रविवार, 11 दिसंबर 2011

"बिखरी बिखरी सी ..."


बिखरी बिखरी सी तुम,
बिखरी बिखरी सी,
जिंदगी मेरी,
कभी बैठो न पास,
और समेटो खुद को,
सिमट जाये,
मेरी भी जिंदगी,
या फिर,
बिखर ही जाओ,
कुछ यूँ
जिंदगी में मेरी,
जैसे
बिखरती है
धूप ओस की बूँदों पे
तनिक दमके
बूँदों की तरह,
और फिर,
बिखर  ही जाए,
जिंदगी मेरी |


9 टिप्‍पणियां:

  1. स्वतन्त्रता की चाह और बिखर जाने का डर, द्वन्द्व बड़ा गहरा है।

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  2. जिसे समेट समेट कर सुन्दर शब्द दिया जा सके .

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  3. कोमल भावों से सजी सुंदर रचना...समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका सवागत है
    http://mhare-anubhav.blogspot.com/2011/12/blog-post_12.html

    http://aapki-pasand.blogspot.com/2011/12/blog-post_11.html
    दोनों ही पोस्ट पर आपका स्वागत है

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  4. बहुत ही खुबसूरत और कोमल भावो की अभिवयक्ति......

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