"शब्द भीतर रहते हैं तो सालते रहते हैं, मुक्त होते हैं तो साहित्य बनते हैं"। मन की बाते लिखना पुराना स्वेटर उधेड़ना जैसा है,उधेड़ना तो अच्छा भी लगता है और आसान भी, पर उधेड़े हुए मन को दुबारा बुनना बहुत मुश्किल शायद...।
बगैर आईना देखे तुम
जब दो अंगुलियां नाक पे टिका
माथे के एकदम बीचों बीच बिंदी लगाती हो
तो तुम्हारे इस श्रृंगार कौशल के आगे मुझे अपना
त्रिकोणमिति और ज्यामिति का ज्ञान व्यर्थ लगता है ।
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