गुरुवार, 2 मई 2013

" नापाक माटी में मौत एक पाक की ....."


वरण किया था ,
तभी मृत्यु का ,
कैद हुआ था ,
जब परदेस । 

हाँ ! याद आया ,
और बहुत याद आया ,
तेरा साया कभी  ,
कभी बच्चों का साया । 

ख्वाहिश ज़िन्दगी ,
तो न थी कभी ,
हाँ थी जरूर ,
बस इतनी । 

जान जाने से पहले ,
हो जाए दीदार,
अपनों का ,
और अपने वतन का । 

मिलूँ जब भी माटी में ,
माटी हो बस ,
तो हो ,
अपने वतन की ,

दुश्मनों ने यह भी ,
पूरा न होने दिया ,
जानता है अब ,
उनका वह खुदा भी ,

मौत ने मेरी ,
कर दिया ,
उस पाक को ,
भी नापाक  । 

                                                                  "विनम्र श्रद्धांजलि "
 

18 टिप्‍पणियां:

  1. विनम्र श्रद्धांजलि|

    इस से अधिक हम कहें भी तो क्या ... और किस आधार पर ???

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  2. बेहद अफ़सोस है,इश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें..आपकी रचना को नमन

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  3. अमितजी इस दुःख को शब्दों में नहीं बांधा जा सकता ...दिल कसकता है उस इंसान के लिए ...उसके अपनों के लिए

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  4. वह तो पहले भी नापाक ही था और रहेगा।
    बहुत सही लिखे हैं सर!

    सादर

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  5. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(4-5-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

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  6. आपकी यह श्रद्धांजलित प्रस्तुति ''निर्झर टाइम्स'' पर लिंक की गई है।
    http//:nirjhat-times.blogspot.com पर आपका स्वागत है।कृपया अवलोकन करें और सुझाव दें।
    सादर

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  7. विनम्र श्रद्धांजलि|बहुत ही मार्मिक भाव.

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  8. मौत ने मेरी ,
    कर दिया ,
    उस पाक को ,
    भी नापाक ।
    हृदयस्पर्शी भाव ....बहुत गहन अभिव्यक्ति ...!!विनम्र श्रद्धांजलि ...!!

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