शुक्रवार, 18 मई 2012

'सिमरन' हाँ ! शायद यही नाम था उसका .........?



वादा था न,
लिखने का कुछ,
तो कुछ यूँ समझ लो,
तुम्हारी आवाज़ की कशिश ,
और तिरछी मुस्कान की नफासत ,
में कैद हो गया हूँ ,
तुम पलकें झुकाती रहीं,
उठाती रहीं ,
मुस्कुराती रहीं ,
और मै बेबस,
डूबता गया 
तिलस्म में ,
हुस्न के,
तुम्हारे |



"तुम तो मेरे दिल का 'सिम' चुरा कर 'रन' कर गई ।"

12 टिप्‍पणियां:

  1. अब डुअल सिम वाला सेट लीजियेगा.....
    as back up plan....
    :-)

    बहुत सुंदर रचना....
    सादर.

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  2. हा हा हा, बिना सिम के अब रण कैसे जीतें..

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  3. "तुम तो मेरे दिल का 'सिम' चुरा कर 'रन' कर गई ।"
    सिम बिना तो बस सिमसिम का ही सहारा है

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