मंगलवार, 12 जून 2012

" आई.आई.टी. को आई.आई.टी. ही रहने दें ....."



हमारे देश में प्रजातांत्रिक व्यवस्था में जनता का प्रतिनिधित्व करने के लिए सभासद , वार्ड मेंबर ,नगरपालिका चैयरमैन,मेयर,एम.एल.सी.,एम.एल.ए.,एम.पी.और अंत में राष्ट्रपति का चुनाव कराया जाता है | अब सिब्बल साहब की थ्योरी से पूरे राष्ट्र में एक ही चुनाव कराया जाना चाहिए | उसके लिए उम्मीदवारों को मोहल्ले , जिले स्तर पर मिले  मत और पार्टी को प्रदेश और देश स्तर पर  प्राप्त मत का प्रतिशत तय करते हुए एक व्यवस्था बनानी होगी | पर शायद यह अतार्किक और अप्रासांगिक होगा ,क्योंकि गली,मोहल्ले का सभासद बनने के लिए और विधायक / सांसद बनने के लिए क्षमता और सोच बिलकुल भिन्न होती है | हो सकता है राजनीति का यह माडल शिक्षा के प्रसंग में थोड़ा उपयुक्त न प्रतीत हो रहा हो पर राजनीतिज्ञों को इसके इतर कोई बात समझ में नहीं आती |

आई.आई.टी. को अगर पूरे देश और विदेश में एक विशेष स्थान मिला हुआ है तो उसका एकमात्र कारण है उसकी निज में स्वायत्ता और स्वतंत्रता | उसकी प्रवेश परीक्षा अन्य संस्थानों से भिन्न होती है, तनिक कठिन भी होती है | परन्तु प्रश्नपत्र ऐसे नहीं होते जो बारहवीं कक्षा के स्तर के न हों | प्रत्येक प्रश्न में तनिक सूझबूझ और त्वरित सोच की आवश्यकता होती है | वर्तमान व्यवस्था में प्रत्यक बच्चा जो उसमें चयनित हो रहा है , वह निश्चित तौर पर मेधावी है तभी वहां प्रवेश पा रहा है |  और यह सदैव होता रहा है | किसी भी क्षेत्र में आई.आई.टी. का छात्र आपको अन्य सबसे भिन्न नज़र अवश्य ही आयेगा | कोई भी परीक्षा व्यवस्था दोषपूर्ण तब ठहराई जानी चाहिए जब उस व्यवस्था से मानक से नीचे के स्तर के बच्चों का चयन होने लग जाए | 

एक अन्य बात जिस पर कपिल सिब्बल को वेदना है , वह है कोचिंग संस्थानों के विषय में | आई.आई.टी. की तैयारी कराने वाली जितनी भी कोचिंग है , वे सभी बहुत अच्छा कार्य कर रही हैं | स्कूल स्तर पर अच्छे शिक्षकों का आभाव है | बच्चों को कोचिंग की आवश्यकता दो कारणों से होती है , पहला, वहां से उन्हें किसी भी परीक्षा के पैटर्न के बारे में जानकारी मिलती है, दूसरा किसी भी प्रश्न को हल करने में जब कभी कोई अड़चन आती है तब तुरंत समाधान मिल जाता है | हाँ ! कोचिंग का अनुभव उन माँ-बाप को अवश्य बुरा होता होगा या होता है जो कोचिंग को एक ऐसी फैक्ट्री मान बैठते हैं जहाँ रा मटीरियल डालने पर एक वांछित फिनिश्ड प्राडक्ट तैयार हो निकल आता है | सभी कोचिंग संस्थान बहुत ही सिस्टमेटिक तरीके से बच्चों को तैयारी कराते हैं और यह बात भी निश्चित है कि  बच्चे का बौद्धिक और तार्किक स्तर वहां बढ़ अवश्य जाता है और अगर वह आई.आई.टी. नहीं निकाल पाता फिर भी किसी अन्य परीक्षा में अवश्य स्थान पा जाता है | अब रही बात बारहवीं कक्षा को महत्व देने की | जिन भी बच्चों का चयन किसी भी इंजीनियरिंग कालेज में हो रहा हो , बारहवीं में तो उसने अवश्य ही अच्छा किया होगा | असल समस्या उस 'लाट' की है जो कहीं चयनित भी नहीं हो पाता और बारहवीं पर भी ध्यान नहीं दे पाता |

कितने अफ़सोस की बात है कि  सिब्बल साहब उन बच्चों की चिंता अधिक कर रहे हैं जो कोचिंग के चक्कर में न कहीं चयनित हो पाते हैं न ही बारहवीं कक्षा में अच्छे अंक ला पाते हैं | ये बचा हुआ वर्ग है उन बच्चों का है , जहां तक मैं समझ पाता हूँ , संभवतः जिनमें गणित या विज्ञान के प्रति अभिरुचि कम होती है  और अगर वे दूसरे क्षेत्र में लगन से मेहनत करें तब वहां वे अधिक सफल हो सकते हैं | अब इन असफल बच्चों के कारण  (जिनका आई.आई.टी. से कोई लेना देना न है ,न होगा कभी ) आई. आई.टी. की प्रवेश परीक्षा में बदलाव कर देना मूर्खता नहीं तो और  क्या है |

अगर सच मायने में बारहवीं कक्षा के अंको को महत्त्व देना है तब वर्तमान परीक्षा पद्धति में ही पात्रता के लिए कक्षा १२ में पाए जाने वाले अंकों की न्यूनतम सीमा बढ़ा देनी चाहिए | सिब्बल साहब की व्यवस्था में ३६ भिन्न बोर्डों के बारहवीं के अंको को किस प्रकार एक अनुपात में प्रतिपादित किया जा सकेगा,विचारणीय परन्तु  संभवतः अत्यंत कठिन है |

आई.आई.टी. सदैव से एक विशेष संस्थान रहा है और वहां चयनित होने वाले बच्चों की मेधा पर किसी को संशय नहीं रहा कभी | परन्तु यदि बोर्ड के अंकों को महत्त्व देकर चयन प्रक्रिया की गई तब अवश्य ही मेधा शक के दायरे में आने लगेगी और तब यह न देश के हित में होगा और न मेधावी बच्चों के हित में |

देश / विदेश के जिन संस्थानों ने अपनी चयन प्रक्रिया सबसे भिन्न रखी है, उन्ही संस्थानों का स्थान सदैव विशेष और भिन्न रहा है |  

कोचिंग संस्थान अगर पढाने लिखाने के नाम पर कुछ मुनाफा कमा भी लेते हों  तब भी इस देश में हो रहे करोड़ों  अरबों के घोटाले के आगे उनका मुनाफ़ा अत्यंत गौण है । पढ़ाना लिखाना तो सदैव पवित्र कार्य ही रहा है और वे कोचिंग चलाकर एम्प्लोयमेंट भी जेनरेट कर रहे हैं ।हाँ! कोचिंग की आड़ में कोई अगर गैर कानूनी कार्य  यथा पेपर आउट कराना या फिक्सिंग जैसा कार्य कर रहा हो तब अवश्य उसके विरुद्ध कार्यवाही की जानी चाहिए ।


कपिल साहब सोचें ज़रा, शिक्षा को राजनीति से अलग ही रहने दें और "आई.आई.टी." को "आई. आई. टी." ही रहने दें |


10 टिप्‍पणियां:

  1. चरणबद्ध विश्लेषण से पूर्णत : सहमती.. सिब्बल जी को कोई तो समझाए...

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  2. पूर्णत: सहमत हूँ..सही कहा आप ने.. शिक्षा को राजनिति से दूर रखना ही चाहिये...

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  3. प्रश्न गंभीर हैं, एक विधान लागू करने में कठिनाईयाँ हैं।

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  4. एक ढंग का संस्थान है वो भी नहीं देखा जाता इन नेताओं से.उसका भी बाजा बजा कर ही रहेंगे.

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  5. कपिल सिब्बल को पता नहीं है कि छात्र उसके लिए क्या क्या बोलते हैं...............
    पागल कर रखा है पूरे एजुकेशन सिस्टम को...........

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  6. बहुत सही लिखा है आपने ...!!अब आई. आई.टी को तमाशा बनाना चाह्ते हैं .....हमारे नेता ....

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  7. बहोत अच्छा पोस्ट है कमुझें नहीं लगता कोचिंग एक फैक्ट्री है

    हिन्दी दुनिया ब्लॉग (नया ब्लॉग)

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  8. कल 15/06/2012 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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