बचपन हमारा रेलवे कॉलोनी में गुजरा । हम तीन भाई ,बहन कोई नहीं । रक्षा बंधन बहुत दिनों तक तो समझ नहीं आया । मेरे बड़े भाई कुछ ज्यादा मिस करते थे ऐसे अवसरों पर । एक बार बचपन में रक्षाबंधन के अवसर पर काफी खुश हो कर घर के बाहर घूम रहे थे ,किसी पड़ोस के बच्चे ने कह दिया ,तुम्हारे तो बहन ही नहीं है ,तुम क्यों खुश हो रहे हो ! तुमको रक्षाबंधन से क्या मतलब ! मेरे बड़े भाई रोने लगे । हमारे घर के बगल एक सिंह साहब के परिवार के लोग रहते थे । जिन्हें हम चाचा जी और चाची जी कहते थे । भाई का रोना सुनकर चाची जी हमारे घर आ गईं और बोली ,रो मत ,तुम्हे पूनम राखी बांधेगी । पूनम उनकी छोटी बिटिया का नाम था । उस दिन के बाद से बरसों तक पूनम ने हम तीनो भाइयों के लगातार राखी बाँधी । बहुत दिनों तक वह अपनी शादी के बाद भी आती रही । परन्तु धीरे धीरे उसकी अपने ससुराल में व्यस्तता बढती गई और हम लोग भी बाहर चले गए ।
उस समय हमारे घर कथा पूजा करने आने वाले पंडित जी की बहन भी ,जिन्हें हम बुआ कहते थे , हर रक्षा बंधन पर हम सबको राखी बाँधने आया करती थीं । वह एक बड़ी सी पोटली लाती थीं । उसमे बहुत सी रंग बिरंगी राखियाँ होती थी । हम लोग अपनी मनपसंद राखी ले लेते थे । कुछ दिनों बाद पंडित जी और फिर बुआ जी का भी निधन हो गया। उनसे इतना अपनापन था कि बहुत दिनों बाद हम लोग जान पाए कि उनका हम लोगों से रिश्ता यजमानी वाला था ।
उस समय राखियाँ स्पंज वाली और बहुत बड़े बड़े फूल वाली होती थीं । उन पर सुनहरे रंग के प्लास्टिक के विभिन्न डिजायन वाले आकृतियाँ लगी होती थीं और राखी के अगले दिन हम लोग उसे हाथ में बांधे बांधे स्कूल जाया करते थे । कुछ बच्चों के हाथों में कलाई से लेकर ऊपर बांह तक राखियाँ बंधी होती थीं । मै सोचता था कितनी बहने हैं इसके और मेरी एक भी नहीं । बाद में पता चला ,वो बच्चे खुद ही इतनी सारी राखियाँ अपने हाथों में बाँध लेते थे । उस समय राखियों की गिनती से समृद्धता का एहसास होता था ।
रक्षाबंधन के बाद एक व्रत होता है ' हलषष्ठी ' का । उसमें हमारी मम्मी एक मिटटी का गड्ढा बना कर उसमे पानी भर कर पूजा करती थीं ।उस पानी से हम लोगों का मुंह धो कर काजल लगाया जाता था और उस दिन व्रत में वह कुछ भी बोया जोता हुआ अनाज नहीं खाती थी । केवल तिन्नी का चावल और दही खाती थीं । अभी भी मम्मी यह व्रत करती हैं और अब तो उनकी बहुएं भी करती हैं । उस मिटटी के घेरे के कगार पर हम लोग राखी का ऊपर वाला डिजायन निकाल कर उसे सजाते थे । राखी के स्पंज को निकाल कर उसमें पानी इकट्ठा करने की असफल कोशिश करते थे ।
उस समय स्याही वाली पेन का प्रयोग होता था । कभी कभी गिरी हुई इंक को भी स्पंज से सुखा लिया करते थे । उस समय स्पंज हम लोगों के लिए एक बड़ा कौतूहल हुआ करता था ।
मेरे मामा अक्सर रक्षाबंधन पर मेरी मम्मी से राखी बंधवाने आया करते थे या हम लोग भी उनके पास जाया करते थे । बहुत विधिवत संपन्न होता था ऐसे मौके पर राखी बाँधने का आयोजन ।
"अब तो राखियाँ भी बहुत माडर्न हो चली और कलाईयाँ भी , लेकिन मायने तो इसके अभी भी वही भाई बहन के उत्कृष्ट प्यार वाले ही हैं "।



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