शनिवार, 3 अगस्त 2024

अजोध्या जी।


मेरा जन्म अवश्य लखनऊ में हुआ पर जन्म के पश्चात से सारा जीवन फैज़ाबाद में ही बीता। पापा वहीं पोस्टेड हुए और फिर वहीं बस गए। 

फैज़ाबाद एक साफ सुथरा शांत और अप्रगतिशील शहर हुआ करता था। कारण 123 किमी की दूरी पर लखनऊ स्थित होने से वहां विकास न हो सका। 

लगभग सभी प्रकार की जरूरतें और मनोरंजन लखनऊ आकर लोग पूरा कर लेते थे। ट्रेन और बस से वेल कनेक्टेड था बहुत पहले से। एक ट्रेन सियालदह एक्सप्रेस बहुत ही सुविधजनक थी। सुबह 6 बजे बैठो  और बस 9 बजे लखनऊ। शाम को लखनऊ से 630 बजे बैठो और  930 बजे फैज़ाबाद।

लोग सिनेमा देखने लखनऊ जाया करते थे। हम भी 'ब्लू लैगून' देखने आए थे एक बार।😊 अंग्रेजी फ़िल्म फैज़ाबाद में नही लगती थीं।

चूंकि पापा रेलवे में थे तो ट्रेन तो घर की बात थी। फर्स्ट क्लास में बैठ जाते थे और सारे टीटी चाचा जी हुआ करते थे।(अब तो यह फर्स्ट क्लास होता ही नही,खतम कर दिया गया। ) तिफाक से हम और हमारे बड़े भाई थोड़ा पढ़ने लिखने में अच्छे थे तो रेल महकमे में लोग इसी बात से जानते थे। खैर।

 तब तमाम रिश्तेदार अक्सर घर मे आया करते थे। उस समय आजकल की तरह कोई किसी के आने पर तुरन्त उसके वापस जाने का प्लान नही पूछता था। अब कोई आया है तो कम से कम एक हफ्ता तो रुकना लाजिमी था।

खासकर बुआ फूफा आते थे या नाना जी आते थे, मौसी मौसा, मामा मामी ,बड़े पापा  यही लोग आते थे। इन लोगो के आने पर अयोध्या घूमने का प्लान जरूर बनता था। 

अब इन लोगों को अयोध्या लेकर जाने की जिम्मेदारी मेरी होती थी। इतनी बार अयोध्या गया हूँ कि वहां की गली गली से वाकिफ था। इतना तो वहां के पंडा भी नही घूमते थे उस समय वहां।

मेरा एक दोस्त अखिलेश भी वही से था। उसके घर भी जाना होता था। कैंची सायकिल चलाते हुए अयोध्या तक हो आते थे।😊

मेरे नाना जी कभी अयोध्या को अयोध्या नही कहते थे, हमेशा अजोध्या जी कहते थे और जब भी घर आते थे उनका वहां जाना निश्चित था। वहां से वो दोने में बेसन के लड्डू का प्रसाद लाते थे। उसी दोने में कोने पर गाढ़े लाल रंग का टीका लगा होता था,उसे हम लोग अपने माथे पर लगा लिया करते थे। नाना जी सुल्तानपुर से आते थे , सुल्तानपुर को वो सुल्तापुर बोलते थे।

अयोध्या में जहां विवाद था वहां हमेशा कीर्तन होता रहता था। कनक भवन , जन्मभूमि ,सीता रसोई, राम की पैड़ी , मानस मंदिर, तुलसी उद्यान सब जगहों पर सैकड़ों बार तो गया ही हूं। 

1993 में जब ट्रांसफर होकर उत्तरकाशी गया तो लोग यह जानकर कि मैं फैज़ाबाद से हूँ यानी अयोध्या वाला फैज़ाबाद तो लोग पैर छूने लगते थे मेरा। ताजी ताजी 1992 की घटना का असर था वह।

जितनी आस्था बाहर देखने को मिली अयोध्या के प्रति ,स्थानीय लोग उतना महत्व नही देते दिखते थे।

फिर समय ने करवट बदला और आज स्थिति सामने है।

आस्था का सम्मान हो रहा है। बहुत अच्छा है। फैज़ाबाद अयोध्या का स्थानीय स्तर पर विकास भी हो जाएगा अब ऐसी आशा दिख तो रही है।


।। जय श्री राम।।

शुक्रवार, 2 अगस्त 2024

मेडिटेशन

 साइकिलिंग/स्विमिंग/मेडिटेशन

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साइकिलिंग करते समय मस्तिष्क बैलेंस बनाता है। जब गति मिल जाती है और बैलेंस बन चुका होता है, तब सायकिल अपने आप चलती रहती है और फिर मस्तिष्क खाली हो जाता है। उस क्षण फिर मस्तिष्क में दुनिया भर की बातें उपजती रहती है और मन मस्तिष्क शून्य नही रहता है। साईकल चलती रहती है और मस्तिष्क भी इधर उधर विचारों में चलता रहता है।

स्विमिंग करते समय मस्तिष्क का सारा ध्यान सांस लेने और छोड़ने में लगा रहता है। चूंकि इसमे जरा सा चूक होने पर जान का जोखिम है तो मस्तिष्क में और कोई विचार आता ही नही है और स्थिति एकदम विचार शून्य सी होती है।

मेडिटेशन करते समय प्रयास ही यही रहता है कि मस्तिष्क विचार शून्य हो जाये और इसी बात का विचार आता रहता कि कैसे भी कोई विचार न आये। चूंकि यह अवस्था सबसे सहज होती है तो इस स्थिति में विचार शून्य होना सबसे कठिन भी है।

निष्कर्ष : जिस कार्य मे जोखिम की मात्रा जितनी अधिक होगी उस कार्य मे मस्तिष्क सबसे अधिक विचार शून्य होगा क्योंकि उसमे फिर और कुछ नही सूझता है।

तुलना करें तो स्विमिंग करना इस दृष्टिकोण से साइकिलिंग से बेहतर है। 

अब अगर साइकिलिंग करने में थोड़ा जोखिम जोड़ लिया जाय तो बात बन सकती है। यदि साइकिलिंग करते समय दोनो हाथ छोड़ कर साइकिलिंग की जाये तो फिर जोखिम बढ़ जाने के कारण मस्तिष्क में और कोई विचार नही आता है और मेंडिटेशन की गति प्राप्त होती है।

"किसी भी कार्य को करते समय यदि आप उसमे जोखिम की मात्रा बढ़ाते जाए तो उस कार्य को करते समय मेडिटेशन की स्थिति स्वयं बनती जाती है। फिर अलग से कोई मेडिटेशन करने की आवश्यकता नही होती है।"

दुनिया मेरे ठेंगे पे

 मम्मी का फोन आया आज। जन्मदिन wish करने के लिए तो एक पूरी कहानी सुना दी हमारे जनम की।

उस रात बहुत पानी बरस रहा था। नरही , लखनऊ में पापा मम्मी रहते थे। हजरतगंज पूरा डूब सा गया था। रिक्शे का पूरा पहिया पानी मे डूब कर चल रहा था। 31 जुलाई को शाम 6 बजे रिक्शे से नरही से चौपड़ अस्पताल, जो कॉफ़ी हाउस की बिल्डिंग के बगल में थोड़ा भीतर जा कर है, मम्मी पहुंची। वहां अगले दिन पहली अगस्त को सुबह हम 10.15 को सामान्य प्रसव से पैदा हुए। 

हम एकदम कोयले की तरह काले थे और मम्मी एकदम सफेद हैं। मम्मी ने हमको गोद मे लेने से ही मना किया और नर्स से कंफर्म किया यही हुआ है हमे।

नर्स ने हामी भरी तो गोद मे पहुंच गए उनकी। मम्मी ने ही बताया आज कि थोड़ी देर बाद में हमारी बुआ वहीं आई तो नर्स ने हमे बुआ की गोद मे दे दिया, वहां पहुंचते ही हमने बुआ के दोनो गाल पकड़ लिए। बुआ बोली, ई बहुत मुरहा होए बाद मा। 

पता नही ,यह सही निकला की गलत। (मुरहा माने फ्लर्ट)

मम्मी की जिठानी को भी हमसे एक हफ्ते पहले बेटा हुआ था यानी हमारे कजिन। वो एकदम सफेद गोरे। जबकि ताई जी सांवली थी।

अब जब भी मम्मी और ताई जी अपना अपना ललना गोद में लेकर कभी बैठती तो रिश्तेदार अक्सर पूछते , तुम लोग एक दूसरे का बच्चा काहे लिए बैठी हो ,अपना अपना लो।

"उस समय हमको समझ होती तो फौरन रंग भेद का प्रकरण बना कर status लगाते फेसबुक पर।"

कारण रंगभेद का यह था कि मेरे पापा सांवले हैं और ताऊ जी गोरे थे।

बचपन मे काफी दिनों तक हमे कल्लू कहा गया, प्यार से ही सही। अच्छा हमे तब समझ ही नही थी कि काला गोरा क्या होता है। 

"हम तब भी अपने को हीरो समझते थे और आज भी समझते हैं।"

दुनिया मेरे ठेंगे पे।

गुरुवार, 11 जुलाई 2024

अनुलोम विलोम

 इलाहाबाद में निरंजन चौराहे पर एक ट्रैफिक कांस्टेबल हुआ करता था। उसकी खासियत यह थी कि वो चौराहे पर एक साथ सारी तरफ के ट्रैफिक को रोक देता था फिर थोड़ी देर बाद एक साथ सबको छोड़ देता था। 


फिर हैरान परेशान हो कर सबको संभालता था। यह हमने स्वयं कई बार नोटिस किया था।


अनुलोम विलोम करते समय हमसे भी यही होता है। दोनो ही नाक से एक साथ सांस भीतर जाती है और दोनो से ही एक साथ बाहर आती है। क्रम वार नही हो पाता।


सड़कें भी अगर अनुलोम विलोम करती हैं तो ट्रैफिक का स्वास्थ्य अच्छा रहता है और फिर ट्रैफिक को किसी बायपास की जरूरत नही होती।


😊

बुधवार, 10 जुलाई 2024

चोर

 चोर पर निबंध

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▪️चोर देश की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ है।


▪️चोरों के लिए तिजोरियाँ, अलमारियाँ और ताले लगाने होते हैं। जिससे इन्हें बनाने वाली कंपनियों को काम मिलता है।


▪️ चोरों की वजह से घरों की खिड़कियों पर ग्रिल लगी होती हैं, दरवाजे लगे होते हैं, दरवाजे बंद होते हैं, इतना ही नहीं बल्कि बाहर सुरक्षा के लिए अतिरिक्त दरवाजे भी होते हैं। कितने लोगों को काम मिलता है।


▪️ चोरों के कारण मकानों, दुकानों और सोसायटी के चारों ओर एक परिसर बनाया जाता है, गेट होता है, गेट पर चौकीदार 24 घंटे रहता है और चौकीदार के लिए एक वर्दी भी होती है। कितने लोगों को काम मिलता है।


▪️ चोरों की वजह से न सिर्फ सीसी टीवी, मेटल डिटेक्टर बल्कि साइबर सेल भी होते हैं।


▪️ चोरों के कारण पुलिस है, पुलिस चौकी है, पुलिस थाने हैं, गश्ती गाड़ियाँ हैं, डंडे हैं, राइफलें हैं, रिवाल्वर हैं और गोलियाँ भी हैं। कितने लोगों को काम मिलता है।


▪️ चोरों के कारण ही अदालतें हैं, अदालतों में जज, वकील, क्लर्क और जमानतदार हैं। कितने लोगों को काम मिलता है।


▪️ चोरों के कारण जेलें हैं, जेलर हैं, जेलों के लिए पुलिस भी है। कितने लोगों को काम मिलता है।


▪️ मोबाइल, लैपटॉप, कोई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, साइकिल, वाहन जैसी कई उपयोग में आने वाली चीजें चोरी हो जाती हैं तो लोग नई खरीद लेते हैं, इस खरीद फरोख्त से देश की आर्थिक स्थिति को मजबूती मिलती है और कितने लोगों को काम मिलता है।


▪️ उच्च मान्यता प्राप्त और‌ नाम वाला यदि कोई चोर होता है तो देश विदेश की मीडिया की भी रोजी रोटी चलती है।


▪️ चोर ही सारे सरकारी सिस्टम की रीढ़ हैं और समाज के लोगों की रोजी रोटी का साधन भी है.

गुरुवार, 15 फ़रवरी 2024

चार्जिंग पॉइंट

 मोबाइल चार्ज करना हो तो बस एक प्लग पॉइंट चाहिए होता है। वह चाहे जहां लगा हो, रेलवे प्लेटफॉर्म हो, बस अड्डा हो, फुटपाथ पर कोई बूथ हो, किसी आफिस के पैसेज में हो, टॉयलेट में हो, ट्रेन में हो, प्लेन में हो, किसी साफ जगह में हो या किसी कचरे के डब्बे के पास हो, फौरन ही लोग अपना चार्जर वहां लगाकर मोबाइल चार्ज कर लेते हैं।

मंदिर छोटा हो या बड़ा हो, पार्क में हो, पहाड़ी पर हो, पेड़ के नीचे बस एक मूर्ति हो, भव्य मंदिर हो, जरा सा मंदिर हो , गली मोहल्ले में हो, रेलवे लाइन के किनारे हो, श्मशान में हो, अस्पताल में हो, स्कूल में हो, यह सब मंदिर बस चार्जिंग पॉइंट ही होते हैं।

इन सभी मंदिरों में वोल्टेज और करंट बराबर होता है और मनुष्य को चार्ज करने की क्षमता सब मे एक जैसी होती है।

Samsung हो, apple हो, one plus हो सब चार्ज हो जाते हैं कहीं भी किसी भी पॉइंट से।

बस इत्ती सी बात है। 

यह सभी धर्मों के पूजा स्थल की बात है।

जय श्री राम।