शनिवार, 14 दिसंबर 2013

"हिंदी समाचार पत्रों की भाषा .........."


बचपन में प्रतिदिन हिंदी और अंग्रेजी का समाचार पत्र पढ़ना अनिवार्य सा था । उद्देश्य सामान्य ज्ञान बढ़ाने से अधिक शुद्ध भाषा का ज्ञान प्राप्त करना था । निबंध / लेख लिखने में कभी शब्दों की वर्तनी अथवा प्रयोग में संशय होता था तब उस शब्द को समाचार पत्र में ढूंढ कर उसकी शुद्धता और सार्थकता की जांच कर लेते थे । हिंदी भाषा की शुद्धता का सारा दारोमदार समाचार पत्र पर ही था क्योंकि अंग्रेजी की डिक्शनरी तो सरलता से सुलभ थी परन्तु हिंदी का शब्द कोष सरलता से सुलभ नहीं था । अनेक प्रमुख समाचारों का अंग्रेजी से हिंदी और हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद भी किया करते थे और फिर उसे समाचार पत्र में प्रकाशित समाचार से मिला कर उसे जांचते भी थे ।

धीरे धीरे पता नहीं क्या हुआ अंग्रेजी समाचार पत्रों ने तो अपनी भाषा को और भी परिष्कृत कर लिया परन्तु हिंदी भाषी समाचार पत्र स्थानीय भाषा में प्रयुक्त शब्दों का अधिक प्रयोग करने लग गए । जब कि स्थानीय भाषा या 'वर्नाकुलर' में छपने वाले दैनिकों की कमी नहीं है । राष्ट्रीय समाचार पत्रों को भाषा का उच्च स्तर ,शब्दों के चयन में शालीनता और शुद्धता का अवश्य ध्यान रखना चाहिए जो वास्तविकता में अब गौण हो चुका है ।

राजनीति करने के उद्देश्य से धार्मिक / जातिगत भावनाओं को भड़काने के लिए ऐसी शब्दावलियों का प्रयोग किया जाता है जिससे बचा भी जा सकता है । यथा दलित महिला से बलात्कार ,अब यदि केवल महिला ही लिखा जाये तब भी यह समाचार उतना ही गम्भीर है परन्तु दलित लिख कर अनायास क्षणिक आवेश उत्पन्न कराने का कार्य किया जाता है । आजकल 'हर्ष फायरिंग' / 'ऑनर किलिंग' का प्रयोग प्रायः किया जा रहा है जिसे पढ़ते ही भाषा दोष का आभास होता है । परीक्षा देते 'साल्वर' पकडे गए , अब 'साल्वर' नया शब्द बना दिया हिंदी का ,जो किसी भी प्रकार से समझ से परे है । ऐसे अनेक शब्द जैसे रौंदा ,गुंडई ,रपटा,ठोंका ,रंगरेलियां , जलवा, दारू का ठेका ,आबरू तार तार हुई ,इत्यादि न जाने कितने शब्द और शब्द विन्यास हैं जिनके प्रयोग से बचा जा सकता है और उनके स्थान पर अधिक उपयुक्त और शालीन शब्दों का प्रयोग किया जा सकता है ।

अभी कुछ पत्रकार बंधुओं से मैंने इस विषय में चर्चा की तो उन लोगों ने बहुत चौकाने वाली बात बताई कि उन लोगों को अब यह निर्देश मिलते है कि घटना की प्रमुखता का ध्यान रख कर किसी भी प्रकार के शब्दों का चयन कर सकते हैं भले ही वह पूरी तरह से स्थानीय शब्द क्यों न हो और भाषा दोष होने का भी भय न करें । जनता को समाचार से अवगत कराना है वह भी खूब मसाले दार भाषा और शब्दों के संग परोस कर न कि समाज को हिंदी भाषा सिखानी है ।

दुःख हुआ यह जान कर कि प्रमुख हिंदी समाचार पत्र स्वयं हिंदी भाषा को परिष्कृत करने से अब किनारा कस  रहे हैं । समाचार पत्रों से अच्छी भाषा तो अब सोशल साइट्स पर पढ़ने को मिल जाती है ।

हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़े लोगों से अपील है कि कृपया देश की मातृ भाषा का स्तर उठाने में भी तनिक सहयोग करें , अन्यथा जैसे दूरदर्शन चैनल और बाक़ी चैनल की गुणवत्ता में अंतर स्पष्ट दिखाई पड़ता है वैसा ही चिर अंतर हिंदी और अंग्रेजी भाषा के समाचार पत्र  में बना रहेगा ।


13 टिप्‍पणियां:

  1. सच कह रहे हैं आप। कितनी बार ऐसा हुआ है कि मैंने लेख किसी समाचार पत्र में भेजे और सुनने को मिला इतनी हिंदी अब कौन लिखता पड़ता है। और एक पत्र ने तो मेरे पूरे लेख का ही अनुवाद हिंगलिश में करा कर छापा जिसे प्रकाशित होने के बाद मैं स्वयं ही पहचान नहीं पाई। उनका तर्क था कि यह समाचार पत्र हम नई पीढी को आकर्षित करने के लिए निकालते हैं अत: भाषा भी वैसी ही होनी चाहिए ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. सहमत। युवाओं की रूचि का नाम लेकर हिंदी की खिचड़ी बना लेते हैं कई बार !

    उत्तर देंहटाएं
  3. चिंतनीय है। भाषा को समृद्ध करने के नाम पर 'कुछ भी' नहीं लिखा जाना चाहिए।

    उत्तर देंहटाएं
  4. हिंदी का दलिया बना देंगे
    तब भी हम क्‍या कर लेंगे
    यह नहीं सोचना
    अपने ब्‍लॉगों और सोशल मीडिया मंचों को
    सुरक्षित रखना है इस वायरस से
    शुद्ध हिंदी देशी रस की जरूरत है सबको।

    उत्तर देंहटाएं
  5. चिंतनीय विषय है पर क्या यह कारोबारी पत्रकार सुधरेंगे !!??

    उत्तर देंहटाएं
  6. पता नहीं, हिंदी से सभी मज़ाक क्यों करते रहते हैं

    उत्तर देंहटाएं
  7. आपकी इस प्रस्तुति को आज की बुलेटिन राज कपूर, शैलेन्द्र और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

    उत्तर देंहटाएं
  8. ये हिंग्लिश का ज़माना है...अपनी खबरों को सनसनी खेज़ बनाने के लिए अख़बारों का कम्पटीशन न्यूज़ चैनेलों से है...भाषा कि चिंता किसे है...

    उत्तर देंहटाएं
  9. आजकल अखबारों की भाषा और उसमे भी प्रूफ की गलतियाँ देख कर मन खिन्न होना लाजिमी है।


    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  10. अपना स्तर डुबा कर पहले अन्य की श्रेणी में आयेंगे, फिर विदा ले जायेंगे।

    उत्तर देंहटाएं
  11. कल 18/12/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं