बुधवार, 21 दिसंबर 2011

"सूखे दरख़्त "

सूख चुके रिश्तों में,
शायद,
आँखों की नमी भी ना रही |
फासले दरमियां,
कुछ यूँ हुए,
कि संग रह के भी संगदिल हुए |
दूरियां क्या इतनी,
कि तय हो ना सके |
अरे !
सूखे दरख़्त हो,
या हो रिश्ते
शादाब हो भी सकते है !
बस नज़र भर,
देखने वाली हो नज़रें
और हो,
उन नज़रों में पानी |

22 टिप्‍पणियां:

  1. बस नज़र भर,
    देखने वाली हो नज़रें
    और हो,
    उन नज़रों में पानी |
    बस बस काफी है इतना ही .
    खूबसूरत ख्याल.

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  2. जान छिड़कने दे कोई उनमें,
    आशायें जग जायें फिर मन में।

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  3. कल 23/12/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  4. बेहतरीन रचना बहुत खूब लिखा है आपने वाह !!!!समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है http://mhare-anubhav.blogspot.com/

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  5. अरे !
    सूखे दरख़्त हो,
    या हो रिश्ते
    शादाब हो भी सकते है !
    बस नज़र भर,
    देखने वाली हो नज़रें
    और हो,
    उन नज़रों में पानी |

    nazar nazar ki baat hai...

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  6. bahut sundar.........."dekhne wali ho nazrein, aur nazron mein paani..."


    www.poeticprakash.com

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  7. शादाब हो भी सकते हैं.... सचमुच...
    सुन्दर रचना...
    सादर...

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  8. बस नज़रें हों और उनमे हो पानी फिर रिश्ते भी हरे हो जाते हैं... सुन्दर रचना...आभार

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  9. जीवन के एक असह्य अनुभव का अहसास देती कविता

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  10. बचपन में जो सुनी थी कहानी....
    सुनाई तो थी उसे हमारी बुढिया नानी ...
    लड़कपन से बड़क-पन तक बीत गयी जवानी...
    उस प्यार के एहसास से आज भी आँखों में आते हैं पानी !

    हर रिश्ता मांगे हिफाज़त क्योंकि होती है उसमें नजाकत...
    पर हम जब रिश्तों को तौलकर करने लगते हैं मोल भाव...तो,
    असहनीय वेदना होती है.....निकलने लगते हैं बहुत सारे घाव..
    रिश्तों की गर ना हो हिफाज़त, तो आखिर होती सबकी फजीहत !!

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