शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

"मदिरा और मनुष्य"

                     कहानी कुछ यूँ शुरू होती है कि, बहुत पहले किसी जंगल में देवता लोग चुपचाप मदिरा का निर्माण कर रहे थे | एक बहुत बड़े से आग  के चूल्हे पर काफी  बड़े बर्तन में मदिरा पकाई जा रही थी | उस बर्तन से काफी मात्रा में धुवाँ ऊपर उठ रहा था जो कि पूरे जंगल में दूर से ही दिखाई पड़ रहा था | सबसे पहले उस पर नज़र पड़ी एक तोते की, जो उसके ऊपर से उड़ कर जा रहा था | उसने बर्तन में झाँक कर देखा कि यह तो कोई बहुत अच्छी चीज़ पक रही है और वह उसे चखने की कोशिश में उसी बर्तन में गिर गया और मर गया | कुछ देर बाद वहां से मैना गुज़र रही थी,उसने भी चखने के लालच में उसी बर्तन में मदिरा में अपने प्राण न्योछावर कर दिए |
                        यह बात पूरे जंगल में फ़ैल गई कि, एक बहुत बड़े बर्तन में किसी ख़ास पेय की तैयारी हो रही है, और यह बात जंगल के राजा शेर को भी  पता चली | वह भी वहां पंहुच गया और बर्तन के चारों ओर घूम घूम कर खुशबू लेने लगा और अंत में वह भी लालच में बर्तन के अन्दर कूद गया और अपनी जान दे बैठा | इस क्रम को आगे बढ़ाते हुए अब बारी थी सुअर की | वह भी खाने पीने का और खुशबू लेने का शौक़ीन प्राणी है ,पर विवेक तो उसमे भी नहीं था ,और मदिरा की महक का लोभ संवरण वह भी नहीं कर पाया और बर्तन में छलांग लगा कर उसने भी अपनी इहिलीला समाप्त कर डाली |
                           मदिरा तो बननी थी सो वह बन कर तैयार हो चुकी थी पर देवताओं के लिए वह अशुद्ध हो चुकी थी |अतः देवताओं ने उस मदिरा को मानव जाति के लिए छोड़ दिया और तभी से मनुष्य मदिरा का सेवन करने लगा | मदिरा का पहला प्याला पीते ही मनुष्य तोते की तरह टायं टायं करने लगता है (वैसे चाहे वह कतई गूंगा हो ) ,दूसरा प्याला हलक के नीचे जाते ही वह मैना की तर्ज़ पर मै-ना, मै-ना करने लगता है और अपने बारे में बताने लगता है की मैंने यह किया ,मैंने वह किया ,मैंने कितनी बार बादल में छेद किया, मै ना होता तो जैसे आसमान टूट पड़ता | तीसरे प्याले के बाद तो उसे फिर शेर होना ही है ,कि कौन ठहर पायेगा मेरे सामने ,मै उसे गोली से उड़ा दूँगा,देखते है किसमे कितना है दम | भले ही वह डेढ़ हड्डी का आदमी हो ,पर उस समय उससे ताकतवर कोई नहीं हो सकता |अब अगर कही उसने चौथा प्याला मदिरा का पी लिया, फिर तो उसे सुअर समझिये ,उसको अपनी ही की हुई  गन्दगी में लोटने में मजा आयेगा ,अगर कोई उसकी मदद कर उसे वहां से हटाना भी चाहेगा तब भी नही हटेगा और अपने ही मल-मूत्र में पड़े पड़े आनंदित होता रहेगा |
                                अतः सिद्ध हुआ कि मदिरा पान के बाद मनुष्य द्वारा किये गए व्यवहार के लिए मदिरा ही दोषी है, इसमें मनुष्य का कोई दोष नहीं है | 

13 टिप्‍पणियां:

  1. मदिरा वास्तविकता ढक लेती है, मनुष्य का कोई दोष।

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  2. मदिरा का पहला प्याला पीते ही मनुष्य तोते की तरह टायं टायं करने लगता है ..

    और उसके बाद फिर कभी सही ढंग से न तो जी पाता है और न किसी को जीने देता है ....

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  3. बेहतरीन व्‍याख्‍या की आपने। सीधे सीधे कहें तो नशा नाश की जड।

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  4. बहुत सही फ़रमाया. आज बाजारीकरण से इस मदिरा की रूपरेखा बदल गयी है. देसी मदिरा, अंग्रेजी मदिर, स्कॉट मदिरा, रेड वाइन, इत्यादि और असर तोता से लेकर ------

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  5. आपका अंदाज मन को भा गया ....आपका शुक्रिया

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  6. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (7/2/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
    http://charchamanch.uchcharan.com

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  7. बहुत सार्थक आलेख...सही कहा है कि पीने के बाद आदमी आदमी रहता कहाँ है..

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  8. बहुत ही सुन्‍दर लिखा है आपने ।

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  9. मदिरा के दुष्प्रभावों का शानदार चित्रण.

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  10. मदिरा पीने का यह अंदाजे बयाँ काफी जुदा है .

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