शनिवार, 26 फ़रवरी 2011

"गुमसुम गुमसुम"

हाँ,सपने बुने थे मैंने,
तुम्हारे संग अपने |
उन  सपनों के ताने बाने थे ,
बस तुम्हारे इर्द गिर्द |
जिसमें थे ,
दो बोल प्यार के ,
और बहुतेरी ख़ुशी |
बिछौना था हमारी बाहों का ,
और बयार थी साँसों की |
प्राण तो हुए थे,
हर  बार अधर में |
जब भी मेरा नाम आया ,
तुम्हारे अधर पे |
इतना प्यार किया क्यों ,
गर जाना था मुझसे दूर |
छोड़ गए मुझे यूँ ,
बस गुमसुम गुमसुम |










23 टिप्‍पणियां:

  1. गहन अभिव्यक्ति ..... मन की विरह वेदना का सुंदर चित्रण

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  2. इतना प्यार किया क्यों ,
    गर जाना था मुझसे दूर |
    ab main kya karun , is waqt se kaise gujrun

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  3. विरह वेदना को दर्शाती खूबसूरत प्रस्तुति।

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  4. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (28-2-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  5. क्यूँ कोई दूर चला जाता है किसी को छोड़ गुमसुम गुमसुम ।
    बहुत अच्छी कविता ! धन्यवाद !

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  6. हाँ,सपने बुने थे मैंने,
    तुम्हारे संग अपने |
    उन सपनों के ताने बाने थे ,
    बस तुम्हारे इर्द गिर्द |.....

    बहुत सुन्दर एवं मर्मस्पर्शी रचना !
    शुभकामनायें एवं साधुवाद !

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  7. बहुत अच्छी लगी आपकी कविता . बधाई.

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  8. सुन्दर एवं मर्मस्पर्शी रचना
    बहुत अच्छी अभिव्यक्ति....

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  9. sir bahut hi sundar rachna...... 'pran to huye the.......' bali lines kuchh jyada hi pasand aai.

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