मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

" हैशटैग....."


हैशटैग सा ,
हो गई थी तुम ,
प्रसंग होता मैं ,
सन्दर्भ रहती तुम  ।

सूखे पत्ते हों या,
हो कटी पतंग ,
उन्हें कोई अब
हैशटैग नहीं करता ।

बालकनी पे खुलते ,
खिड़की के वो पल्ले  ,
जैसे हो एक जोड़ी ,
निगाहें तुम्हारी ।

स्मृतियाँ नहीं ,
बनती मञ्जूषा ,
जानता अगर ,
तो क्यों सहेजता ।

बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

" पुस्तक मेला और हम ......."



बीती रात मैं पुस्तक मेले में गया था | एकदम सन्नाटा पसरा था वहां | सभी स्टाल बंद और ढके मुंदे थे ,कुछ हार्डबोर्ड से और कुछ तिरपाल से | यूं ही एक स्टाल के बगर से गुजर रहा था (जिसके बाहर लिखा था "हिन्दी की बेस्ट सेलर्स ) तो लगा जैसे भीतर कोई बाते कर रहा हों | ठहर कर आदतन उनकी बातें सुनने का प्रयास करने लगा | 

एक मीठी सी पर उदास आवाज़ में कोई अपनी व्यथा सुना रहा था ,उसने पल्लू से अपने कई बार साफ किया चेहरा मेरा ,थोड़ा देखा फिर सीने से लगाया पर अपने संग ले नहीं गई | तब तक शोख आवाज़ में कोई और बोल पड़ा ,तुम्हे तो सबसे आगे जगह मिली है ,सज धज कर रंगीन आवरण में टिकी रहती हो ,बस इसीलिये हर कोई हाथों हाथ लिये रहता है | वहीं भारी आवाज़ में कोई बोला कि मेरा वज़न इतना ज्यादा कर दिया है कि नाजुक कलाइयों वाले मुझे छूते ही नहीं कि कहीं मुचक न जाये कलाई उनकी | लो कर लो बात ,बोल उठी एक पतली सी एकदम महीन आवाज़ ,मुझे तो इतना छरहरा बना रखा है कि लोग विग्यापन समझ बिना पूछे संग ले जाने लगते हैं | एक सयानी सी आवाज़ उन सब को समझा रही थी ,बहुत दुनिया देखी है हमने , अगर बाजार में चलना है तो थोड़ा बन ठन के तो रहना पड़ेगा और भीतर थोड़ा अत्याचार / व्यभिचार , लाचार हरकतें भी जरूरी हैं तभी गाड़ी चल पाती है | आगे वृद्ध आवाज़ में सुनाई पड़ा कि जैसे जिंदा जिस्म ही हरकत कर सकता है वैसे ही अगर हमारे अंदर जिस्मानी नुमाइश न हो तो फिर खुद को मुर्दा ही समझो | जो भी यहाँ से धडा धड़ निकल रही है और लोग हाथों हाथ ले रहे हैं उनमे प्रेम कम तिरस्कार अधिक और सम्बंध कम विच्छेद अधिक है | 

सुनते सुनते जब मैं और करीब जाने लगा उनके ,सहसा कोई बोल पड़ा ,कोई है कोई है ,इस पर सारी आवाज़ें बंद हो गई ,वैसे ही जैसे घूंघट के भीतर से ही अगर सास के आने की आहट मिल जाये तो बहुएं उसकी बुराई करना बंद कर देती हैं | 

दरअसल यह सब किताबें ही थी तो रात में जीवंत हो उठी थी और आपस में बतिया रही थी | पता नहीं क्यों मुझे सारी किताबें परस्पर ईर्ष्यालु सी लगीं | 

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2014

" हर मुड़ा तुड़ा कागज कचरा नहीं होता ......"


हर मुड़ा तुड़ा कागज कचरा नहीं होता ,
आंसुओं संग बह जाये वह कजरा नहीं होता ,

मुड़े तुडे कागज़ अक्सर होते हैं खत मोहब्बत के ,
 लफ्ज़ जिसके हरेक जुगनू होते हैं 'उन' नज़रों के ,

ऐसा ही टुकड़ा एक दबा रह जाता है अक्सर नीचे तकिये के ,
और कर देता है उस ओर मुझे 'उनकी' यादों के हाशिये के ।

हाशिये पर ही ठहर गई फिर एक बार कलम उनकी  ,
दिल कह रहा है आंसुओं से बन जाओ अब स्याही उनकी ।

हाँ ,यह सच है आँखें आँसू बहाना चाहती हैं ,
यह भी सच है , कोई तो 'बहाना' चाहती हैं । 

बुधवार, 1 अक्टूबर 2014

" सफाई तो हो गई .......देखते देखते "


आनन फानन में बड़े साहब ने मीटिंग बुलाई | विचार हुआ कि २ अक्टूबर के मौके पर कार्यालय प्रांगण की सफाई की जानी है | कुल कर्मचारी /अधिकारी मिला कर गिनती हुई १२१ , अरे यह तो बहुत शुभ अंक है ,अवश्य कुछ अच्छा होने को है ,बड़े साहब बोले | 

सफाई के लिये सब लोग अपने अपने घरों से झाड़ू लेते आयेंगे , एक कर्मचारी ने राय दी | उस कर्मचारी को घूरते हुये बड़े साहब बोले ," नहीं घर का सामान ,दफ्तर मे नहीं लाया जायेगा , यह उचित नहीं |" अपने सबसे खास 'टेंडर बाबू' को बुलाकर कहा ,"शीघ्र एक अल्प कालिक निविदा आमंत्रित करो और उसके माध्यम से १५० अदद झाड़ू और १५० जोड़े दस्ताने क्रय करने क़ी व्यवस्था करो |"

अब सबसे पहला काम झाड़ू की डिज़ाइन का मानक तय करना था | झाड़ू के डंडे की लंबाई , मोटाई और उस पर उच्च कोटि के केसरिया रंग के पेन्ट का कोड तय कर दिया गया | झाड़ू की सींको का 'फ्रंट प्रोफ़ाइल' कुछ इस प्रकार ' डिज़ाइन' किया गया कि झाड़ू लगाते समय झाड़ू और जमीन के मध्य २० अंश का कोण बन सके ,क्योंकि रिसर्च से पता चला है कि इसी अंश के कोण पर झाड़ू से न्यूनतम श्रम के सापेक्ष अधिकतम आउटपुट मिलता है | झाड़ू के सींको के विषय में आम राय यह बनी कि ,सींको के स्थान पर 'ओप्टिकल फाइबर' का प्रयोग किया जाय और झाड़ू के डंडे के उपरी सिरे पर भीतर एक बैटरी चालित बल्ब लगा हो | खोखले डंडे के भीतर से रोशनी प्रवेश करते हुये 'ओप्टिकल फाइबर' वाली सींको से रोशनी उस स्थान पर पड़ेगी जहां सफाई किया जाना होगा | इतनी हाईटेक झाड़ू से कोई भी कूड़ा करकट बचा रहा जाय ,असंभव है | रात को भी अगर सामूहिक सफाई की जायेगी ,इतनी उच्च तकनीक की झाड़ू से, तो मंगल से धरती पर देखने पर असंख्य तारे से बिछे दिखेंगे ज़मीन पर | प्रत्येक झाड़ू पर एक संदेश भी लिखा होगा कि " झाड़ू चलायें ,स्वास्थ्य बनायें |"

अगला मानक दस्तानों का तय किया जाना था | दस्ताने बहुत ही मुलायम और हल्के डिज़ाइन किये गये ,जिससे उन्हे पहनने के बाद भी कलाइयों की लचक बनी रहे क्योंकि झाड़ू लगाते समय कलाई और कमर में लोच / लचक बहुत आवश्यक है |(इस बात पर भी बहुतों ने हामी भरी |) 
 
दोनो महत्वपूर्ण वस्तुओं की कीमत मिलाकर टेंडर की राशि तय हो रही है | बड़े साहब मंद मंद मुस्कुरा रहे हैं | सफाई तो अब लगभग तय है , भले ही वह सरकारी खजाने की हो | 

रविवार, 28 सितंबर 2014

" कुछ मीठा हो जाये ....."


अभिषेक / रमन ,

जन्मदिन पर क्या कहें बस खिलते रहो , खिलखिलाते रहो । शिक्षा / नौकरी के विषय में अब तो कुछ कहना शेष नहीं , उन दोनों क्षेत्रों में तुमने अपने  साथ साथ हम लोगों का भी मान बढ़ाया ही है पर कुछ ज्ञान तो देना पड़ेगा न ,नहीं तो पापा कैसे कहलाऊंगा ।

१. शारीरिक स्वस्थता और मानसिक दृढ़ता शीर्ष वरीयता पर होने चाहिए ।
२. हर अगला दिन पिछले दिन से भिन्न अर्थात कुछ तो नया होना चाहिए ।
३. जिस किसी के संपर्क में आओ उस पर तुम्हारे व्यक्तित्व का अधिक नहीं तो तनिक सा तो प्रभाव दिखना चाहिए ।
४. जितना संभव हो  समाज / देश की बेहतरी / तरक्की के लिए निरंतर प्रयास होना चाहिए । परिवार के लिए तो हर कोई करता है । सोच परिवार से ऊपर की हो ।
५. किसी भी निर्णय के दूरगामी परिणाम की व्याख्या समग्रता में बहुत आवश्यक है , वह निर्णय चाहे परिवार के सन्दर्भ में हों या समाज / देश के सम्बन्ध में हों ।
६. हासिल सब कुछ करो पर ,अपना कुछ भी मत समझो ।
७. तुम्हारी किसी भी बात अथवा कृत्य से कभी किसी के आत्मसम्मान को ठेस नहीं लगनी चाहिए ।
८. समाज में आर्थिक और शैक्षिक विषमताएं बहुत हैं । समाज के निम्नतम स्तर के लोगों की भी बेहतरी के विषय में यथासंभव सोच हो और प्रयास भी ।
९. कितनी भी उन्नति कर जाओ पर सामाजिक मर्यादाओं का भान रहे ।
१०. जीवन में सफलताओं / विफलताओं का क्रम अवश्य आता है । उनसे न कभी निराश हो और न कभी आपा खो दो ।

और अंत में सिर्फ और सिर्फ एक बात , तुम्हारी मम्मी को तुमसे अब क्या चाहिए पता है ,तुम्हे ? सिर्फ रोज़ दो मिनट की बात फोन पर ,कितने भी बिज़ी हो, कितनी भी अन्य प्राथमिकताएं हों , देश में हो या रहो विदेश में ,बस एक बार तुम लोगों की आवाज़ सुन लेती हैं तो उनका दिन पूरा हो जाता है और तुमसे बात होने पर तुम्हारी मम्मी के चेहरे पर जो संतोष और ख़ुशी झलकती है न ,उससे मेरा दिन पूरा हो जाता है । 

अब एक चॉकलेट खा लेना ,इतनी कड़वी दवा के बाद कुछ मीठा हो जाये ।

( जन्मदिन तो तुम्हारा है पर यह बातें तुम्हारे दद्दा ( अनिमेष / राजन ) के लिए भी हैं )

सोमवार, 22 सितंबर 2014

" लिखते तो अच्छा हो ,पर लिखते क्यूँ हो ......."


नज़्मों में तुम्हारी दर्द सहती रहूँ मैं क्यूँ  ,

लिखते तो अच्छा हो पर लिखते क्यूँ हो ,

मेरे एहसास बयां होते है तेरे लफ़्ज़ों से ,

पर अपने लफ़्ज़ों से मुझे यूँ भिगोते क्यूँ हो ,

मोहब्बत तो थी पर जब निभानी न थी ,

फिर इतनी मोहब्बत यूं करते क्यूँ हो ,

इज़हारे इश्क का अगर हौसला न था ,

छुप छुप के ज़ाहिर इश्क  करते क्यूँ हो ,

रहने दो मुझे मेरी ही तन्हाइयों में ,

यूं मिल मिल कर निगाहें भिगोते क्यूँ हो । 

रविवार, 21 सितंबर 2014

"बैक डेट से मोहब्बत ,क्यों नहीं ...."


                                                                             
                                                                             यदि प्रेम एक संख्या है
                                                                             तो निश्चित ही
                                                                             विषम संख्या होगी

                                                                             इसे बांटा नहीं जा सकता कभी
                                                                             दो बराबर हिस्सों में ।

हाँ ,वह एक नेक और पाक रूह थी | अंगूरी बादल सी धुँधलाई उसकी कहानी ने जबसे अपनी चुप्पी तोड़ी है , कसम से उसकी उदासियाँ अब सालने लगी हैं | स्मृति जब रीतती है तब पनीली उदासी भी रिसते रिसते एक सवाल छोड़ जाती है ,क्या मुझे तब भी मोहब्बत थी उससे |

स्वेटर बुनते हुये जब वह निगाहें उपर उठाकर भौं के बीच एक मुस्कुराता हुआ प्रश्नचिन्ह बनाती थी न ,तब मेरे सारे दुखों के बीज जन्मने से पहले ही मृतप्राय हो जाया करते थे | उसकी स्मृतियाँ अमलतास की डाली है ,जिस पर सदियों से विरासत की चली आ रही मोहब्बत की कहानियों के शब्द बनते बिगड़े मेरी नज़्म का ही रूप अख्तियार कर लेते हैं और गाहे बगाहे मुझे ही उसके राग विराग से रु-ब-रू भी कराते हैं और हैडल विद  केयर की नसीहत भी देते हैं |

अब एहसास होता है कि वह मैं ही हुआ करता था दुआ में उसकी ,जो मेरी नज़्म और मेरे कमरे का मौसम ख़ुशबुओं से लबरेज़ कर उठती थी । अक्सर वह प्रेम में होने का अर्थ और प्रेम का रसायन् बयाँ करती नहीं थकती थी | दुआ एक और की थी उसने जब स्पर्श किया था होंठ मेरे और बरबस ही निगाह में रिश्ते कुछ बन से गए थे | इच्छायें मुझे एहसास कराती तो रहीं उसकी चाहत की ,परंतु जैसे बादल धूप न बनने दे तो सर्दी कभी गुनगुनी नहीं लगती बस वैसे ही वक्त ने एक पुल न बनने दिया हमारे और उसके बीच जो उसके साया को मिला देता रूह से मेरी |

बदरा भी इंतज़ार करता है बरसने से पहले कि कोई ख्वाहिश तो करे बारिश की ,बस उसी तरह मैं भी इंतज़ार करता रहा  उम्र भर प्रेम करने से पहले प्रेम का विज्ञान समझ पाने का  | पर बदरा तो बरस गया ,मैं ही न बरस पाया ।

सच तो यह है कि बिन्दी उसके माथे की शून्य सा लगाती थी , जिसमें विलय होता रहा मैं तब और अब विलीन हो जाएगी मेरी शेष ज़िंदगी की गुज़र | ख्याल से उसके कभी बे-ख्याल हुआ हूँ ,ऐसा शायद कोई लम्हा नहीं पर हाँ ,प्रेम का गणित , प्रेम का भौतिक शास्त्र ,प्रेम की प्रकृति समझने में कुछ वक्त तो ज़ाया जरूर किया | बीज जो बो उठा था हमारे मन में उसके प्रेम का ,उसकी तलाश में अंधेरा सा हो चला है अब मेरी ज़िंदगी में । बस धड़कन जरूर धड़क रही हैं इन दिनों और शायद इनकी तो यही नियति है मौत तक |

इब्तेदा मोहब्बत की हो , इन्तेहा मोहब्बत की हो या हो फिर बेइंतहा मोहब्बत ,हर कहानी में मोहब्बत अब भी रोती है क्योंकि लौ जो जलाता है मोहब्बत की अँधेरी सुरंग में ,वही जल उठता उस लौ में ,जैसे रेत में मरता हो कोई बस गुजारिश करता हुआ ,दो बूँद पानी के लिए ।

यकीन हो चला है कि ख्वाहिश कभी पूरी न होने के कारण ही मोहब्बत करने वाले सपनो का सौदागर बनते बनते जोग में रम जाते हैं | यूं तो सिन्दूर हर औरत की आकांक्षा होती है जो उसे नदी सा प्रवाह और पवित्रता देता है । परंतु कुछ लोग उन पर गुलामी की बेड़ियाँ भी जकड़ देते हैं नाकाम इश्क की आड़ में | अच्छा हुआ वह चिड़िया बन उड़ गईं और मेरी प्रतीक्षा नहीं करी ,क्योंकि मैं तो यादों के पदचिह्न पर चलता चला ही जाऊँगा |

आज वह रास्ते याद आ गये जिन पर हम चले थे कभी संग संग ,खाते खाते कच्ची मूंगफलियाँ और एक बार इन्ही रास्तों पर सहसा एक झटके में मैने उसके  चेहरे को उसकी ही ज़ुल्फ़ों से बेनकाब करते हुये उसका मुंह चूम लिया था | तब उसने कहा था ,आसमां की ओर ताकते हुए ,सुनो बरखा ,बरस न जाओ एक बार फिर , जिससे मैं उसके आंसू न देख सकूं | उसने ढांप लिया था चेहरा अपनी हथेलियों से ।

आज अकेले सोचता हूँ तो लगता है जब वह थी तब जैसे तारों की बारात थी मेरे पास और आज तारों की घर वापसी हो गई और कर गई मुझे अजनबी मेरे ही घर में और अब घर का हर कोना डेड एंड सा लगता है | मृत्यु कहूँ या महामुक्ति अब तो बस उसी की प्रतीक्षा में एक ख्वाब जलता हुआ सा देखता रहता हूँ |

जब कभी ख्वाब का रूपांतरण उसके  चेहरे में हो जाता है तब उसकी पनीली आंखे चुभन सी पैदा करती हैं मेरे जिस्म में और अनायास होने लगती है एक तलाश कविता की | पर जब एक ख्वाब थका सा हो तो उसमे और चिता में कोई फर्क नहीं होता क्योंकि फिर दोनों ही दोनो भस्म कर डालते हैं ख्वाबों के वजूद को |

तुम्हारे बिना रिहाई आसान नहीं इस तन्हाई की कैद से | बंधक बन बैठा हूँ तुम्हारी यादों का , जो शायद जीवन यात्रा की समाप्ति पर ही अब रिहा करेगा मुझको | अब जब भी प्रेम कविता लिखता हूँ न ,वो लम्हे जिनमे उसकी याद गुजरी , डुबो ही लेते हैं मुझे अक्सर झील बन कर |

सोचता हूँ मैं ही न समझ पाया उसको  ,कितना मोहब्बत करती थी वो मुझसे | मुझे तो अब उस से मोहब्बत हो गई है 'बैक डेट' से |

"इश्क तुम्हे हो जायेगा" अनुलता जी का एक अद्भुत संकलन हैं 'प्रेम कविताओं' का । इस धरोहर का प्रत्येक शीर्षक एक पोटली है जिसमे बंद है अनमोल खजाना । बस उन्ही पोटलियों को इकठ्ठा कर एक प्रयास किया है ,एक टूटी फूटी कहानी लिखने का । (इस कहानी को अर्थ देने के लिए अनु जी की पुस्तक के सभी शीर्षकों को ही शब्द-विन्यास के रूप में प्रयुक्त किया गया है )