गुरुवार, 2 जुलाई 2026

मंज़िलें।

 #मंजिल #मकान #की #या #ज़िन्दगी #की


मकान ऊँचा था ,

इंसान इतराया,

वक्त भी बौना लगा।

वक्त रीता ,

रीता रेत भी ,

आसमान मुस्कुराया।

वक्त फिसल गया,

हाथ छूट गया,

इंसान बौना रह गया।

सीमेंट रेत सरिया,

खुद कभी मजबूत कहाँ,

वक्त ही निभाता इन्हें।

"वक्त गर मजबूत ,

झोपड़ी को भी हासिल हुनर ,

पनाह का महलों को।"


©अमित

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें