रविवार, 17 अप्रैल 2011

"एक मुलाकात खुद से"

आज, 
बमुश्किल,
थोडा वक्त चुराया, 
मिलने को, 
खुद से |
बरसों बीत गए,  
याद नहीं कब से, 
मुलाकात नहीं हुई, 
खुद से |
बस जिए जा रहा हूँ, 
निभाने के लिए,   
ज़िन्दगी के दस्तूर |
पर एकदम खुद से, 
होकर अनजान,
और बेजान |
पर पता नहीं, 
क्यों आज अचानक, 
याद आ गई खुद की |
सो सोचा,
चलो मिल आते हैं, 
मुद्दत हुई पता नहीं, 
पहचान हो भी,
कि ना हो |
लापता सा हो गया,
पता भी,  
पर धुंधली यादों,
के सहारे, 
खोज ही निकाला, 
खुद को |
उफ़ इतनी धूल, 
दरवाज़े (मन ) पर, 
लगता है सदियों,
से जैसे कोई,
आया ही न हो |
साँसों से बुहारते,
और आंसुओं से धुलते, 
पलकों क़ी पालकी से,
पहुँच ही गया भीतर तक |
वो,
देखते ही बोला,
खुद की सुध,
अब  ली,
जब वो थक हार, 
कर चली गई |
तुमने से मिलने,
वो आती रही बार बार,
गौर से देखो 
धूल पे समय की |
निशान,
जो भी हैं, 
वो उसी क़ी,
मिन्नतों  के है,
और मन्नतों के भी |
जिसकी दुआओं से, 
से  तुम, 
महफूज़ हो आज, 
शायद |
पर अफ़सोस, 
मै,
उससे ना मिल सका, 
जो मेरा मुकद्दर थी, 
मेरे मन में थी,
और, 
मेरे सी ही थी | 


                "हाँ,मैं अपनी ’प्रकॄति’ और ’प्रवॄत्ति’ को ही भूल गया था ,उनसे मिले सदियां गुज़र गई थीं।जीवन की आपाधापी में याद ही ना रही । पर अब मिलना चाह रहा हूं ,मगर अफ़सोस वह तो चली गई, मुझसे रूठ कर । मेरा "मैं" ही चला गया मुझे भूल कर" ।
   

14 टिप्‍पणियां:

  1. हर किसी को मुक्कमल जहाँ नहीं मिलता.. सहज भाषाशैली में प्यारी कविता

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  2. खुद से खुद को मिलाने का अच्छा प्रयास ..सुन्दर भाव से सजी रचना

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  3. निभाने के लिए,
    ज़िन्दगी के दस्तूर |
    पर एकदम खुद से,
    होकर अनजान,
    और बेजान |

    सही कहा है आपने इंसान इस मायावी संसार में इतना रम जाता है कि अपनी वास्तविकता का अहसास भी नहीं कर पाता ...खुद से मिलना बहुत महत्वपूर्ण है ...आपने बहुत सही तरीके से प्रकाश डाला है ...आपका आभार

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  4. जब अपने से मिलने पहुँचा तो,
    नहीं कोई भी पथ सूझा।

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  5. निभाने के लिए,
    ज़िन्दगी के दस्तूर |
    पर एकदम खुद से,
    होकर अनजान,
    और बेजान

    Bilkul sahi....yahi hota jeevan ki aapadhapi me...

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  6. यही मानव मन की विडंबना है पता नही कहाँ कहाँ भटकता रहता है और् जो अपना है उससे ही नज़र चुराता है…………बेहतरीन भावाव्यक्ति।

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  7. उफ़ इतनी धूल,
    दरवाज़े (मन ) पर,
    लगता है सदियों,
    से जैसे कोई,
    आया ही न हो |... tarif me yahi kahungi ki ise vatvriksh ke liye bhej dijiye rasprabha@gmail.com per tasweer parichay aur blog link ke saath...excellent bhaw

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  8. ..खुद से मिलना बहुत महत्वपूर्ण है
    वाह अमित जी,
    इस कविता का तो जवाब नहीं !

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  9. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 19 - 04 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  10. Main WO jalim siye waqt hun,
    apna dil bhi jalaya to roshni na mili

    sundar prastuti!

    badhai

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  11. आज,
    बमुश्किल,
    थोडा वक्त चुराया,
    मिलने को,
    खुद से |
    अपने लिए समय की खोज .बहुत सुन्दर अहसास , क्या बात है बहुत खूब

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  12. आयेगी मिलने वो! यहीं कहीं बैठे देख रही होगी सामने आने और मिलने का मन बनाते हुये।

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  13. सुन्दर अहसास ..बेहतरीन भावाव्यक्ति..

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