मंगलवार, 12 मार्च 2013

" वह काला तिल .........."


नई नई मुलाकात थी ,
मुलाकात क्या बस बात थी ,
कहना उनका  ,लिखते तो अच्छा हो ,
मैंने कहा तुमने पढ़ा शायद ,
कमबख्त लिखा खुद संवर गया ,

बात चल निकली तनिक और खिंच गई ,
उनको था शौक मुस्कराने का  ,
बोले मेरे हंसने की भी अदा है ,
मैंने कहा ,मुझे क्या पता है ,

झट तस्वीर भेज दी ,
अवाक रह गया मैं ,
खूबसूरत होना एक बात है ,
पर इत्ता खूबसूरत होना ,अलग बात है ,

गौर किया तो एक काला तिल  ,
वह भी गोरे से गाल पर ,
गोया भँवरा हो ,
चांदनी के फूल पर ,

टटोला मैंने ,
इस तिल पर दिल ,
तो बहुत मिटे होंगे ,
'ऊहूँ' कर बोले मुझे क्या ,

अब मैं मान गया ,
खूबसूरत होना ,
और नकचढ़ा होना ,
दोनों एक ही बात है ,

अब आँखें खोलता हूँ ,
तस्वीर सताती है ,
मूंद लेता हूँ तब ,
वह कमबख्त तिल ,
तिल तिल सताता है ।

  इसीलिए ठीक कहा हैं किसी ने ,

"हसीनों से फकत साहब सलामत दूर की अच्छी , न इनकी दोस्ती अच्छी ,न इनकी दुश्मनी अच्छी "



23 टिप्‍पणियां:

  1. वाह वाह !
    क्या बात है! अरे बहुते शुक्र है, कि हमरे गाल पर कोई काला तिल नहीं है, संवसे गाल ही काला है :)
    आपका शुक्रिया, इस सुन्दर काव्यकारी के लिए !

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  2. चलिए आपके लिखे की तारीफ तो कर दी काले तिल वाली ने ......:))

    यूँ ही लिखते रहिये .........

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    1. गलत जगह कमेन्ट चेप दिए, वहां से डिलीट कर रहे हैं ...

      हाँ तो भाईयो एवं भौजाइयो, कौनो किसिम का कन्फ़ुसियन ना होवे, ख़ास करके हमरे हसबैंड जी को इसीलिए कह दे रहे हैं ....

      हमसे पहले पहुंचे हैं, तुषार राज रस्तोगी जी, उनका तिल सब अजब -गजब हैं ...नाक के नीचे तलवार कट तिल हैं, बाकी ठोढ़ी पर बकरे की दाढ़ी नुमा तिल है, गाल पर हमको नज़र नहीं आया कौनो तिल विल, बाकी बचे सुज्ञ जी, तो उनके तिल की गारंटी की ज़रुरत नाही है ऊ बाद में पहुँचे हैं ...और कोई नारी प्राणी नज़र नहीं आई इसीलिए कह दे रहे हैं, हम एक अच्छी कविता की तारीफ किये हैं और पक्की बात है ई निवेदिता जी के लिए ही लिखा गया है, खाली अमित जी बुडबक बना रहे हैं लोगों को :):) 'बदला' फिल्म देख लिए का ? :):)

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    2. गलत जगह कमेन्ट चेप दिए, वहां से डिलीट कर रहे हैं ...

      हाँ तो भाईयो एवं भौजाइयो, कौनो किसिम का कन्फ़ुसियन ना होवे, ख़ास करके हमरे हसबैंड जी को इसीलिए कह दे रहे हैं ....

      हमसे पहले पहुंचे हैं, तुषार राज रस्तोगी जी, उनका तिल सब अजब -गजब हैं ...नाक के नीचे तलवार कट तिल हैं, बाकी ठोढ़ी पर बकरे की दाढ़ी नुमा तिल है, गाल पर हमको नज़र नहीं आया कौनो तिल विल, बाकी बचे सुज्ञ जी, तो उनके तिल की गारंटी की ज़रुरत नाही है ऊ बाद में पहुँचे हैं ...और कोई नारी प्राणी नज़र नहीं आई इसीलिए कह दे रहे हैं, हम एक अच्छी कविता की तारीफ किये हैं और पक्की बात है ई निवेदिता जी के लिए ही लिखा गया है, खाली अमित जी बुडबक बना रहे हैं लोगों को :):) 'बदला' फिल्म देख लिए लोग बाग़ का ? :):)

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  3. गजब है,ऐसा लिखा फिर भी "कमबख्त लिखा खुद संवर गया ,"

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  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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    1. और हमसे कहती हैं आप ,नाम है अमित और डरते हैं आप ,आप तो खुदै घबडाए गईं । अरे बस होली है ,फागुन है और कवि मन है बस । जहां तक बात निवेदिता की है ,तो वह तो जब मन से निहार लेती हैं कभी कभार ,तो कविता अपने आप हो जाती है ।

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    2. यह लिखने के बाद हटाने वाले लोग बहुत कन्फ्यूज्ड होते हैं शायद ...

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  5. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति,आभार.

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  6. वाह!बहुत सुंदर ................................. www.sriramroy.blogspot.in

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  7. वाह! क्या बात है।
    ऐसे ही पढ़ने वाले मिलतें रहें।

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  8. सहजता से कही गयी मन की अनुभूति
    बहुत सुंदर-- ----
    बधाई

    आग्रह है मेरे ब्लॉग में सम्मलित हों,प्रतिक्रिया दें
    jyoti-khare.blogspot.in

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