गुरुवार, 10 अक्टूबर 2013

" चर्चा रोटी की ........"

                                                                                   ( यह रोटियाँ अर्चना चाव जी की हैं )

इधर कुछ दिनों पहले निवेदिता की तबियत ठीक न थी ,तब मैंने (केवल) एक दिन रोटी बनाने का सफल प्रयास किया । उसी दौरान ,लोई पर लगाए जाने वाले सूखे आटे को 'परेथन' क्यों कहते हैं , यह प्रश्न उत्पन्न हुआ । फेसबुक पर चर्चा के दौरान ज्ञात हुआ ,परेथन का सही शब्द 'परिस्तरण' हैं ।

बात आगे चल निकली ,अर्चना चाव जी ने रोटी को उचित तरीके से फुलाने के विषय में प्रश्न किया । बहुत सारे गणितीय उत्तर प्राप्त हुए ,पर कोई उत्तर उचित नहीं ठहराया गया । रोटी के आकार ,प्रकार ,गोलाई ,मोटाई के बारे में भी चर्चा हुई परन्तु कोई संतोषजनक निष्कर्ष न निकला ।

थोड़ा अनुसंधान फिर मैंने भी किया । रोटी का आकार आटे की लोई पर निर्भर करता है और लोई का आकार बनाने वाले की हथेली पर निर्भर करता है। लोई बस इतनी बड़ी हो कि हथेली के गड्ढे नुमा आकार में बैठ जाए । फिर उसे दोनों हथेलियों के बीच धीरे धीरे गोल गोल घुमाते हुए लोई को 'उड़नतश्तरी' के आकार का बना लें । अब उसके दोनों ओर सूखा आट़ा लगाए । चकले पर उस लोई को धर कर उँगलियों से हौले से दबाएँ । अब बारी आती है बेलन की , बेलन लंबा और पतला होना चाहिए । अगर बेलन की लम्बाई रोटी के व्यास से कम है तब रोटी बेलते समय कहीं मोटी और कहीं पतली हो जायेगी । चकला भी छोटा होने पर रोटी की शक्ल बिगाड़ सकता है । चकला इतना बड़ा हो कि रोटी बेल जाने के बाद भी उसकी परिधि के चारो ओर थोड़ी जगह छूटी हो । रोटी पर बहुत अधिक परेथन नहीं लगा होना चाहिए ,अन्यथा परेथन गर्म तवे के संपर्क में आते ही जल उठता है और रोटी पर काले काले दाग पड़ सकते हैं । तवे पर रोटी डालने के बाद उसे उलटते पलटते रहे ,जब चित्ती सी पड़ जाए तब उसे तवे से उतार कर गैस के बर्नर पर धीरे से सेंके । देखते ही देखते रोटी फूल कर कुप्पा हो जायेगी । जल्दी जल्दी 'दस्तपनाह' से उसे अलट पलट कर गुब्बारा ऐसा फुला लें और फिर उसे कैसेरौल में एल्युमीनियम फॉयल लगा कर रखते जाएँ । बन गई फूली फूली रोटी ।

इसमें कोई गणित ,कोई विज्ञान काम नहीं करता । बस बनाने वाले का मन होना चाहिए ,रोटियाँ बनाने का । अगर बनाने वाले ने रोटियाँ बनाते समय मुंह फुला लिया तब उस दशा में रोटियां नहीं फूलेंगी अर्थात या तो मुंह फूलेगा या रोटियाँ ।

गरीब आदमी चोकर या 'चूनी' की भी रोटी पाथ लेता है ।  महीन चाला हुआ आटा 'मैदा' कहा जाता है । चावल के आटे की रोटी 'खिरौरा' ,गेंहू की मीठी रोटी 'खबौनी' ,हाथ से पाथी रोटी 'हथपई',भौरी या उपलों की आग में पकाई रोटी 'लिट्टी','बाटी','भभरी' या 'मधुकरी' कही जाती है । घी या तेल में पकाई 'पूड़ी' ,'पूरी' ,'लचुई' या 'सोहारी' कहलाती है ।  ,बहुत मामूली घी में पकाई रोटी 'पराठा' ,'परोठा' या 'पल्टा' कहलाता है । दाल अगर अन्दर भर दी जाए तब उस को , 'दलही' या 'बेनिया' कहते हैं । पानी लगे हाथ से बिना परेथन या खुश्की के बनाई गई रोटी 'पनपथी' या 'चंदिया' कहलाती है । बेलकर तैयार की गई पतली रोटी 'फुलका' ,बिना बेले तैयार की गई पतली रोटी 'चपाती' कहलाती है । पकी रोटी को तोड़कर उसे घी में भून कर 'चूरमा' बनाते हैं ।

इस सब के अतिरिक्त मुझे तो एक समय की बासी रोटी को दूध में मसल कर खाने में बहुत आनंद और स्वाद मिलता है । 

शनिवार, 28 सितंबर 2013

" सोचता हूँ तो अच्छा लगता है......."

अभिषेक / रमन ,

आज तुम्हारा जन्मदिन है । इस दिन हम लोग दुबारा पापा-मम्मी बने थे । बहुत खुश थे हम लोग उस दिन और तब से आज तक तुमने खुशियाँ ही खुशियाँ हम लोगों को दी हैं । ईश्वर बस ऐसे ही आशीर्वाद बनाए रखें और तुम्हारा लक्ष्य अभीष्ट होता रहे ।

इस पोस्ट के लिए तुम्हारी बचपन की फोटो ढूंढ रहा था आज ,पर मजे की बात तुम्हारी कोई फोटो अकेले की है ही नहीं । सब फोटो अनिमेष / राजन के साथ की हैं । कारण ,तुम उसके बाद आये न हम लोगों के पास ,बस उसके बाद तो तुमने सब कुछ उसके संग ही किया ।









बस यूँ ही हमेशा दूसरों की खुशियों का कारण बनते रहना  ,जन्म दिन बहुत बहुत मुबारक तुम्हे ।

-पापा /मम्मी 

सोमवार, 16 सितंबर 2013

" सरकारी केचुए ........"


आज क्यारी में यूँ ही खुरपी लेकर कुछ घास निकाल रहा था । अचानक से एक केचुआ वही दिख गया । बहुत देर तक उसे और उसकी क्रियाओं को गौर से देखने के बाद सहसा मुझे आभास हुआ कि वह केचुआ तो एक सरकारी अफसर की भाँति काम कर रहा था ।

वह केचुआ बड़ी तन्मयता से धीरे धीरे अपने काम में लगा था । उसकी गति को देख कर उस पर तरस भी आ रहा था और क्रोध भी । ईश्वर ने भला उसे गति क्यों नहीं दी । इतने ज़रा से काम को करने में इतना समय लेने का क्या औचित्य ! काम करते करते अचानक वह कुंडली मार कर रुक गया तो मैंने उसे हाथ से सीधा किया । वह फिर धीरे धीरे रेंगने लगा । मेरे अनुसार वह गलत दिशा में जा रहा था ,अतः मैंने उसके एक सिरे पर हाथ लगाया तो वह वहां से पीछे की ओर रेंगने लगा । पकड़ने की कोशिश की तो इतना चिकना था कि हाथ से फिसल गया । वह बस एक ही काम में लगा था ,मिटटी को ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर किये जा रहा था । अनवरत बस यही काम और कुछ नहीं । बहुत प्रयासों के बाद भी मै यह नहीं पहचान पाया कि उसका मुंह किधर है और पूंछ किधर । लगता था जैसे वह मिटटी ही खाता है और मिटटी ही का उत्सर्जन भी करता है । कभी कभी ऐसा भी लगा भी कि वह आगे बढ़ने का प्रयास तो बहुत कर रहा है ,उसके बदन में हरकत तो बहुत हो रही है पर अपनी जगह से ज़रा भी टस से मस नहीं हो रहा है ।  

मैंने उसे पलट कर देखने की कोशिश की तो भी समझ नहीं आया कि उसका पेट किस ओर है और पीठ किस ओर । उँगलियों से उसे ज़रा सा धक्का दिया तो दूर जा गिरा परन्तु बिना कुछ बोले ,बिना कोई क्रोध दिखाए फिर अपने काम में लग गया उसी मंथर गति से । उसे कितना भी परेशान किया तब भी उसने न काटा ,न भौंका और न ही पलट कर देखा ,बस करता रहा धीरे धीरे मिटटी की उलट पलट ।

कहते हैं इसी उलट पलट से वह केचुआ खेत को उर्वर बनाता है और उससे पैदावार बढ़ जाती है । 

बस ऐसे ही होते हैं सरकारी अफसर । न पेट का पता ,न पीठ का । अति व्यस्त दिखना इनका शगल ,दिन भरे चलते अढाई कोस और फाइलों को ऊपर नीचे कर अपने दफ्तर को उर्वर बनाते रहते हैं ।

कहते हैं केचुओं को अगर बंजर जमीन में डाल दिया जाये तो वे वहां भी उलट पलट कर उस जमीन  को उर्वर बना कर उसमें भी कुछ न कुछ पैदा करा ही देते हैं । ऐसे ही कुछ अफसर भी अपनी इस 'केचुआ टाइप' कार्यशैली में  इतने सिद्ध हस्त होते हैं कि उन्हें कहीं भी किसी भी जगह तैनात कर दिया जाये ,तब भी वे वहां फाइलों को इतना ऊपर नीचे कर डालते हैं कि वह दफ्तर जो पहले कभी घोर बंजर रहा हो ,वह भी उर्वर हो जाता है और उस दफ्तर में भी जबरदस्त पैदावार होने लगती है । ऐसे अफसर बहुत तेज़ तर्रार और गट्स वाले कहलाते हैं ।

परन्तु मुझे तो ये अफसर सरकारी केचुए नज़र आते हैं । 

शनिवार, 14 सितंबर 2013

" रेयरेस्ट ऑफ द रेयर.........."


तलब लगी ,
जब कभी उनकी ,
भर जी निहारा किये ,

अफ़सोस ,
इल्म न करा पाए ,
मोहब्बत का अपनी,

पर एहसास ,
तो एहसास है ,
एक दिन होना ही था ,

अचानक उस शाम यूँ ही ,
अक्स सा उभरा उनका ,
खिड़की पर जब ,

लगा सरेशाम ,
चाँद सा ,
उग आया हो कोई  ,

काली जुल्फें ,
संवारती थी  ,
गोरी खनकती कलाईयाँ

नज़रें मिली  ,
जब उनकी ,
कंघी की ओट से ,

लगा कंघी में ,
अरझे हों जैसे ,
जुगनू कई , 

होंठों में बुदबुदाया मै ,
'रेयरेस्ट ऑफ द रेयर' 
वाकया है यह तो ,

फिर तो 'मृत्यु दंड' 
तुम्हारी निगाहों के लिए ,
आवाज़ उधर से आई  ,

और वो खिड़की ,
बंद हो गई ,
सदा के लिए '

शायद वह भी थे सजा-याफ्ता  'उम्रकैद' की । 


बुधवार, 4 सितंबर 2013

"शीर्षक कैसा हो......."


'शीर्षक' लिखना लेखक के लिए एक बड़ी चुनौती होता है । पहले विचार आते हैं फिर उस विचार को विस्तार और आयाम देकर लेख / कहानी का स्वरूप बनता है । ऐसे में मन में सदा एक 'पात्र' ,'घटना' या 'कथन' बार बार उछल उछल कर सामने आता रहता है बस उसी से जन्म होता है 'शीर्षक' का । 'शीर्षक' लेख के 'सेंटर ऑफ़ मॉस' की तरह होना चाहिए कि अगर उस लेख / कहानी को 'शीर्षक' के सहारे उठा कर टांग दिया जाए तब लेख / कहानी पूरी तरह से संतुलित ही रहे ।

कुछ सिद्धहस्त लेखक पहले पूरा घटनाक्रम लिख डालते हैं फिर उससे सामंजस्य स्थापित करते हुए 'शीर्षक' को जन्म देते हैं ,परन्तु बाद में 'शीर्षक' देना तनिक मुश्किल होता है ।

'शीर्षक' पहले से तय करने के पश्चात लेख / कहानी लिखते समय उसका ताना बाना उस 'शीर्षक' के इर्द गिर्द बुनता जाता है ,जैसे मकड़ी अपने शिकार को पकड़ते ही उसके चारों ओर बड़ी तेजी से अपना जाल बिछा देती है और उसका शिकार उसकी गिरफ्त से छूट नहीं पाता। 'शीर्षक' जितना सुरक्षित होता है ,लेख पर उसका असर उतना ही अधिक गहरा होता है । 'शीर्षक' एक बड़ी सी 'शिरोरेखा' ही है जिस पर उस 'लेख' के सभी शब्द टंगे होते हैं ।

'शीर्षक' तो इत्र की शीशी के ढक्कन की तरह होना चाहिए कि ज़रा सा खोला नहीं कि पूरा माहौल महक से वाकिफ हो जाए । कुछ 'शीर्षक' ऐसे होते हैं जिनका विषय से कोई लेना देना नहीं होता । इन्हें लेखक केवल आकर्षण हेतु लिख देते हैं परन्तु दो चार पन्ने पढ़ते ही समझ आ जाता है कि 'शीर्षक' का लेख से उतना ही कम सम्बन्ध है जितना कथाकार का कथानक से । लेखक जितना अधिक अपनी कहानी की वास्तविकता से जुड़ा होगा उसका 'शीर्षक' उतना ही अधिक प्रभावशाली होगा ।

लेख / कहानी से भिन्न "कविता" का शीर्षक 'विंड चाइम' की डोरी की तरह होना चाहिए जिसके सहारे पूरी "कविता" लटक कर हवा में लहराती रहे और मधुर संगीत उत्पन्न करती रहे । 

अब के कुछ लेखक / लेखिका , कवि  / कवियत्री ऐसे भी हैं जो लेखन के प्रारम्भ में 'शीर्षक' तय तो कर लेते हैं परन्तु प्रकाशन से पहले ही कथानक का रहस्य खुल न जाए अथवा उस 'शीर्षक' का अन्य लेखों में दुरूपयोग न हो जाए इस भय से उस 'शीर्षक' का खुलासा नहीं करते । 

'शीर्षक' तो लेखक / कवि का अपने लेख / कविता के लिए एक घूँघट की तरह होता है जो उसे पूरी तरह ढके तो रहता है परन्तु पैनी नज़र वालों से अपना रहस्य उद्घाटित भी कराता रहता है । 

सोमवार, 2 सितंबर 2013

" आश्रमों के पीछे का सच ....."



इतना अच्छा बोलता था टी वी पर , कितना चमकदार और रोबदार चेहरा ,कितनी ज्ञान की बातें और अब ऐसे आरोपों से घिरा हुआ। सच क्या है , ऐसा क्यों होता है ,क्या हैं ये 'आसाराम' सरीखे बाबा !! आम आदमी के मन का बड़ा सरल सा प्रश्न ।

ईश्वर में आस्था और भक्ति होने के साथ अनजाने में ही लोग चमत्कार की कल्पना और उसमें सहज विश्वास करने लगते हैं । बचपन से ही बड़ों का आदर, गुरुओं और सन्यासियों का सम्मान और उनसे आशीर्वाद लेने का उपक्रम करते करते कब मन में इन चमत्कारी बाबाओं के प्रति अगाध श्रद्धा की बात घर कर जाती है ,भान ही नहीं रहता । ऐसे में साथ में रहने वाले हमारे बड़े लोग अगर सतर्क न हो और स्वयं भी ऐसे लोगों में अगाध आस्था और विश्वास करते हो तब उनके आस पास के लोगों में ऐसी ही धारणा पनपना निश्चित है ।

जीवन में सदैव आशा और निराशा का एक साथ ही वास होता है । कोई कितना भी सक्षम क्यों न हो ,उसकी भी कोई न कोई अभिलाषा अपूर्ण ही रहती है । ऐसे में अचानक से कहीं कोई आशीर्वाद के रूप में चमत्कार होने की बात प्रबल कर दे तब उसका भटकना तय है । घर घर भिक्षा मांगने वाले भी इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि महिलाओं को उनके बच्चों की सफलता के नाम पर कुछ भी माँग कर उसे प्राप्त कर लेना सबसे आसान काम है । जो भरे पूरे हैं उन्हें उसे बचाए रखने की चिंता और जो आधे अधूरे हैं उन्हें उसे पूरा करने की चिंता ही ,किसी भी भाँति , इन साधुओं की ओर खींचती है ।  

किसी भी प्रवचन में कोई ऐसी बातें नहीं होती जो किसी को ज्ञात न हो । ऐसे किसी भी आयोजनों में वहां का वातावरण इतना सुगन्धित ,सुसज्जित , शांत और मनमोहक होता है और वही व्यक्ति के चित्त पर गहरा असर करता है और व्यक्ति को सोचने पर मजबूर कर देता है कि वहां कुछ तो विशेष है । उस पर से वहां बोलने वाले बाबा की सादगी , भाषा , संगीत और चंद बड़े लोग कुल मिला कर आग में घी का काम करते हैं । भीड़ भाड़ देख कर आम लोग स्वतः आश्वस्त हो जाते हैं ,वहां की सत्यता के प्रति , जबकि होता ऐसा कुछ भी नहीं है । सुगन्धित पदार्थों का प्रयोग , धूप ,अगरबत्ती ,मधुर भजन ,सुन्दर महंगे साज सज्जा की सजावट  ,कहीं भी कर दी जाय तब ऐसा ही प्रभाव हो सकता है ।

ईश्वर में आस्था रखना और किसी अन्य के द्वारा चमत्कार करने की क्षमता में विश्वास करना दो अलग अलग परन्तु बहुत सूक्ष्म अंतर की बातें है । समझना होगा कि सभी अन्य व्यक्ति भी आम जन की तरह ही हैं ,किसी ,साधू ,सन्यासी ,बाबा को यह शक्ति हासिल नहीं है कि वह आपके लिए कुछ कर देगा । अपनी पूजा स्वयं ,करें ईश्वर में आस्था रखे ,उससे आपको संबल मिलेगा और आपके ही कर्म से समस्या का निवारण होगा । यह बात अवश्य सत्य है कि पूजा पाठ से मन , चित्त और घर सुगन्धित और शांत हो जाता है ,जिसे 'अरोमाथिरेपी' कह सकते हैं । यह बाबा लोग बस इसी 'थिरेपी' के सहारे लोगों का विश्वास हासिल करते हैं जो धीरे धीरे अंधविश्वास बन जाता है ।

इस तरह की घटनाएं ( महिलाओं के शोषण की ) स्वयं सिद्ध करती हैं कि ऐसे बाबा साधारण मनुष्य ही हैं ,परन्तु चूंकि समय बीतने के साथ उनका कद इस कदर बढ़ चुका होता है कि भुगतने के बाद भी वह मुंह खोलने का साहस नहीं जुटा पाती और इसी चुप्पी का लाभ लेकर वह बाबा अपना आश्रम ऐसे लोगों से सजाता रहता है । ऐसी जगहों पर नामी -गिरामी लोगों के आने जाने से साधारण व्यक्ति इतना सहमा हुआ होता है कि उसके पास विश्वास करने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं होता । उदाहरण के तौर पर साईँ बाबा के भक्त 'कलाम साहब' भी रहे और 'सचिन तेंदुलकर' भी , जबकि साईं बाबा भी आसाराम से कम धूर्त नहीं थे ,अब कलाम साहब और सचिन की योग्यता पर तो किसी को कोई संदेह नहीं है ,न ही मुझे है पर आम लोग यह नहीं जानते कि सचिन और कलाम साहब ने उन पर अंध विश्वास कर अपने कर्मों से समझौता कभी नहीं किया । परन्तु इतने बड़े व्यक्तित्व का उनके यहाँ आना जाना देख कर जाहिर है आम आदमी तो अंध भक्त हो ही जाएगा । अतः ऐसे बड़े लोगों का भी दायित्व है कि ऐसी झूठ मान्यताओं को उन्हें बढ़ावा नहीं देना चाहिए । 

यह साधू ,सन्यासी, बाबा अकेले रहते है और चूंकि साधारण मनुष्य ही हैं तब उनमें भी आम लोगों की तरह सभी आवश्यकताओं का जन्म लेना साधारण सी बात है । वह कोई परमहंस नहीं कि उन पर महिलाओं और लड़कियों की संगत का प्रकृति-जन्य असर नहीं होगा और तभी फिर ऐसी घटनाएं सामने आती हैं ।

ऐसी घटनाओं बहुत होती हैं और उजागर तभी हो पाती हैं तब कभी कभार किसी की आत्मा कचोट उठती है ,अन्यथा अनेक बाबा इसकी आड़ में खूब फूलते फलते रहते हैं । इस दिशा में मीडिया ने भी ख़ास कर 'टी वी' ने भी ऐसे चमत्कारी बाबों को बहुत प्रोमोट किया है । आम आदमी अपनी महत्वाकांक्षा पूरा करने चक्कर में इन सब में ऐसा उलझता है कि बस उसके हाथ चंद मालाएं , ताबीज , अंगूठी , कीमती परन्तु बेजान पत्थर और ऐसे आश्रमों के चक्कर ही आते हैं । सब कुछ लुट जाने के बाद वह लाज के भय से किसी से कुछ कह भी नहीं पाता । 

इन आश्रमों में प्रवचन ने एक उद्दोग का रूप ले लिया है ।लाखों करोड़ों का टर्न ओवर है । यह आश्रम बड़े घरानों के ब्लैक मनी को व्हाईट करने का काम बखूबी करते हैं । इस पर एक बार स्टिंग ऑपरेशन भी हो चुका है परन्तु सब बड़े लोग आपस में मिले हुए हैं । किसी का कुछ नहीं होना, बस आम आदमी यूं ही बेवकूफ बन कर इन आश्रमों के उद्दोग का 'रा मटीरियल' बनता रहता है     

बहुत सरल सी बात है ,पूजा पाठ , ईश्वर का ध्यान , यह सब सब स्वयं करने से ही मन को शान्ति मिल सकती है और फिर इसी शांत मन की ऊर्जा से बड़े से बड़े मनोरथ सिद्ध हो सकते हैं । इस काम के लिए कोई अन्य व्यक्ति कितना बड़ा भी सिद्ध ( ढोंगी ) क्यों न हो ,आपकी सहायता नहीं कर सकता ।

जब तक हम इन बातों को नहीं समझेंगे , उँगलियों में रत्न पहनना नहीं छोड़ेंगे , धूर्त पाखंडियों से शंख बजवाते रहेंगे , इन लाल होते बाबाओं के आश्रमों में जा कर इनके चरण छूते रहेंगे , इनके आचरण ऐसे ही मिलेंगे ।


                                                     ( दिखावे पर मत जाओ अपनी अकल लगाओ  )   

बुधवार, 28 अगस्त 2013

" क्या न लिखूं ..."


'क्या लिखूं' , सोचने से बेहतर है यह सोचा जाए कि 'क्या न लिखूं' ।  

यह बिलकुल भी नहीं लिखूंगा कि रुपये के अवमूल्यन का कारण गलत आर्थिक नीतियाँ है । अंतर्राष्ट्रीय बाजार में हमारे उत्पादों का रेंज भी कम है और जो हैं भी उनकी गुणवत्ता भी मानक अनुसार नहीं है । यह भी नहीं लिखूंगा कि चार हज़ार करोड़ रुपये के लैपटाप बांटने के बजाय कोई उद्योग लगा दिया गया होता तो अधिक लाभकारी होता । जिन्हें सच में आवश्यकता है उन्हें आर्थिक एवं अन्य प्रकार की सहायता अवश्य दी जानी चाहिए परन्तु जितना धन व्यय किया जाना है उसकी भरपाई का इंतजाम पहले कर लेना आवश्यक है । रेवन्यू जेनेरेट नहीं करेंगे तो सरकारी खजाने खाली होते रहेंगे और विश्व बैंक का मुंह ताकते ताकते हम तो औंधे मुंह गिरेंगे ही  हमारा रुपया भी कहीं का नहीं रहेगा । जब तक हम उदारता बरतते रहेंगे ( वह भी उदारता कहाँ है ,वोट बैंक की राजनीति है ) और अपने खजाने को यूं ही लुटाते रहेंगे ,आर्थिक मजबूती नहीं आने वाली ।

एक छोटा सा उदाहरण : दीपावली पर पूरे देश भर में बिजली की झालरों की सजावट की जाती है ।सारे बाज़ार में चीन में निर्मित झालरें ही बिकती हैं और खूब बिकती हैं । अगर यही उद्योग हमारे यहाँ लग जाए तो क्या इस बिक्री का लाभ हमें नहीं मिलेगा।मै अर्थशास्त्री तो नहीं परन्तु इतनी छोटी सी बात तो समझ में आ ही जाती है ।  
यह भी नहीं लिखूंगा कि बहुत ऊंचे स्तर पर जो भी निर्णय लिए जाते हैं वह 'कस्टमाइज्ड' होते हैं अर्थात वह किसी बड़े घराने को या किसी वर्ग विशेष को लाभ पहुचाने के उद्देश्य से लिए जाते हैं , भले ही सरकार की आय को भारी चोट पहुँच जाए ।

यह भी नहीं लिखूंगा कि हमारा देश प्रजातंत्र से चलता है और इसमें सारा श्रेय 'संख्या' को है । जिसकी 'संख्या' ज्यादा ,वह सरकार बनाता है और राज करता है । अब अगर 'संख्या' अनपढ़ों /गंवारों की अधिक है तो स्पष्ट है कि परिणाम क्या होगा । क्या सरकारों को इस पर सोचना नहीं चाहिए , आंकड़े नहीं निकाले जाने चाहिए कि आखिर दिन प्रतिदिन 'संख्या' बढ़ किसकी रही है !

यह भी नहीं लिखूंगा कि समाज में बच्चों का मानसिक विकास इस प्रकार किया जाना चाहिए कि उनके अन्दर लड़कियों और महिलाओं के प्रति सम्मान उत्पन्न हो और किसी भी तरह से यौनिक हिंसा की घटना न होने पाए । ( इससे घृणित और कुछ नहीं हो सकता जो हम आये दिन देखते और सुनते हैं ,मुझे तो पढने में भी शर्म महसूस होती है ) । मेरा एक सुझाव है ,महिलाओं और लड़कियों को बस एक शब्द अंग्रेजी का सदैव कंठस्थ रखना चाहिए ( lest : ऐसा न हो कि ) ,हर परिस्थिति में ऐसी संभावना को अगर याद कर थोड़ा सतर्क रहे तो शत-प्रतिशत ऐसी घटनाओं से बच सकती हैं । वास्तव में लडकियां और महिलाएं कल्पना नहीं कर पाती कि उनके साथ कोई ऐसा भी कर सकता है ,बस इसीलिए दुर्घटना हो जाती है ।

यह भी नहीं लिखूंगा कि लोगों के लिए अब आवश्यक है कि अंधविश्वास छोड़ कर कठिन परिश्रम करें और इस पर विश्वास करें कि किसी भी संकट का हल उनके द्वारा कर्म करके ही निकाला जा सकता है । आसाराम बापुओ के आश्रम में जाने से हल तो नहीं निकलता परन्तु ऐसी घटनाएं अवश्य हो जाती हैं । बच्चों में बचपन से ही ईश्वर में आस्था तो अवश्य उत्पन्न होने दें परन्तु किसी साधू सन्यासी के चमत्कार से उसे सदैव दूर रखें । एक पुरानी कहावत है , "दुआओं से किश्ती नहीं चलती " ।

यह भी नहीं लिखूगा कि जो लोग समाज को बदलने की बात करते हैं उन्हें पहले स्वयं अनुकरणीय कार्य करने होंगे । बिना मतदान किये सरकारों को दोष देने वालों को दंड दिए जाने का प्राविधान होना चाहिए , नहीं तो ऐसे ही नेता चुने जाते रहेंगे और होटलों में गिरफ्तार होते रहेंगे ।

यह भी नहीं लिखूंगा कि उन्नत देश जहां पहुँच गयें हैं और जो हासिल कर चुके हैं हम वैसा अभी सोच भी नहीं पा रहे है । कितना पिछडापन , इतना पिछड़ापन वह भी मानसिक रूप से ।

अंत में यह अवश्य लिखूंगा कि किसी भी निर्णय को लेने से पहले उसके दूरगामी परिणामों के विषय में सोचना अत्यंत आवश्यक है ,छोटे छोटे लक्ष्य बनाकर ,स्वार्थपूर्ति के उद्देश्य से ,हम तरक्की नहीं कर सकते और न ही आत्मनिर्भर हो सकते हैं ।