बुधवार, 18 जनवरी 2012

" बच्चों से अपेक्षा से पहले बच्चों की अपेक्षाएं ......"

     
          व्यक्ति का स्वयं का अस्तित्व ही प्रकृति या ईश्वर के होने का बोध कराने का सक्षम प्रमाण होता है परन्तु स्वयं का अस्तित्व में आना इतनी सहजता से होता है कि व्यक्ति स्वयं के होने का दृश्य नहीं देख, समझ पाता । जीवन में जीवन-साथी का आना भी एक सामाजिक और स्वभाविक क्रिया सी लगती है ।परन्तु विवाह के पश्चात घर आँगन में किलकारी सुनने को बेताब कान शनै: शनै: ईश्वर की सत्ता को समझने लगते हैं और जब घर में पुत्र या पुत्री का जन्म होता है तब शत प्रतिशत उस परम पिता परमेश्वर की आस्था में विश्वास हो जाता है कि जीवन से जीवन कैसे उत्पन्न होता है । 
          बच्चे के जन्म के साथ ही माता-पिता उसे एक काल्पनिक सांचे में ढालने को तैयार और तत्पर रहते हैं ।बच्चा प्रारम्भ में अबोध होता है । किलकारी मारता है ,खेलता है ,रोता है, तंग करता है ।माता-पिता उससे अपने मूड ,मन ,समय और आवश्यकतानुसार व्यवहार करते हैं । बच्चा अबोध अवश्य है पर वह उस समय अपने आसपास अपना बिम्ब ही ढूंढता है ।उसकी अपेक्षा यह होती है कि उसके व्यवहार के अनुसार ही माँ-बाप उसके संग व्यव्हार करे । पर शायद उसके बचपन में यह अनदेखी अक्सर सभी से हो जाती है । इसके विपरीत उस नन्ही सी जान से सब आशा करते हैं कि वह उन बड़ों की समय सारिणी के अनुसार ही अपनी दिनचर्या रखे । 
         और यहीं से बच्चों से अपेक्षा और बच्चों की अपेक्षा के बीच द्वन्द आरम्भ हो जाता है ।जैसे जैसे बच्चे बड़े होते हैं ,वे विशेषकर अपने माँ-बाप और शिक्षक में अपना आदर्श और कभी कभी स्वयं को देखते हैं ।बच्चे सारी दुनिया में अपने माँ-बाप को ही सबसे अधिक विद्वान और समर्थ मान लेते हैं । धीरे धीरे बड़े होने पर वे अपने स्कूल और आसपास के बच्चों के परिवेश और उनके माँ-बाप को देखते हैं और तब उनसे अपने परिवार ,विशेषकर अपने माँ-बाप की तुलना करते हैं ।उस समय बच्चों की यह अपेक्षा होती है कि उनके माँ-बाप भी पद प्रतिष्ठा में सबसे उच्च हों । भिन्नता होने पर और स्पष्ट कारण न जानने पर उनमें हीनता का भाव आने लगता है । यहीं से उन्हें तथ्यों को छुपाना और बातें बनाना आने लगता है । इस समय आवश्यकता होती है कि बच्चे को यह बताया जाये कि समाज में आर्थिक विषमता क्यों है और वह कितनी महत्त्वपूर्ण है ।  
          अनुशासित बच्चे स्कूल में सम्मान पाने पर घर में भी वैसा व्यवहार करना चाहते हैं परन्तु घरों में माँ-बाप उसकी बात को सहजता से ले गंभीर नहीं होते । परिणाम स्वरूप उसे समझ आ जाता है कि स्कूल की बातें केवल अंक प्राप्त करने के लिए हैं ,व्यवहारिक जीवन में उनका कोई स्थान नहीं है । 
          वयस्क होते होते उसे तीन प्रकार की ज़िन्दगी दिखाई पड़ने लगती है । पहली घर में ,माँ-बाप के व्यवहार के साथ ,दूसरी स्कूल की और तीसरी उसके अपने दोस्तों के परिवेश और माहौल की । बस इन्ही तीनों में वह उलझ जाता है कि सच क्या है । अन्य बच्चों के माता पिता यदि अधिक सुसंस्कृत है या उच्च पद पर आसीन है तब वह अपने घर में भी वैसा ही वातावरण चाहता है । ऐसे में माँ-बाप को चाहिए कि आर्थिक  पक्ष को छोड़ कर अन्य सभी दी जा सकने वाली सुविधाएं और वातावरण उन बच्चों को  अवश्य दें ।
           जितना कोई माँ-बाप अपने बच्चे को समझता है ,उससे अधिक उनका बच्चा अपने माँ-बाप को समझता है । वह अच्छी तरह से जानता है कि उसके माँ-बाप उससे क्या अपेक्षा रखते हैं  और यदि वह बच्चा उन अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर रहा है तो वो माँ-बाप कैसा अनुभव कर रहे होंगे । अपेक्षाकृत परिणाम न मिलने पर माँ-बाप को बच्चों के आगे या किसी के भी आगे दुःख प्रदर्शित नही करना चाहिए क्योंकि वह बच्चा तो पहले से ही दुखी है ,अपितु उसे यह भरोसा दिलाया जाना चाहिए कि परेशान मत हो ,आखिर हम माँ-बाप है न । उसका भविष्य संवारने के लिए जो भी संभव हो प्रयास करे ,उसकी छोटी छोटी सफलताओं पर प्रसन्नता दिखाएँ और असफल होने की जिम्मेदारी स्वयं पर लें । बचपन में जब माँ-बाप छोटे से बच्चे को जब ऊपर आसमान की तरफ उछालते हैं तब वह बच्चा बिना डरे हुए किलकारी मारते हुए हंसता रहता है क्यों कि उसे विश्वास रहता है कि वह अपने माँ-बाप की गोद में है और वहां पूरी तरह से महफूज़ है । यही भरोसा उसे बड़े होने पर भी मिलता रहना चाहिए कि वह कितना भी असफल क्यों न हो जाए ,माँ-बाप उसे तब भी अपने प्यार में महफूज़ ही रखेंगे ।
         कभी कोई कठिन परिस्थिति उत्पन्न हो जाए तब माँ-बाप को एक प्रयोग यह करना चाहिए कि तनिक देर के लिए अपनी स्थिति अपने बच्चे से परिवर्तित कर लें और जैसा व्यवहार बच्चे से अपेक्षित करते हैं स्वयं करके देखें । तुरंत समाधान मिल जाएगा । आपका बच्चा आपका है और आप के ही जैसा है ,आप क्यों चाहते है कि वह दूसरों की तरह व्यवहार करे । उसके लिए पहले आपको उस दूसरे बच्चे के माँ-बाप की तरह का व्यवहार और जीवन शैली अपनानी पड़ेगी । दुःख होता है जब लोग अपने बच्चों की तुलना दूसरे अच्छे बच्चों से करते हैं और उन्हें कोसते हैं । जबकि यदि तुलना उनकी खुद की, उन अच्छे बच्चों के माँ-बाप से की जाए तो शायद दोषी वह स्वयं ही पाए जायेंगे ।  
         प्रत्येक बच्चा अच्छा होता है, प्यारा होता है और बहुत कुछ करने की क्षमता रखता है । आवश्यकता केवल उसकी खूबियों और रुझान को समझने की होती है ।
               

          "जेनरेशन गैप जैसी कोई चीज नहीं होती ,वह तो बस 'बच्चों की अपेक्षाओं 'और 'बच्चों से अपेक्षाओं' के अंतर का नाम ही है शायद ।"

10 टिप्‍पणियां:

  1. स्वयं का जीवन बच्चों के माध्यम से देखते हैं हम सब, आशा और स्वप्न उन पर ही आधारित होने लगते हैं..बड़ा ही सुलझा विश्लेषण..

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  2. बहुत सार्थक लेख ... माँ बाप को भी बच्चों की अपेक्षाएं समझनी चाहियें

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  3. "जेनरेशन गैप जैसी कोई चीज नहीं होती ,वह तो बस 'बच्चों की अपेक्षाओं 'और 'बच्चों से अपेक्षाओं' के अंतर का नाम ही है शायद ।" sahi kaha

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  4. इसे केवल विश्लेषण नहीं कहना चाहूंगी वरन इसे हर अभिभावक को आगाह के रूप में लेना चाहिए . बच्चों में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृति आज के भयावह सच को दिखला ही रहा है . अब वो समय आ गया है कि अपनी अपेक्षाओं का भार अपने कोमल बच्चों पर डालने के बजाय उन्हें फूल सा खिलाने में हम सहयोगी हो जाएँ .

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  5. बहुत ही अच्छा और सुलझा हुआ आलेख लिखा है आपने सार्थक एवं सारगर्भित प्रस्तुति

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  6. बढिया सार्थक पोस्‍ट।
    काफी कुछ सीखने मिला।
    आभार....

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  7. प्रत्येक बच्चा अच्छा होता है, प्यारा होता है और बहुत कुछ करने की क्षमता रखता है । आवश्यकता केवल उसकी खूबियों और रुझान को समझने की होती है ।

    सही कहा है आपने... जरुरी है उन्हें उनके मन का खुला आकाश देना जहाँ वो भर सकें अपनी पूरी उडान...

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  8. Sir,
    I am 100% agree with you. Really a motivational article. i am also mother of two years child. I also dream that my child must grab the world in his hand. But i felt your blog very inspirational for the parents who are working and are encroached in life's whirl. really heart thouch

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