रविवार, 5 अप्रैल 2026

तुम।

मन्द ठंडी बयार है ,सोंधी खुशबू है। ढेरों गौरैया भी अपनी बीती रात के किस्से आपस मे चहचहा रही हैं। बादलों के कजरारे से टुकड़े बड़ी तेजी से बहे चले जा रहै हैं जैसे सोई हुई खूबसूरत आंखों से काजल का धुआं बह रहा हो उन्ही के गालों पे। 

बरसने का मन है आज शायद बादलों का और दास्तानों का भी।

"तुम कहीं आसपास तो नही।"

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