शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

" हवाई चप्पल "


किसी के पास कितने भी आकर्षक जूते और चप्पल क्यों न हो ,उनमे एक अदद जोड़ी चप्पल 'हवाई' अवश्य होती है । कारण बस एक ही है ...पैरों से दुर्बल को कचरने में बहुत आनंद आता है । 'हवाई' चप्पल से दुर्बल और गरीब कोई चप्पल पैरों में पहनने वाली हो ही नहीं सकती और न है । बाकी जूते चप्पल इतने महंगे होते हैं कि उन्हें पहनने के बाद पैरों से ज्यादा उनका ख्याल रखना पड़ता है ।

बचपन में नई हवाई' चप्पल का अपना एक अलग आनंद होता था । कुछ दिनों तक तो जूते पहन कर स्कूल जाते समय चप्पल को उसकी पन्नी और डिब्बे में रखकर जाया करते थे ,जिससे कि उसकी सतह का गोरापन बना रहे । मुझे 'हवाई' चप्पल की सतह की सफेदी ने हमेशा लुभाया है । अब तो सतह भी रंगीन आने लगी है परन्तु वो बात नहीं लगती ।

'हवाई' चप्पल जब अधिक पुरानी हो चलती है या कहें घिस सी जाती है तब वह बहुत पतली हो जाती है और पहनने वाले के पैरों का आकार ले लेती है । मंदिर वगैरह में अगर उतारनी पड़े ,तो कितनी भी चप्पलें वहां एक साथ क्यों न रखी हों ,अपने पैरों की छाप से आप अपनी 'हवाई' चप्पल आसानी से पहचान सकते हैं ।

बचपन में चप्पल पुरानी होने पर या कहे घिस जाने पर सतह घिसने के साथ साथ उसके स्ट्रैप के नीचे वाला 'टिकुला' भी घिस जाता था और चलते चलते चप्पल टूट जाती थी । ऐसे में उस स्ट्रैप को थोडा और नीचे खींच कर सतह के पीछे से 'टिकुले' की जगह एक आलपिन या सेफ्टीपिन आर पार पिरो दिया करते थे और चप्पल फिर उपयोग में आने लगती थी । ये बात दीगर है कि इससे उस पैर की चप्पल कसी हुई लगती थी ,जिसमें आलपिन लगी होती थी । अब दूसरे स्ट्रैप के टूटने का इंतज़ार रहता था कि वह भी टूट जाए तो एक नया स्ट्रैप डाल दिया जाये । परन्तु नए स्ट्रैप डालने बाद चप्पल पहन तो लेते थे पर अपराध बोध होता था कि देखो बेचारा स्ट्रैप तो नया है और उसे पुरानी घिसी सतह के गले मढ़ दिया ,जैसे कोई बेमेल विवाह हो जाए ..सुन्दर सी नई नवेली युवती का विवाह किसी अधिक उम्र के व्यक्ति के संग हो जाए । परन्तु सच तो यह है कि काम तो वह बेमेल चप्पल भी निभाती थी और निभ तो ऐसे विवाह भी जाते हैं ।

बारिश में या भीगी कच्ची सड़क पर हवाई चप्पल पहन कर चलते समय पहने हुए नीचे के वस्त्र . ,पायजामा ,पैंट ,लोवर इत्यादि पर मिटटी से बड़ी आकर्षक छींटे बन जाती है । उससे बचने के लिए बचपन में हम निकर पहनते थे । उससे केवल टाँगे ही गन्दी होती थी उसे धो लिया करते थे । इससे बचने का एक और तरीका ईजाद किया था हम लोगो ने । अगर अपने पैरों से छोटी चप्पल पहनी जाए तब बारिश में पीछे कपड़ों पर छीटें नहीं पड़ती थीं और अपने से बड़ी चप्पल पहन ली तब तो माडर्न आर्ट बनना तय ही रहता था । अब घरों में  कभी कभार पैरों में छोटी बड़ी चप्पल पड़ ही जाती हैं ।  

हवाई चप्पल के फायदे जो मैंने अनुभव किये :

१. सस्ती और वेदरप्रूफ ।
२.बचपन में कबड्डी खेलते समय इन्ही उतारी हुई हवाई चप्पलों से पाला बनाया करते थे ।
३ .क्रिकेट खेलने में 'बालिंग एंड' पर यही हवाई चप्पल 'नो बाल' तय करती थी ।
४ .कहीं भी छोड़ सकते हैं ..खोने पर क्षति अधिक नहीं ।
३. भीड़ भाड़  / ट्रेन में कोई उतारी हुई चप्पलों पर अपने जूते या पैर रख दे तो गंदे या ख़राब होने का डर नहीं ।
४. पार्क /मंदिर में टहलते टहलते थकने की स्थिति में उसे उतार कर उसी पर आराम से बैठ सकते हैं ।
५. राशन लेने या मिटटी का तेल लेने या गैस लेने की लाइन में लगने के विकल्प की स्थिति में चप्पल ही 'प्रोक्सी' का काम करती है और उसे इसकी कानूनी मान्यता भी प्राप्त है । लोग सहजता से इस प्रणाली को अंगीकृत कर लेते हैं ।
६.इसको पहनने में नर मादा का भेद नहीं होता । 'जेंडर बायस' से परे है यह ।
७. कभी कभार ऐसी जगहों पर स्नान / शौच करना पड़ सकता है जहां दरवाजा भीतर से बंद होने में स्वयं में असमर्थ होता है । ऐसे स्थानों पर इसे बाहर ही उतार कर अपनी भीतर की उपस्थिति दर्ज कराई जा सकती है और असहजता की स्थिति से बचा जा सकता है ।  
८.आवश्यकता पड़ने पर इसे हाथ में लेकर कभी अस्त्र और कभी शस्त्र के तौर पर प्रयोग कर सकते हैं । 

बचपन में मम्मी कहा करती थी कि अगर उतारी हुई चप्पलें आपस में एक दूसरे के ऊपर चढ़ी हुई मिले तो घर में रहने का योग कम रहता है । इसलिए प्रायः हम लोग डाट खाते थे कि उतारी हुई चप्पले अगल बगल ठीक से उतार कर रखा करें । ( पता नहीं क्या कुशल छिपा था इसमें हम लोगों का ,शायद व्यवस्थित रखने का एक तरीका रहा होगा यह )   
    
अब चूंकि समय के साथ सभी जूतों / चप्पलों के दाम तो बहुत अधिक बढ़ गए परन्तु उस अनुपात में 'हवाई' चप्पल अभी भी बहुत सस्ती है ,इसीलिए बड़े लोगों ने इसे सस्ता समझ कर पहनना छोड़ दिया और वे लोग महँगी महंगी बाथरूम स्लीपर्स पहनते है और वे इतनी 'स्लिपरी' होती हैं कि बेचारे वे बड़े लोग बाथरूम में फिसल कर अच्छा खासा पैसा हड्डी वाले डाक्टर को दे आते हैं । ( खैर मर्जी है उनकी क्योंकि पैसा है उनका ) 

'हवाई' चप्पल का नाम 'हवाई द्वीप' के नाम पर पडा । इसकी खोज मूलतः  जापानियों ने समुद्री रेत पर चलने के लिए की थी । हवाई द्वीप पर पहनी जाने के कारण इसका नाम 'हवाई' चप्पल पड़ गया । इसका हवा --हवाई से कोई लेना देना नहीं है । हां , नई नई इसे पहन कर हवा में इतरा अवश्य सकते हैं आप ।    

19 टिप्‍पणियां:


  1. हवाई चप्पल सुविधाजनक होती थी , हालाँकि अब कई बेहतर विकल्प है!
    रोचक चप्पल पुराण !

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  2. हा हा हा, पूरा बचपन याद दिला दिया। हवाई चप्पल तो हर जगह चलती थी, हाथ में लेकर किये गये तलवार युद्ध भूल गये..

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  3. और कभी परानी हो जाने पर चप्पन कहीं कीचड या डामर में चिपक जाती तो स्ट्रेप निकल जाता,चप्पल वही...आप आगे....
    बाप रे कौन जमाने में ले गए आप..... उम्र याद दिला देते हो आप :-)

    सादर
    अनु

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  4. arey gazab...ye to aapne pura ek bachpan ka mausam yaad dila diya....
    bahut achhi lagi post...:)

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  5. कल 11/08/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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  6. gender bias se pare hai- ye bilkul sahi kaha aapne. bachpan yaad dila diya aapne.kabhi kabhi to aisa bhi hota tha ki chappal pahan kar khelne jate the aur strap tootjata tha to safety pin se jod kar aram se dobara pahan lete the .
    very nice post.thank u

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  7. बहुत बढ़िया और बिल्कुल सही... अमित जी...

    ~सादर

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  8. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (11-08-2013) के चर्चा मंच 1334 पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

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  9. आपकी इस ब्लॉग-प्रस्तुति को हिंदी ब्लॉगजगत की सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुतियाँ ( 6 अगस्त से 10 अगस्त, 2013 तक) में शामिल किया गया है। सादर …. आभार।।

    कृपया "ब्लॉग - चिठ्ठा" के फेसबुक पेज को भी लाइक करें :- ब्लॉग - चिठ्ठा

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  10. अरे वाह ! हम तो कभी इत्ता सोचे ही नहीं थे...पर बहुत सही लिखा है आपने भैया :)

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  11. इस 'हवाई कथा' ने कई यादें ताज़ा कर दीं.... आभार आपका!

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