गुरुवार, 26 जनवरी 2012

" बेबस तकिया ..."



कितना बेबस,
ये तकिया,
सपनो की मौत, 
होते देखता रोज़,
पर उसके बस में,
कुछ भी नहीं ।
कुछ सुकून पाता तो है, 
दिलों से लिपट कर,
और खुद को,
भिगो भी लेता है अक्सर ।
कितने फूल देखे सिरहाने उसने,
इत्र और खुश्बू से, 
सराबोर हुआ कई बार ।
मगर हिस्से आयी, 
तन्हाई ही अक्सर ।
कभी तो दो दिलों को,
सुलाया भी ,रुलाया भी,
एक ही साथ |
और कभी,
ये तेरा वो मेरा का,
हुआ चश्मदीद गवाह ।
इससे तो अच्छी,
किस्मत चादर की,
दुःख तो नही देखा,
बंटवारे का ।

17 टिप्‍पणियां:

  1. तन्हाई ही अक्सर,
    कभी तो दो दिलों,
    सुलाया भी ,रुलाया भी,
    मन की बात बताती समझाती पंक्तियाँ .....उम्दा प्रस्तुति .....

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  2. वाह.!! बहुत खूब लिखा है!
    पर क्या सचमुच हर सपने की मौत होती है ..
    सपने सच भी ओ होते हैं
    गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें ..जय हिंद !!
    kalamdaan.blogspot.com

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  3. कुछ अनकहा सा लिखा आपने...
    बहुत खूब.

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  4. बहुत खूब ... तकिया गवाह है टूटे सपनों का ... उम्दा प्रस्तुति ...
    गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें ...

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  5. गजब के भाव।


    गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं....

    जय हिंद... वंदे मातरम्।

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  6. बहुत सुंदर भावपूर्ण प्रस्तुति|
    गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें|

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  7. वाह बहुत ही सुंदर भाव संयोजन ॥मैंने भी कुछ ऐसा ही लिखा है समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है
    http://aapki-pasand.blogspot.com

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  8. हम्म तकिया...बहुत कुछ कह दिया आपने.

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  9. एक अदद तकिये की दरकार हर किसी के लिए जरूरी है...दिल की भड़ास निकालने के लिए तकिये की पिटाई भी की जाती है...

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  10. कोमल भावो की अभिवयक्ति.....गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें ....

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  11. रोज सोने के पहले हिसाब लेती है सपनों का..

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  12. आपके इस उत्‍कृष्‍ठ लेखन के लिए आभार ।

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  13. कविता का अस्तित्त्व खतरे में नहीं है .... बस टाकिया को पुल्लिंग के रूप में प्रयोग करें ... बेहतरीन भाव

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