शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

" लत तो छोटे फाँट की ही रही .........."



जहां तक याद है मैंने बचपन में लिखने की शुरुआत रेलवे के सरकारी कागज़ ,जो एक बार प्रयुक्त हो चुके होते थे और एक ओर सादे होते थे,से बने रजिस्टर पर की थी | पिता जी बड़े मनोयोग से उस रजिस्टर को सुई धागे से सिल देते थे और हम लोग उन पर अपना अपना नाम लिख रजिस्टर आपस में बाँट लेते थे | रजिस्टर सरकारी जरूर होता था, फिर भी हिदायत रहती थी कि, पन्ना बर्बाद नहीं करना है | पिता जी को इम्प्रेस करने के लिए मैं बहुत छोटा छोटा छोटा लिखता था , जिससे कि रजिस्टर ज्यादा दिन चल जाए और जल्दी से दुबारा मांगना न पड़े | यहीं से शुरुआत हुई, छोटे फाँट की| छोटा यानी महीन लिखने से एक ही पन्ने में २/३ पन्ने का काम हो जाता था | दिमाग में अब यह बात घर करने लगी थी छोटा फाँट मतलब बचत |

लेकिन धीरे धीरे इसके मायने बड़े होते गए | खाना खाते समय मैं माँ से कहता , मुझे छोटे छोटे कौर बनाकर खिलाओ , वह जल्दी के कारण और अधिक खिलाने के प्रयास में बड़े बड़े कौर खिलाना चाहती थीं पर मैं शायद अधिक नहीं खाना चाहता था बल्कि अधिक देर तक खाना चाहता था उनके हाथों से | फिर लत सी लग गई छोटे फाँट के कौर की | पिता जी खुद तो गन्ना खाने के बहुत शौकीन रहे और हम लोगों को अपने साथ गन्ने के छोटे छोटे गुल्ले बना कर देते रहते थे और हम लोग बड़े चाव से उस रस में डूबे रहते थे | हम भाइयों में आपस में सबसे छोटे गुल्ले के लिए लड़ाई सी होती थी क्योंकि गन्ने के छोटे से गुल्ले को खाने में ताकत कम लगती थी और रस पूरा होता था | यहाँ फिर लत लग गई छोटे फाँट की |

ज़िन्दगी में खुश होने की वजह भी बहुत छोटी छोटी रही और छोटी छोटी सी बातों पर ही मन दुखी भी होता रहा था | जब कभी रोये भी तो, कभी बुक्का फाड़ कर नहीं रोये | आंसू भी निकले तो नन्ही नन्ही बूदों के समान, जो मिलकर कभी आपस में मेरे गाल पर एक लकीर भी न खीच सके | यहाँ आंसुओं ने भी छोटे छोटे फाँट का ही साथ पकड़ लिया था | जेब में जब भी पैसे हुए , वे चंद सिक्के ही थे और उनकी खनक जब जेब में होती थी मन ही मन खुद को रईस समझता रहा | बड़े फाँट के रुपये ज़िन्दगी को कभी रास नहीं आये | 

पता नहीं क्यों बचपन से ही हमेशा चाहा कि , जो भी मुझसे मिले उसे खुश कर सकूँ या उसके चेहरे पर मुस्कराहट ला सकूँ | हँसी भी पसंद आई तो वह छोटी सी मुस्कान ही रही, जो किसी के होंठ पर बस खिल सी जाए | खिलखिलाहट या अट्ठहास में पता नहीं क्यों, कभी सच्चाई नहीं दिखी | यानी हँसी भी पसंद आई तो वह छोटे फाँट की ही पसंद आई | खैर ।

मेरी एक पोस्ट पर श्रीमती अजीत गुप्ता जी ने एवं श्री दीपक बाबा जी ने आज लिखा था , थोड़ा फाँट साइज़ बड़ा कर लें , मैंने लिखा ," कंट्रोल के साथ प्लस दबाएँ ,फाँट बड़ा हो जाएगा |"  जीवन में भी अगर कुछ प्लस करना है अर्थात धन संपदा , वैभव , ज्ञान का भण्डार बढ़ाना है तब थोडा कंट्रोल करें , अपना आपा न खोये , अन-कंट्रोल्ड तरीके से अर्जन न करें , वांछित वस्तु का आकार बड़ा होता  जाएगा | जीवन का दर्शन भी शायद इतना सा ही है। ( प्लस तो सब करना चाहते हैं , बस कंट्रोल नहीं है )

"काश ! मनुष्य की इच्छाओं के फाँट छोटे होते जाएँ और कर्मों के फाँट बड़े , तब शायद सब कुछ साफ़ साफ़ नज़र आने लगेगा सभी को |"

11 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छा, यानी यहाँ आएँ तो कंट्रोल प्लस दबाएँ और कहीं और जाएँ तो कंट्रोल माइनस!
    क्या दिन भर यही करते रहेंगे मियाँ?
    पाठकों की सुनो, वो तुम्हारा लिखा पढ़ेगा...
    :)

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    1. इसे कहते हैं 'अर्थ का अनर्थ' | जनाब ! मैंने श्रीमती गुप्ता जी एवं दीपक साहब की बात मानते हुए फांट बड़े और बोल्ड कर दिए | यह पोस्ट लिखने का अभिप्राय मात्र छोटी छोटी चीजों के महत्व पर लिखना था , जो मुझे संवेदनाएं देती थी |

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    2. ओह! तो अभी जो दिख रहे हैं उससे फ़ॉन्ट क्या और छोटे थे????
      फिर तो गुजारिश है कि इसे थोड़ा और बढ़ा दें. ड्योढ़ा तो कर ही दें. उम्रदराज पाठक, तकनीकी रूप से अल्पज्ञ पाठक इत्यादि अहसान मानेंगे..
      :)

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    3. और हाँ, बड़े कीजिए, बोल्ड नहीं.

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  2. जीवन में भी अगर कुछ प्लस करना है अर्थात धन संपदा , वैभव , ज्ञान का भण्डार बढ़ाना है तब थोडा कंट्रोल करें , अपना आपा न खोये , अन-कंट्रोल्ड तरीके से अर्जन न करें , वांछित वस्तु का आकार बड़ा होता जाएगा | जीवन का दर्शन भी शायद इतना सा ही है। ( प्लस तो सब करना चाहते हैं , बस कंट्रोल नहीं है )
    बेहद गहन ... और सार्थक भाव लिए अनुपम प्रस्‍तुति ... आभार

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  3. हम भी दुख को छोटा छोटा बाँट कर पीते रहे, सुख को छोटा छोटा बाँट सबको देते रहे...

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  4. छोटे फ़ॉंट में बड़ी ऊंची बातें कर डाली। :)

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  5. फ़ॉंट छोटा हो या बड़ा ..बात बड़ी होनी चाहिए ..

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    1. इस सार्थक पोस्ट के लिए बधाई स्वीकारें .

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