( यह रोटियाँ अर्चना चाव जी की हैं )
इधर कुछ दिनों पहले निवेदिता की तबियत ठीक न थी ,तब मैंने (केवल) एक दिन रोटी बनाने का सफल प्रयास किया । उसी दौरान ,लोई पर लगाए जाने वाले सूखे आटे को 'परेथन' क्यों कहते हैं , यह प्रश्न उत्पन्न हुआ । फेसबुक पर चर्चा के दौरान ज्ञात हुआ ,परेथन का सही शब्द 'परिस्तरण' हैं ।
बात आगे चल निकली ,अर्चना चाव जी ने रोटी को उचित तरीके से फुलाने के विषय में प्रश्न किया । बहुत सारे गणितीय उत्तर प्राप्त हुए ,पर कोई उत्तर उचित नहीं ठहराया गया । रोटी के आकार ,प्रकार ,गोलाई ,मोटाई के बारे में भी चर्चा हुई परन्तु कोई संतोषजनक निष्कर्ष न निकला ।
थोड़ा अनुसंधान फिर मैंने भी किया । रोटी का आकार आटे की लोई पर निर्भर करता है और लोई का आकार बनाने वाले की हथेली पर निर्भर करता है। लोई बस इतनी बड़ी हो कि हथेली के गड्ढे नुमा आकार में बैठ जाए । फिर उसे दोनों हथेलियों के बीच धीरे धीरे गोल गोल घुमाते हुए लोई को 'उड़नतश्तरी' के आकार का बना लें । अब उसके दोनों ओर सूखा आट़ा लगाए । चकले पर उस लोई को धर कर उँगलियों से हौले से दबाएँ । अब बारी आती है बेलन की , बेलन लंबा और पतला होना चाहिए । अगर बेलन की लम्बाई रोटी के व्यास से कम है तब रोटी बेलते समय कहीं मोटी और कहीं पतली हो जायेगी । चकला भी छोटा होने पर रोटी की शक्ल बिगाड़ सकता है । चकला इतना बड़ा हो कि रोटी बेल जाने के बाद भी उसकी परिधि के चारो ओर थोड़ी जगह छूटी हो । रोटी पर बहुत अधिक परेथन नहीं लगा होना चाहिए ,अन्यथा परेथन गर्म तवे के संपर्क में आते ही जल उठता है और रोटी पर काले काले दाग पड़ सकते हैं । तवे पर रोटी डालने के बाद उसे उलटते पलटते रहे ,जब चित्ती सी पड़ जाए तब उसे तवे से उतार कर गैस के बर्नर पर धीरे से सेंके । देखते ही देखते रोटी फूल कर कुप्पा हो जायेगी । जल्दी जल्दी 'दस्तपनाह' से उसे अलट पलट कर गुब्बारा ऐसा फुला लें और फिर उसे कैसेरौल में एल्युमीनियम फॉयल लगा कर रखते जाएँ । बन गई फूली फूली रोटी ।
इसमें कोई गणित ,कोई विज्ञान काम नहीं करता । बस बनाने वाले का मन होना चाहिए ,रोटियाँ बनाने का । अगर बनाने वाले ने रोटियाँ बनाते समय मुंह फुला लिया तब उस दशा में रोटियां नहीं फूलेंगी अर्थात या तो मुंह फूलेगा या रोटियाँ ।
गरीब आदमी चोकर या 'चूनी' की भी रोटी पाथ लेता है । महीन चाला हुआ आटा 'मैदा' कहा जाता है । चावल के आटे की रोटी 'खिरौरा' ,गेंहू की मीठी रोटी 'खबौनी' ,हाथ से पाथी रोटी 'हथपई',भौरी या उपलों की आग में पकाई रोटी 'लिट्टी','बाटी','भभरी' या 'मधुकरी' कही जाती है । घी या तेल में पकाई 'पूड़ी' ,'पूरी' ,'लचुई' या 'सोहारी' कहलाती है । ,बहुत मामूली घी में पकाई रोटी 'पराठा' ,'परोठा' या 'पल्टा' कहलाता है । दाल अगर अन्दर भर दी जाए तब उस को , 'दलही' या 'बेनिया' कहते हैं । पानी लगे हाथ से बिना परेथन या खुश्की के बनाई गई रोटी 'पनपथी' या 'चंदिया' कहलाती है । बेलकर तैयार की गई पतली रोटी 'फुलका' ,बिना बेले तैयार की गई पतली रोटी 'चपाती' कहलाती है । पकी रोटी को तोड़कर उसे घी में भून कर 'चूरमा' बनाते हैं ।
इस सब के अतिरिक्त मुझे तो एक समय की बासी रोटी को दूध में मसल कर खाने में बहुत आनंद और स्वाद मिलता है ।
इधर कुछ दिनों पहले निवेदिता की तबियत ठीक न थी ,तब मैंने (केवल) एक दिन रोटी बनाने का सफल प्रयास किया । उसी दौरान ,लोई पर लगाए जाने वाले सूखे आटे को 'परेथन' क्यों कहते हैं , यह प्रश्न उत्पन्न हुआ । फेसबुक पर चर्चा के दौरान ज्ञात हुआ ,परेथन का सही शब्द 'परिस्तरण' हैं ।
बात आगे चल निकली ,अर्चना चाव जी ने रोटी को उचित तरीके से फुलाने के विषय में प्रश्न किया । बहुत सारे गणितीय उत्तर प्राप्त हुए ,पर कोई उत्तर उचित नहीं ठहराया गया । रोटी के आकार ,प्रकार ,गोलाई ,मोटाई के बारे में भी चर्चा हुई परन्तु कोई संतोषजनक निष्कर्ष न निकला ।
थोड़ा अनुसंधान फिर मैंने भी किया । रोटी का आकार आटे की लोई पर निर्भर करता है और लोई का आकार बनाने वाले की हथेली पर निर्भर करता है। लोई बस इतनी बड़ी हो कि हथेली के गड्ढे नुमा आकार में बैठ जाए । फिर उसे दोनों हथेलियों के बीच धीरे धीरे गोल गोल घुमाते हुए लोई को 'उड़नतश्तरी' के आकार का बना लें । अब उसके दोनों ओर सूखा आट़ा लगाए । चकले पर उस लोई को धर कर उँगलियों से हौले से दबाएँ । अब बारी आती है बेलन की , बेलन लंबा और पतला होना चाहिए । अगर बेलन की लम्बाई रोटी के व्यास से कम है तब रोटी बेलते समय कहीं मोटी और कहीं पतली हो जायेगी । चकला भी छोटा होने पर रोटी की शक्ल बिगाड़ सकता है । चकला इतना बड़ा हो कि रोटी बेल जाने के बाद भी उसकी परिधि के चारो ओर थोड़ी जगह छूटी हो । रोटी पर बहुत अधिक परेथन नहीं लगा होना चाहिए ,अन्यथा परेथन गर्म तवे के संपर्क में आते ही जल उठता है और रोटी पर काले काले दाग पड़ सकते हैं । तवे पर रोटी डालने के बाद उसे उलटते पलटते रहे ,जब चित्ती सी पड़ जाए तब उसे तवे से उतार कर गैस के बर्नर पर धीरे से सेंके । देखते ही देखते रोटी फूल कर कुप्पा हो जायेगी । जल्दी जल्दी 'दस्तपनाह' से उसे अलट पलट कर गुब्बारा ऐसा फुला लें और फिर उसे कैसेरौल में एल्युमीनियम फॉयल लगा कर रखते जाएँ । बन गई फूली फूली रोटी ।
इसमें कोई गणित ,कोई विज्ञान काम नहीं करता । बस बनाने वाले का मन होना चाहिए ,रोटियाँ बनाने का । अगर बनाने वाले ने रोटियाँ बनाते समय मुंह फुला लिया तब उस दशा में रोटियां नहीं फूलेंगी अर्थात या तो मुंह फूलेगा या रोटियाँ ।
गरीब आदमी चोकर या 'चूनी' की भी रोटी पाथ लेता है । महीन चाला हुआ आटा 'मैदा' कहा जाता है । चावल के आटे की रोटी 'खिरौरा' ,गेंहू की मीठी रोटी 'खबौनी' ,हाथ से पाथी रोटी 'हथपई',भौरी या उपलों की आग में पकाई रोटी 'लिट्टी','बाटी','भभरी' या 'मधुकरी' कही जाती है । घी या तेल में पकाई 'पूड़ी' ,'पूरी' ,'लचुई' या 'सोहारी' कहलाती है । ,बहुत मामूली घी में पकाई रोटी 'पराठा' ,'परोठा' या 'पल्टा' कहलाता है । दाल अगर अन्दर भर दी जाए तब उस को , 'दलही' या 'बेनिया' कहते हैं । पानी लगे हाथ से बिना परेथन या खुश्की के बनाई गई रोटी 'पनपथी' या 'चंदिया' कहलाती है । बेलकर तैयार की गई पतली रोटी 'फुलका' ,बिना बेले तैयार की गई पतली रोटी 'चपाती' कहलाती है । पकी रोटी को तोड़कर उसे घी में भून कर 'चूरमा' बनाते हैं ।
इस सब के अतिरिक्त मुझे तो एक समय की बासी रोटी को दूध में मसल कर खाने में बहुत आनंद और स्वाद मिलता है ।













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