रविवार, 15 जनवरी 2012

" चुनाव कुछ यूँ क्यों न हो ...?"

         
           लोकतंत्र में बस एक ही सिद्धांत प्रतिपादित और सिद्ध भी है कि, जिस नीति के समर्थक अधिक हैं ,वही उचित और सर्वमान्य होनी है | सारा खेल संख्या बल का है | संख्या बस व्यक्ति की होनी चाहिए ,वो व्यक्ति अथवा मतदाता अंगूठा छाप है या शिक्षित ,दोनों के मत का समान मूल्य है | अब अगर कुल मतदाताओं की संख्या में सही निर्णय न ले पाने वालों की संख्या अधिक है ,तो निश्चित तौर पर उनके  द्वारा लिया गया निर्णय गलत हो जाएगा और अंततः हानि समाज और देश की ही होती है | हमारे नेता लोग इस बात को अच्छी तरह से जानते है | इसीलिए वो ऐसे वर्ग को प्रभाव डालने के लिए अवश्य चुनते है ,बल्कि इसी फेर में रहते है कि जो वर्ग अशिक्षित है और समाज को दिशा नहीं दे सकता ,परन्तु चूंकि मत तो सभी का बराबर है ,ऐसे लोगो को छोटी छोटी और ओछी बातों से बहलाकर अपने पक्ष में मतदान हेतु तैयार कर लेते है |
         लोकतंत्र अच्छी व्यवस्था है ,बशर्ते मतदाता पढ़े लिखे हो ,उनमे ज्ञान हो ,जिसे वे चुनने जा रहे हैं ,वो भविष्य में उन्हें क्या दे सकता है | जाति धर्म क्षेत्र के आधार पर राजनीति कभी समाज के हित में नहीं हो सकती |अल्पकालिक तौर पर यह सब लुभाता तो हो ,पर कुछ ही काल बाद सच्चाई सामने आ जाती है |
         चुनाव के द्वारा हम अपने देश, समाज का सफल गवर्नेंस पांच वर्षों के लिए कराना चाहते है | पर अक्सर चूक हो जाती चयन करने में | एक प्रयोग ऐसा क्यूँ न करें कि जैसे अपने शहर ,जिले या बड़े स्तर पर देश की योजनाओं को क्रियान्वित करने के लिए निविदाएँ (टेंडर ) आमंत्रित करते है ,उसके लिए पहले, किये जाने वाले कार्य की गुणवत्ता और स्तर के सम्बन्ध में एक स्पेसिफिकेशन बना लेते है ,उसकी लागत और समय सीमा भी अनुमानतः पहले से तय कर ली जाती है | टेंडर प्राप्त होने पर सभी के सम्मुख उसे खोला जता है ,जिसकी लागत और मानक पहले से तय मानकों से मेल खाती है ,उसी को कार्य आबंटित किया जाता है | यदि वो टेंडरर गुणवत्ता  या समय के मानक में शिथिलता बरतता है तब उस पर आर्थिक दंड लगता और पुनरावृत्ति होने पर उसे काली सूची में डाल दिया जाता है | इसी फार्मेट पर पहले प्रत्येक क्षेत्र में समस्याओं के निराकरण हेतु और नई योजनाओं के  विकास के लिए ,ब्लाक ,तहसील ,जिले और प्रदेश के स्तर पर योजनाओं का एक ब्लू प्रिंट बनाया जाये ,जिसको बनाने में आम आदमी की भी भागीदारी हो और इस ब्लू प्रिंट के आधार पर प्रस्तावित विकास को कार्यरूप में परिणित करने के लिए राजनैतिक दलों से निविदाएँ आमंत्रित की जाए | जो सही मायने में उन दलों का मेनीफेस्टो हो | जिस दल द्वारा अभीष्ट योजनाओं को अधिक से अधिक क्रियान्वित करने का ,वो भी कम से कम समय और न्यूनतम लागत में ,लिखित अनुबंध किया जाय,उसी दल ,नेता को विधायक या सांसद या सभासद बनाया जाय | सम्पूर्ण प्रस्तावित कार्यों ,योजनाओं को पूरे पांच वर्षों में बाँट दिया जाय और पहले ही दिन से उलटी गिनती प्रारम्भ करते हुए कार्यों का अनुश्रवण किया जाये | यह कार्य दलों के स्तर पर हो | दल अपने अनुसार किसी को भी उस स्थान से नामित कर विधायक ,सांसद बना सकते हैं|
         सारा का सारा चुनाव दल-प्रधान होना चाहिए | दलों का महत्त्व नेता से ऊपर होना चाहिए | स्वतन्त्र रूप से वे ही नेता चुनाव लड़ते है जो अपने क्षेत्र में धनबली और बाहुबली होते है | बाद में अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के उद्देश्य से किसी भी दल में शामिल हो जाते है |
          वर्तमान व्यवस्था में एक प्रयोग यह भी हो सकता है कि चुनाव में उम्मीदवार की घोषणा न की जाये | सारा चुनाव बस दलों के आधार पर कराया जाय | जब दल जीत जाए तब ,दल स्वयं अपने किसी भी नेता को उस क्षेत्र का प्रतिनिधि चयनित कर लें| तभी ये चुनाव सिद्धांतों और विकास की शर्तों पर संपन्न कराया जा सकता है |

               "मतवाले" ये नेता हम "मत" वालों का कब तक शोषण करते रहेंगे  | तनिक सोंचे ज़रा....   

5 टिप्‍पणियां:

  1. आशाओं का स्पेशीफिकेन बनायेंगे तो कोई नेता नहीं बना पायेंगे।

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  2. विकल्प अच्छे है ... (वर्त्तमान व्यवस्था से)

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  3. अब इस शोषण के खिलाफ एकजुट होना ही चाहिये ..

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  4. सुझाव तो अच्छा है मगर राजनीति में संभव नहीं ...

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  5. आदर्श यथार्थ से परे होता है...मै तो चुनाव के इमरजेंसी रूप से घबराता हूँ...जब एटीएम पर लाखों रुपये सुरक्षित रह सकते है...तो वहां बैलेट बॉक्स क्यों नहीं रक्खा जा सकता...चुनाव क्या होते हैं पूरा देश हाई अलर्ट में आ जाता है...करोड़ों रुपये इसपे खर्च करना सरासर देश के साथ धोखा है...चुनाव आयोग को इस दिशा में भी सोचना चाहिए...सूचना प्रोद्योगिकी का भी पूरा लाभ लेना चाहिए...एक अदद यूज़र आई डी और पासवर्ड से कितने ट्रांजैक्शन हो रहे हैं तो वोट क्यों नहीं...वोट ऐसे पड़ना चाहिए की देश के अन्य काम सुचारू रूप से चलते रहे...और लोग अपना वोट बिना छुट्टी के डाल सकें....

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