गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

" ढक्कन हो क्या...."


ट्रेन में सफ़र के दौरान मेरे सामने की सीट पर बैठे सज्जन ने वेंडर से एक ठंडी बोतल पानी की खरीदी । उसका ढक्कन खोल बोतल से चार छः घूँट पानी का जल्दी जल्दी गटक गए । इसी जल्दी बाजी में उस बोतल का अदना सा ढक्कन उनके हाथ से छूट नीचे कहीं लुढ़क गया और नीचे ही नीचे फर्श पर इंजन की दिशा में भागने लगा । उस वक्त उस ढक्कन को देख यह लग रहा था कि उसकी गति ट्रेन से अधिक है (सापेक्षता के सिद्धांत से) । खैर, वो सज्जन उस ढक्कन को बड़ी मुश्किल से अपनी मुठ्ठी में कैद कर पाए और उसे ऊपर उठा निहार रहे थे ,गोया कह रहे हों ,न जाने कहाँ कहाँ से मुँह काला करा कर आ  गया । ढक्कन फर्श की धूल मिटटी से खेल कर मैला तो हो ही गया था । अब उस ढक्कन को अगर उस बोतल पर लगाते तो सारा पानी ( जो पैसे देकर खरीदा गया था ) खराब हो जाता और अगर ढक्कन ना लगाते तो खुली बोतल में पानी लेकर चलने में भी संकोच लग रहा था । सो धीरे धीरे सबकी नज़र बचाते हुए वो सारा पानी अपने मटके जैसे पेट में ऊँट की तर्ज पर उड़ेल गए और बोतल और ढक्कन को  दो अलग अलग दिशाओं में खिड़की  से बाहर फेंक दिया ।जैसे एक साथ फेंकते तो वे दोनों आपस में एक दूसरे से फिर गले मिल जाते ।

यह वाकया देख मुझे ढक्कन की महत्ता समझ आई कि ढक्कन बिना सब सूना है । कितना भी शानदार और राजसी भोजन बना हो अगर खुले पात्र से परोसा जाए तब स्तर हीन समझा जाता है । हाँ ! उस पर ढक्कन लगा हो तो अपने आप उसकी श्रेष्ठता सिद्ध हो जाती है । महँगी महँगी शराब शानदार ,आकर्षक बोतलों में आती हैं । अगर उनके ढक्कन पहले से खुले हो तो उनकी वैल्यू शून्य । ढक्कन मेहमान के सामने ही खोला जाए तभी उस आकर्षक बोतल की कीमत है । दवा की शीशी खुल गई और ढक्कन खो गया ,दवा बेकार । शहद की शीशी का ढक्कन गायब ,पूरा शहद बेकार क्योंकि उस पर तो फिर चीटियों का साम्राज्य हो जाता है ।

स्कूल में बच्चों के टिफिन के ढक्कन तो बहुत काम के होते हैं । उसी की आड़ बनाई और उसी आड़ में पूरा खाना खा गए । किसी को शेयर कराना हुआ तो उसी ढक्कन पर हो गए दो दो कौर ।

इसी नादान से और अदने से ढक्कन को जबरन भगोने पर  बिठा दिया जाय और कस कर बाँध दिया जाय ,फिर देखें वह ढक्कन बेचारा सारा दर्द सह लेगा पर उफ़ नहीं करेगा और सारी ऊष्मा सहते हुए भोजन पकाने में स्वयं शहीद हो जाएगा । 

हमारे जीवन में प्रयोग होने वाली चीजों का जब ढक्कन इतना महत्वपूर्ण अंग है , फिर हम किसी व्यक्ति को बेकार ,मूर्ख और बुद्धिहीन कहने के लिए उसे "ढक्कन " कह कर क्यों पुकारते हैं ।यह सोचने का विषय है । 

शायद एक  कारण यह हो सकता है कि  ढक्कन जिस भी पात्र का होता है, उस ढक्कन की क्षमता अपने बर्तन या कंटेनर की क्षमता से बहुत कम या लगभग शून्य होती है । दूसरी बात , ढक्कन आसानी से कहीं भी लुढ़क जाता है और कहीं का ढक्कन कहीं और भी लग जाता है अर्थात उसकी निष्ठां भी परिवर्तित हो सकती है ।
प्रयोग में लगातार आने के कारण ढक्कन अक्सर ढीले भी हो जाते हैं ।

इसीलिए संभवतः ऐसे व्यक्तियों को ,जो अपने आसपास के मिलने जुलने वाले लोगों से कम क्षमता रखते हों ,लोगों के प्रति बार बार अपनी आस्था और निष्ठा बदलते हों, प्रायः अत्यधिक ढीला ढाला आचरण करते हो उन्हें ही कहा  जाता हो   " ढक्कन हो क्या ...."

" वैसे कोई भी ढक्कन ( अगर बड़ा हो तो और भी अच्छा ) जब  ज़मीन पर गिर कर गोल गोल नाचने लगता है और बहुत देर तक नाचता रहता है ,मुझे बहुत अच्छा लगता है । अगर थोड़ा तेज़ नाचे तो अक्सर  बहुत सारे elliptical वृत्त बनने लगते है जो "लिसाजू फीगर" ( lissajous figure )की याद दिला देते हैं । 

मै भी अपने ढक्कन-पने में न जाने क्या क्या लिख गया ।

10 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया .........
    रोचक पोस्ट............
    बहुत मज़ा आया पढ़ने में..........
    हमारी भी पसंदीदा उपमा है ढक्कन...
    :-)
    ये ढ शब्द ही अपने आपमें कमाल का है...कोई शब्द है ढ से जो अच्छा विशेषण हो????
    ढक्कन,ढीला,ढपोर,ढोल,ढोंगी,ढोर.....

    सादर.

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  2. ढक्कन महिमा से ये ही समझ में आ गया जी कि ...ढक्कन बिन सब अधूरा हैं ........

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  3. वाकई ये शोध का विषय है...किसी को ढक्कन क्यों कहा जाता है...आपने ढक्कन के मर्म को समझने-समझाने का सार्थक प्रयास किया है....

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  4. जब ढक्कन नहीं रहता है तो उसका महत्व समझ में आता है।

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  5. बहुत अच्छा शोध किया है सर :D

    श्री ढक्कनाय नमः !

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  6. बहुत रोचकता से जीवन के महत्व को समझाया ....
    गहन और सार्थक आलेख लिखवा दिया ढक्कन ने आपसे ....!!
    शुभकामनायें ....

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  7. अमित जी
    बहुत ही आनंद दायक लेख..... आपने ढक्कन महात्म्य पर जो लिखा मैं उससे सहमत हूँ.... ब्लॉग पर आये, प्रोत्साहित किया . आभार

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  8. ढक्कन की महिमा का बड़ी रोचकता से वर्णन किया है आपने... वाकई ढक्कन बिन सब बेकार हो जाता है...आभार

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