रविवार, 29 अप्रैल 2012

" एक शहर , अपना सा......."



इस शहर का हर शख्स,
मुझे क्यूँ अच्छा लगे है |
आबो-हवा में बस,
बसता यहाँ प्यार ,
कहना उसका आज,
सच सच्चा लगे है |
हवाओं में घुली है ख़ुशबू,
उसकी हर ओर,
यही सोच सोच बस मन को,
यह शहर अपना लगे है |
इसी शहर में हुआ था प्यार,
उस से इस कदर,
कि हर सूरत यहाँ तो,
बस उसकी सी लगे है |
पता नही कहाँ,
गुम गई है अब वो,
झुरमुट में वक्त के |
दीदार होगा फिर ज़रूर,
बस यही सच्चा लगे है |
   

" उस ख़ुशबू को समर्पित जो अक्सर उठती थी जिस्म से उसके ,भीगने के बाद आंसुओ में, 
जैसे उठती हो ख़ुशबू मिटटी की  सोंधी सी, पहली बारिश के बाद | " 

10 टिप्‍पणियां:

  1. भीनी भीनी खुशबु लिए ...एहसासों की चाशनी में पगी...सुंदर रचना....

    सोचती हूँ इसे रचना भी कहूँ कि नहीं...

    सादर.

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  2. कल 30/04/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  3. पता नही कहाँ,
    गुम गई है अब वो,
    झुरमुट में वक्त के |
    दीदार होगा फिर ज़रूर,
    बस यही सच्चा लगे है |
    .यही कसक तो मन को टीस जाती है ..
    बहुत सुन्दर सार्थक रचना

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  4. बहुत खूब ....मैं भी नया नया ब्लोगेर हूँ ..कृपया मेरा भी कविता पढ़ा दोस्तों www.shabbirkumar.co.cc

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  5. आपकी यह पोस्ट पढ़कर जगजीत सिंह और आशा भोसले जी दवारा गाया हुआ यह गीत याद आगया
    कहीं कहीं से हर चहरा तुम जैसा लगता है
    तुमको भूल न पाएंगे हम्म ऐसा लगता है .....

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