बुधवार, 18 मार्च 2020

"काश......"

लफ्ज़ मेरे वो,
कुछ खास न थे,
वो ठिठके जब,
ठहर तुम ही गये होते।

अश्क थामे रहा ,
लबों पे ,तबस्सुम से,
निगाहें मिला लेते गर तुम,
दो चार ढल तो गये होते।


रविवार, 15 मार्च 2020

" मचान लबों का ...."



पन्नों में दबे गुलाब जब तब महक उठे,
सीने की धौकनी से उसे जब भी साँसे मिली।

एक शायर कसमसा रहा था अरसे से किताब में,
तेरे लबों का मचान पा वो आसमान छू गया।

"बारिश लबों पे ....."



मुस्कुराये जरा क्या वो जब,
लबों पे उनके बारिश हो गई।
बारिश का एक कतरा ठहरा जब,
लब उनके फिर इंद्रधनुषी हो गये।
लबों के हाशिये पे ठहरे भीगे लफ्ज़ ,
एक अनकही कहानी पूरी कह गये।

"वायरस...."


कोविड 19

ध्यान रहे ,कहीं यहां वायरस न हो। इस बात का एहतियात बरता जा रहा सब जगह। अब वायरस दिखता तो है नही , परन्तु यह मान कर कि वो कहीं भी हो सकता है , उसके होने से बचने के उपाय किये जा रहे।

ईश्वर भी कहीं दिखते नही। अगर हम बस इतना सा मान लें कि  कहीं हमारे आसपास ईश्वर न हो और सब देख रहे हों तो शायद हम गलत काम भूल से भी न करें।

#एक #विचार।

शनिवार, 30 नवंबर 2019

.....धुंधलाता गाँव



धुंधलाता गांव
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थोड़ा सा गांव ,शहर क्या गया,
कीमती हो फिर वो अनमोल हो गया।

पगडंडी सी राहों पे रुका था कभी,
सारे शहर का वो रास्ता आम हो गया।

शहर उलझा सा ,उसके पांवो में जब,
जैसे लिपटा हो सेवार, तलाब में अब।

शहर के छोर पर चमके, जब जुगनू कोई
तलाशता हो गांव जैसे, अपनी रोशनी कोई।

©अमित श्रीवास्तव


शुक्रवार, 10 मई 2019

" एक शब जो नज़्म बनी ........"



लफ्ज़ लफ्ज़ तेरा बेचैन करता रहा रात भर,
ख़त में लिख दे इन्हें या नज़्म का पहरा कर दे।

तकाज़ा दिल का था फिर इल्जाम जुबां पे क्यों,
मौसम बंजर बहुत इन आँखों को अब झरना कर दे।

दीदारे जुनू न रहा कोई बात नही अब 'अमित',
पलकें मचलती है बस इत्ते इल्म का सौदा कर ले।

दस्तक दें जब कभी सांसें मेरी दिल पे तेरे
लबों से चूम लेना नाम मेरा इत्ता सा वादा कर ले।

बुधवार, 6 मार्च 2019

" अभिनन्दन ......."


मूछों की इस अलगनी पर
टंगे थे कतार से
कितने भरोसे
कितने वादे
वक्त ऐसा हुआ जब
बस अंत था सन्निकट
मूँछो ने गुदगुदाया
जोश फिर थम न पाया
जाती है जान
तो जाय
नक्शा दुश्मन को
न मिल पाए
जहाज गिरा दुश्मन का
जमीन पर
वो नभ से
नभतर हो गया।