शनिवार, 1 अगस्त 2026

एक गुमनाम ख़त।

मैं ख़ुद तो सुबह की चाय नहीं पीती पर बाक़ी सबके लिए चाय बनाते वक्त आपकी चाय और अरारोट के बिस्किट याद आये जो आपने मुझे सजेस्ट किए थे।

आज भी मैं चाय बनाते वक्त एक गीत गुनगुना रहा थी उस गीत में नायिका अपने नायक को कहती है कि शायद अब इस जन्म में मुलाक़ात हो न हो। 

तभी चाय पर उबाल आ गया। मैं उबाल को गैस धीमा करके  नीचे धकेलना चाहती थी मगर ठीक उस वक्त मुझे आपकी इतनी गहरी याद आई कि मैंने पेन को बर्नर से उतार दिया। 

चाय का उफान उतर चुका था मगर मेरे मन में बरबस एक उफान उठ खड़ा हुआ. चाय छानते हुए मैंने सोचा आपकी तन और मन की स्थिति कैसी होगी या अभी भी उदास होंगे या बीमारी से लड़कर खुद की साँसों का अनुशासन साध लिया होगा.

आज आपका बर्थडे था तो उगते सूर्य के साथ ही मैंने आपको बड़ी शिद्दत से याद किया। यादों की एक सबसे खराब बात यह होती है कि ये अपनी सुविधा से आती हैं भले ही हम उसके लिए तैयार हो या न हो। यादें आकर हमें हद दर्जे तक अस्त-व्यस्त करने की जुर्रत रखतीं हैं।

आज चाय के बहाने आपकी याद आई पर मुझे लगता है याद के लिए किसी बहाने की जरूरत नही होती है।

सुबह ही सोचा कि आपसे सही समय लेकर आपको फोन करूँगी मगर दिन चढ़ते-चढ़ते जिम्मेदारियों को पूरा करते करते यह विचार भी निस्तेज होकर मन से बह गया। 

मैं देर तक सोचती रही कि याद आने और बात करने में कोई सह-सम्बन्ध हो है नही इसलिए किसी की याद आने पर उसे क्या फोन करना, हो सकता है मैं आपको उस  दिन फोन करूं जिस दिन मुझे आपकी बिल्कुल याद न आई हो. 

फोन शायद एक जरूरत से,शिष्टाचार से जुड़ी क्रिया है और यादें किसी जरूरत की मोहताज़ नही हैं।

रात होते होते आपकी याद मुझे खुद से बेदखल न कर दें इसलिए मैंने तय किया है कि आज देर शाम अपनी फेवरेट कॉफ़ी की  जगह चाय ही पिऊँगी और ईश्वर से प्रार्थना करूँगी कभी आपसे चाय पर चर्चा या कॉफ़ी पर कन्वर्सेशन ज़रूर हो ❤️

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