रविवार, 14 जून 2015

" सिफ़र से शिखर तक ......."

यह किताब एक आत्मकथा है ऐसे शख्स की जो हर उस ऊंचाइयों  में लिपटा हुआ है जिसकी चाहत भी शायद बिरले ही कर पाते होंगे । उत्तरप्रदेश पावर कॉर्पोरेशन में सहायक अभियंता के पद से प्रबंध निदेशक तक के पद की उनकी यात्रा तमाम संघर्ष , जिम्मेदारियों और चुनौतियों से भरी हैं ।



इसी किताब से -"पिता से भगवान राम की कहानियां सुनते ,भैस चराते और पेड़ों से आम तोड़ते मैंने कोचवा के स्कूल से पांचवी कक्षा तक की पढाई पूरी की । "


इसी किताब से --पिता के साथ गांव के गलियारे से गुजरते हुए मैंने एक छोटी सी बच्ची को देखा जिसका शरीर कुपोषित था,बदन पर कोई कपडा नहीं था , बाल उलझे हुए थे और उसकी नाक बह रही थी । मैं उसके लिए और कुछ नहीं तो इतना तो कर ही सकता था कि बिना घिनाये उसकी बहती हुई नाक अपनी अँगुलियों में लेकर उससे दूर फेंक दूँ । मैंने ऐसा ही क्या । पिता मुझे ऐसा करते बड़े गौर से देख रहे थे । मेरी अँगुलियों में लसटा  गन्दा-गन्दा पोटा देख कर पिता ने कहा -'अच्छा बहुत गांधी न बनो ।'


इस किताब को एक बार पढ़ना शुरू करने के बाद आप बिना पूरा पढ़े इसे छोड़ना नहीं चाहेंगे । 


इस किताब का लोकार्पण माननीय मुख्यमंत्री जी श्री अखिलेश यादव जी द्वारा आदरणीय मशहूर शायर मुनव्वर राणा साहब की उपस्थिति में किया गया था । 

" अपनी बेपनाह मसरूफ़ियतों के बावजूद ताजादम रहना, पराये ग़मों की चादर ओढ़े हुए मुस्कुराते रहना दुश्वार है लेकिन 'सिफर से शिखर तक' के शिल्पकार का यही तो हुनर है कि वह जंगली फूलों से शहर को आबाद करना जानता है । अँधेरे से जंग करते हुए उसे कई दहाइयां गुजर गईं हैं लेकिन आज तक न तो उसके हाथों में कंपकपाहट है और न चेहरे पर थकान । यूं तो कुछ लोग किताब लिखते हैं और कुछ खुद किताब होते हैं । उनके जीवन का हर एक दिन एक वरक होता है और हर बरस एक दास्तान । " ---मुनव्वर राणा 


(लोकभारती प्रकाशन से नयी दिल्ली पटना इलाहबाद कोलकाता से प्रकाशित , मूल्य -रु २०० )

शनिवार, 30 मई 2015

" चाँदी का वर्क ....."


आहिस्ता से भीतर आई ,
एक मंद बहार सी तुम ,
ख्यालों में कुछ और था ,
बेख्याली में दखल तुम ,
लफ्ज़ होंठों पे सजे यूँ ,
सरगम सजी हो जैसे सितार पे ,
पलकें उठाईं थीं ऊपर तुमने ,
अवाक मैं निर्वात आलम ,
आफताब सी दमक ,
और माहताब सा चेहरा ,
काजल की लकीर ,
ज्यों शाख हो नजमों की ,
तितली सी पलकें ,
और चाँद सी तबस्सुम ,
गोया वर्क हो ,
चांदी की जैसे ,
खुदा के नूर पे ।

मंगलवार, 19 मई 2015

" रोज़ रात टूटता हूँ "


सवेरे चिपका कर 
नकली हंसी का मुखौटा 
बैठ जाता हूँ 
ज़िन्दगी की हाट में 
महसूस करता हूँ 
लोगों की मुस्कराहट का स्पर्श । 

दिन ढले तक 
आंका जाता हूँ 
मेरी हंसी के मुताबिक 
हर किसी के तय किये दामों में 
आसान नहीं होता 
यूं सुबह शाम 
बेदिल लिबास बदलना 
पर बदलता हूँ 
बदलाव नियति है न । 

रोज़ रात 
समेटता हूँ तन्हा 
फिर वही बिखरी ज़िन्दगी 
जोड़ता हूँ टूटन 
किसी की ख़ुशी की खातिर 
गिरता हूँ फिर
बन कर 'एक टूटता तारा ' ॥ 
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मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

" हैशटैग....."


हैशटैग सा ,
हो गई थी तुम ,
प्रसंग होता मैं ,
सन्दर्भ रहती तुम  ।

सूखे पत्ते हों या,
हो कटी पतंग ,
उन्हें कोई अब
हैशटैग नहीं करता ।

बालकनी पे खुलते ,
खिड़की के वो पल्ले  ,
जैसे हो एक जोड़ी ,
निगाहें तुम्हारी ।

स्मृतियाँ नहीं ,
बनती मञ्जूषा ,
जानता अगर ,
तो क्यों सहेजता ।

बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

" पुस्तक मेला और हम ......."



बीती रात मैं पुस्तक मेले में गया था | एकदम सन्नाटा पसरा था वहां | सभी स्टाल बंद और ढके मुंदे थे ,कुछ हार्डबोर्ड से और कुछ तिरपाल से | यूं ही एक स्टाल के बगर से गुजर रहा था (जिसके बाहर लिखा था "हिन्दी की बेस्ट सेलर्स ) तो लगा जैसे भीतर कोई बाते कर रहा हों | ठहर कर आदतन उनकी बातें सुनने का प्रयास करने लगा | 

एक मीठी सी पर उदास आवाज़ में कोई अपनी व्यथा सुना रहा था ,उसने पल्लू से अपने कई बार साफ किया चेहरा मेरा ,थोड़ा देखा फिर सीने से लगाया पर अपने संग ले नहीं गई | तब तक शोख आवाज़ में कोई और बोल पड़ा ,तुम्हे तो सबसे आगे जगह मिली है ,सज धज कर रंगीन आवरण में टिकी रहती हो ,बस इसीलिये हर कोई हाथों हाथ लिये रहता है | वहीं भारी आवाज़ में कोई बोला कि मेरा वज़न इतना ज्यादा कर दिया है कि नाजुक कलाइयों वाले मुझे छूते ही नहीं कि कहीं मुचक न जाये कलाई उनकी | लो कर लो बात ,बोल उठी एक पतली सी एकदम महीन आवाज़ ,मुझे तो इतना छरहरा बना रखा है कि लोग विग्यापन समझ बिना पूछे संग ले जाने लगते हैं | एक सयानी सी आवाज़ उन सब को समझा रही थी ,बहुत दुनिया देखी है हमने , अगर बाजार में चलना है तो थोड़ा बन ठन के तो रहना पड़ेगा और भीतर थोड़ा अत्याचार / व्यभिचार , लाचार हरकतें भी जरूरी हैं तभी गाड़ी चल पाती है | आगे वृद्ध आवाज़ में सुनाई पड़ा कि जैसे जिंदा जिस्म ही हरकत कर सकता है वैसे ही अगर हमारे अंदर जिस्मानी नुमाइश न हो तो फिर खुद को मुर्दा ही समझो | जो भी यहाँ से धडा धड़ निकल रही है और लोग हाथों हाथ ले रहे हैं उनमे प्रेम कम तिरस्कार अधिक और सम्बंध कम विच्छेद अधिक है | 

सुनते सुनते जब मैं और करीब जाने लगा उनके ,सहसा कोई बोल पड़ा ,कोई है कोई है ,इस पर सारी आवाज़ें बंद हो गई ,वैसे ही जैसे घूंघट के भीतर से ही अगर सास के आने की आहट मिल जाये तो बहुएं उसकी बुराई करना बंद कर देती हैं | 

दरअसल यह सब किताबें ही थी तो रात में जीवंत हो उठी थी और आपस में बतिया रही थी | पता नहीं क्यों मुझे सारी किताबें परस्पर ईर्ष्यालु सी लगीं | 

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2014

" हर मुड़ा तुड़ा कागज कचरा नहीं होता ......"


हर मुड़ा तुड़ा कागज कचरा नहीं होता ,
आंसुओं संग बह जाये वह कजरा नहीं होता ,

मुड़े तुडे कागज़ अक्सर होते हैं खत मोहब्बत के ,
 लफ्ज़ जिसके हरेक जुगनू होते हैं 'उन' नज़रों के ,

ऐसा ही टुकड़ा एक दबा रह जाता है अक्सर नीचे तकिये के ,
और कर देता है उस ओर मुझे 'उनकी' यादों के हाशिये के ।

हाशिये पर ही ठहर गई फिर एक बार कलम उनकी  ,
दिल कह रहा है आंसुओं से बन जाओ अब स्याही उनकी ।

हाँ ,यह सच है आँखें आँसू बहाना चाहती हैं ,
यह भी सच है , कोई तो 'बहाना' चाहती हैं । 

बुधवार, 1 अक्टूबर 2014

" सफाई तो हो गई .......देखते देखते "


आनन फानन में बड़े साहब ने मीटिंग बुलाई | विचार हुआ कि २ अक्टूबर के मौके पर कार्यालय प्रांगण की सफाई की जानी है | कुल कर्मचारी /अधिकारी मिला कर गिनती हुई १२१ , अरे यह तो बहुत शुभ अंक है ,अवश्य कुछ अच्छा होने को है ,बड़े साहब बोले | 

सफाई के लिये सब लोग अपने अपने घरों से झाड़ू लेते आयेंगे , एक कर्मचारी ने राय दी | उस कर्मचारी को घूरते हुये बड़े साहब बोले ," नहीं घर का सामान ,दफ्तर मे नहीं लाया जायेगा , यह उचित नहीं |" अपने सबसे खास 'टेंडर बाबू' को बुलाकर कहा ,"शीघ्र एक अल्प कालिक निविदा आमंत्रित करो और उसके माध्यम से १५० अदद झाड़ू और १५० जोड़े दस्ताने क्रय करने क़ी व्यवस्था करो |"

अब सबसे पहला काम झाड़ू की डिज़ाइन का मानक तय करना था | झाड़ू के डंडे की लंबाई , मोटाई और उस पर उच्च कोटि के केसरिया रंग के पेन्ट का कोड तय कर दिया गया | झाड़ू की सींको का 'फ्रंट प्रोफ़ाइल' कुछ इस प्रकार ' डिज़ाइन' किया गया कि झाड़ू लगाते समय झाड़ू और जमीन के मध्य २० अंश का कोण बन सके ,क्योंकि रिसर्च से पता चला है कि इसी अंश के कोण पर झाड़ू से न्यूनतम श्रम के सापेक्ष अधिकतम आउटपुट मिलता है | झाड़ू के सींको के विषय में आम राय यह बनी कि ,सींको के स्थान पर 'ओप्टिकल फाइबर' का प्रयोग किया जाय और झाड़ू के डंडे के उपरी सिरे पर भीतर एक बैटरी चालित बल्ब लगा हो | खोखले डंडे के भीतर से रोशनी प्रवेश करते हुये 'ओप्टिकल फाइबर' वाली सींको से रोशनी उस स्थान पर पड़ेगी जहां सफाई किया जाना होगा | इतनी हाईटेक झाड़ू से कोई भी कूड़ा करकट बचा रहा जाय ,असंभव है | रात को भी अगर सामूहिक सफाई की जायेगी ,इतनी उच्च तकनीक की झाड़ू से, तो मंगल से धरती पर देखने पर असंख्य तारे से बिछे दिखेंगे ज़मीन पर | प्रत्येक झाड़ू पर एक संदेश भी लिखा होगा कि " झाड़ू चलायें ,स्वास्थ्य बनायें |"

अगला मानक दस्तानों का तय किया जाना था | दस्ताने बहुत ही मुलायम और हल्के डिज़ाइन किये गये ,जिससे उन्हे पहनने के बाद भी कलाइयों की लचक बनी रहे क्योंकि झाड़ू लगाते समय कलाई और कमर में लोच / लचक बहुत आवश्यक है |(इस बात पर भी बहुतों ने हामी भरी |) 
 
दोनो महत्वपूर्ण वस्तुओं की कीमत मिलाकर टेंडर की राशि तय हो रही है | बड़े साहब मंद मंद मुस्कुरा रहे हैं | सफाई तो अब लगभग तय है , भले ही वह सरकारी खजाने की हो |