गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

आंखें/नज़्म

नींद न पूरी हो तो आंखे इश्तिहार हो जाती हैं।

नज़्म भी एहसासों का इश्तिहार ही तो है ।

"यानी आंखों को नज़्म कहना गुनाह नही।"

सुबहें सारी खूबसूरत होती हैं, इसमें कोई शुबह नही , क्योंकि बहुत सारी नज़्में एक साथ लिख दी जाती हैं काजल की लकीरों से।

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