 18 फरवरी,

दूसरी कीमो 11 मार्च,

तीसरी अभी 1 अप्रैल को हो गई।

चौथी कीमो 22 अप्रैल को होगी।

अब उसके बाद फिर pet scan होगा उससे आगे का ट्रीटमेंट तय होगा।


खासबात- हम बिल्कुल अच्छे से हैं। progressing well, vitals ठीक हैं, चिंता की कोई बात नही है अब। 

यह पोस्ट लिखना इस लिए जरूरी लगा कि अब तक सबसे फ़ोन पर और इनबॉक्स में झूठ बोल बोल कर थक गया था। अधिकतर लोग शक कर रहे थे कि जिम की पिक नही आ रही, मुम्बई में इतने दिन क्यों, नए जॉब का क्या हुआ etc.

Life_is_so_unpredictable , क्या क्या नही सोच लिया इस बीच मगर यह समझ मे आया कि अंदर की मजबूती ही फाइट करने का सहारा बनती है बाकी दुनिया फिर बेमानी लगती है।


आगे अपना हाल देते रहेंगे। अब तो ठीक होना ही है ऐसा लगता तो है। बाकी दोस्तों और चाहने वालों की दुआएं बेकार नही जाने देंगे।


विशेष :इन सब के चक्कर मे बहुतों के पारिवारिक कार्यक्रमों, विभागीय क्लब के फंक्शन, बहुत अजीज़ लोगों की फेयरवेल पार्टीयों में, उनके बच्चों के शादी ब्याह में सम्मिलित नही हो सके और कोई न कोई झूठा बहाना ही बनाया था उन सबसे। अनुरोध है क्षमा करेंगे।

रविवार, 5 अप्रैल 2026

तुम।

मन्द ठंडी बयार है ,सोंधी खुशबू है। ढेरों गौरैया भी अपनी बीती रात के किस्से आपस मे चहचहा रही हैं। बादलों के कजरारे से टुकड़े बड़ी तेजी से बहे चले जा रहै हैं जैसे सोई हुई खूबसूरत आंखों से काजल का धुआं बह रहा हो उन्ही के गालों पे। 

बरसने का मन है आज शायद बादलों का और दास्तानों का भी।

"तुम कहीं आसपास तो नही।"

बचा हुआ हिस्सा।

शाम को कुछ लिख रहा था ,अधूरा ही रह गया। शाम भी अधूरी रह गई और बात भी। यूँ तो बहुत सी अधूरी शाम के बचे हुए टुकड़े इकट्ठे कर लिए हैं। यह रंग बिरंगे टेढ़े मेढ़े टुकड़े, शामों के ,एक साथ मिलकर एक खूबसूरत कोलाज बना देते है जो नीम अंधेरों में जुगनू सा दमकते रहते है।

"कभी कभी बचा हुआ हिस्सा जो अपने हिस्से नही आता, तमाम किस्से कह जाता है।"

काँटे।

आज एक पौधा देखा ,उसमे फूल कुछ ऊपर उठ कर खिलता है। उसमें कांटे भी है पर फूल शायद खुद उठ कर कुछ इस तरह खिलता है कि उसे छूने वाले को कांटे चुभ न सके। 

"व्यक्ति को भी ऊपर उठ कर खिलना चाहिए जिससे अगर उसकी संगत में कुछ कांटे हो भी तो किसी और को आघात न पहुंचायें।"



मन

पेड़ों के गलों में हाथ डाल चहलकदमी करने का जी करता है। 

हवाओं के रुख से बाल संवारने को जी करता है।

चिड़ियों से चोंच मिलाने का जी करता है।

तितलियों को पलकों पे धरने का जी करता है। 

शंख के कान में फुसफुसाने का जी करता है।

चांद की रोशनी में नदी का कोना खींच ओढ़ लेने का जी करता है। 

"अंगुलियों का अंगुलियों से बात करने का जी करता है।"

शनिवार, 4 अप्रैल 2026

चंद्रमा और रात।

रात कितनी चुपके से आती है। कभी कभी तो मुझसे पहले से आकर कोने में बैठी मिलती है। वक्त का हिसाब रखना शायद रात को नही आता। किसी की दो पल में कट जाती है और किसी की एक रात ज़िन्दगी भर नही बीत पाती।

अगर चन्द्रमा के पटल पर दो सुइयां भी होती जो वक्त बताती रहती तो  फिर रात को वक्त बिताने के लिए खुले आसमान में एक घड़ी का सहारा मिल जाता।

"घड़ी पास हो तो वक्त अपना सा लगता है।"

सवेरा।

सवेरा रोज़ कितनी चुपके से आता है , फिर भी नींद खुल जाती है । 

तुम्हारी बातें भी तो ऐसे ही मुझ तक पहुँच जाती है चुपके से जबकि तुम कुछ बोलते ही नहीं । 

देखो फिर चिड़िया चहचहा रही हैं , यक़ीनन तुम आँखे खोल बरबस एक बार मुस्कुराये हो अभी ।

यह लालिमा सुबह की है या फिर एक बार ओढ़ ली है तुमने चादर लाज की ।

मोड़

साथ चलते चलते अक्सर किसी मोड़ पर ही लोग साथ छोड़ते हैं। मोड़ पर पीछे मुड़ कर देखने पर वह दिखता जो नही है। सीधे रास्तों पर अलग हुए तो बहुत दूर तलक तक वो दिखता रहता है और फिर मुंह मोड़ना आसान नही होता है शायद।


राहें बदलनी हो, बस मोड़ आने दो,

मुड़ कर न देखो, उन्हें बस दूर जाने दो।


#मोड़ज़िन्दगीके

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

प्यार

बिना बात के 

बात नहीं करना चाहिए , 

प्यार हो जाता है । 

अनुशासन

 गुस्सा स्वयं को अनुशासित करता है। 

प्यार अनुशासन में रियायत की गुहार करता है। 

अनुशासन प्यार को कच्ची मौत देता है।


मैं अनुशासन तोड़ना चाहता हूँ।

पुल

 पुल इतना सहज हो कि 

सड़क सा लगने लगे तब नदी हाशिये पर चली जाती है।


"मोहब्बत जब इतनी सादगी से हो कि 

विसाले यार की तलब न हो तब दुनिया हाशिये पर चली जाती है।"

गुरुवार, 26 मार्च 2026

रात कोई एक

 कुछ सवेरे , कुछ शाम ,कुछ रातें संजोने लायक होती हैं । इन्हें यूं ही नहीं खर्च कर देना चाहिए । इनके कुछ टुकडों के सहारे पूरी ज़िन्दगी बिताई जा सकती है । कभी कभी रात भी रात भर इसलिए जागती है कि कहीं ऐसा न हो कि सवेरा हो जाये और रात सोती ही रह जाये । रात के ख्वाब में सुबह की ख्वाहिश कुछ ऐसी ही थी शायद । सवेरे का एक टुकड़ा ऐसा ही है आज और चिड़ियों की चहचहाहट भी मानो यही कह रही ।

बिंदी

 बगैर आईना देखे तुम 

जब दो अंगुलियां नाक पे टिका 

माथे के एकदम बीचों बीच बिंदी लगाती हो 

तो तुम्हारे इस श्रृंगार कौशल के आगे मुझे अपना 

त्रिकोणमिति और ज्यामिति का ज्ञान व्यर्थ लगता है ।

ज़िंदगी

 ज़िन्दगी महसूस करना हो जब कभी तो तितली के खुलते बन्द होते पंख देखना, बुलबुल की आवाज़ आंखे मूंद कर सुनना, नदी किनारे मछलियों को आटे की गोली देकर उनके खुलते बन्द होते मुंह को निहारना, छोटे अबोध बच्चे की मासूम मुस्कुराहट को देखना, रिक्शे वाले को कभी तय  किराए से कुछ रुपये ज्यादा देकर उसकी आँखों की चमक देखना और कभी आईने में अपनी आंखों को एकटक अपलक देखना, ज़िन्दगी ही ज़िन्दगी दिखाई पड़ेगी। ☺☺


#ज़िन्दगी