शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

काजल बनाम रात।

'रात' अब उतनी गाढ़ी नही होती कि उस के आर पार न दिखाई दे।रात के उस पार उजाला सा रहता है जिसे इस पार से छूने की ख्वाहिश में नींद भी नही आती फिर।

आज रात को भर लिया एक मर्तबान में, कांच के, और छोड़ दिया उसे,निथरने के लिए। थोड़ी ही देर में रात नीचे बैठ गई गाढ़ी होकर, थोड़ी सी ही जगह में। पूरे मर्तबान में ऊपर तक भरा हुआ था, बस धुँवा धुँवा सा ,हल्का हल्का, बहा हुआ काजल आंखों का।

रात काजल से बनती है या काजल रात से ,पता नही। हाँ,गाढ़ा अब कुछ नही होता और इसीलिए नींद भी फिसल सी जाती है ,आंखों से शायद।

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