"शब्द भीतर रहते हैं तो सालते रहते हैं, मुक्त होते हैं तो साहित्य बनते हैं"। मन की बाते लिखना पुराना स्वेटर उधेड़ना जैसा है,उधेड़ना तो अच्छा भी लगता है और आसान भी, पर उधेड़े हुए मन को दुबारा बुनना बहुत मुश्किल शायद...।
"नियति व्यापकता लिए हुए है। नियति संसार की होती है ,इसे ही प्रकृति की चाल कहते हैं।"
"प्रारब्ध आपके हिस्से की नियति है।"
"भाग्य आप अपने कर्म से बनाते है। कर्मफल को रेट्रोस्पेक्ट में देखते है तो भाग्य कहलाता है।"
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